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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 73
  • सुन्दरकाण्ड * ७३
    जासु सकल मंगलमय कीती।
    तासु पयान सगुन यह नीती॥
    प्रभु पयान जाना बैदेहीं।
    फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं॥ ३॥
    जिनकी कीर्ति सब मङ्गलोंसे पूर्ण है, उनके प्रस्थानके समय
    शकुन होना, यह नीति है (लीलाकी मर्यादा है)। प्रभुका प्रस्थान
    जानकीजीने भी जान लिया। उनके बायें अङ्ग फड़क-फड़ककर
    मानो कहे देते थे [कि श्रीरामजी आ रहे हैं] ॥ ३॥
    जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई।
    असगुन भयउ रावनहि सोई॥
    चला कटकु को बरनैं पारा।
    गर्जहिं बानर भालु अपारा॥ ४॥
    जानकीजीको जो-जो शकुन होते थे, वही-वही रावणके
    लिये अपशकुन हुए। सेना चली, उसका वर्णन कौन कर सकता
    है? असंख्य वानर और भालू गर्जना कर रहे हैं॥ ४॥
    नख आयुध गिरि पादपधारी।
    चले गगन महि इच्छाचारी॥
    केहरिनाद भालु कपि करहीं।
    डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ५॥
    नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक)
    चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षोंको धारण किये कोई
    आकाशमार्गसे और कोई पृथ्वीपर चले जा रहे हैं। वे सिंहके
    समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गर्जनेसे]
    दिशाओंके हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं॥ ५॥