सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८ * श्रीरामचरितमानस *
ममता बढ़ाकर (अधिक स्नेह दर्शाकर) वह सभामें चला गया।
मन्दोदरी हृदयमें चिन्ता करने लगी कि पतिपर विधाता प्रतिकूल
हो गये ॥ ३ ॥
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई।
सिंधु पार सेना सब आई॥
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू।
ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥ ४ ॥
ज्यों ही वह सभामें जाकर बैठा, उसने ऐसी खबर पायी कि
शत्रु की सारी सेना समुद्रके उस पार आ गयी है। उसने मन्त्रियोंसे
पूछा कि उचित सलाह कहिये [अब क्या करना चाहिये?]। तब
वे सब हँसे और बोले कि चुप किये रहिये (इसमें सलाहकी
कौन-सी बात है?) ॥ ४ ॥
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं।
नर बानर केहि लेखे माहीं॥ ५॥
आपने देवताओं और राक्षसोंको जीत लिया, तब तो कुछ
श्रम ही नहीं हुआ। फिर मनुष्य और वानर किस गिनतीमें
हैं? ॥ ५ ॥
[दोहा ३७]
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥
मन्त्री, वैद्य और गुरु—ये तीन यदि [अप्रसन्नताके] भय या
[लाभकी] आशासे [हितकी बात न कहकर] प्रिय बोलते हैं
(ठकुरसुहाती कहने लगते हैं); तो [क्रमशः] राज्य, शरीर और
धर्म—इन तीनका शीघ्र ही नाश हो जाता है ॥ ३७॥