सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
पृष्ठ 74, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ * श्रीरामचरितमानस *
[छन्द १]
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे ॥
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं ॥
दिशाओंके हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत
चञ्चल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व,
देवता, मुनि, नाग, किन्नर सब-के-सब मनमें हर्षित हुए कि
[अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर
योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'प्रबलप्रताप
कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजीकी जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके
गुणसमूहोंको गा रहे हैं॥ १॥
[छन्द २]
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ठ कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी ॥
उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेनाका
बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा
जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छपकी कठोर पीठको दाँतोंसे
पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतोंको गड़ाकर
कच्छपकी पीठपर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे
हैं मानो श्रीरामचन्द्रजीकी सुन्दर प्रस्थानयात्राको परम सुहावनी
जानकर उसकी अचल पवित्र कथाको सर्पराज शेषजी कच्छपकी
पीठपर लिख रहे हों॥ २॥