सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
- सुन्दरकाण्ड * ३९
कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥ १॥
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
जे हित रहे करत तेइ पीरा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥
और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ
मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे
ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु
साँपके श्वासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥ २॥
कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
काहि कहौं यह जान न कोई॥
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥
मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ
किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे
प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ ३॥
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥
और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका
सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी
प्रेममें मग्न हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥
४० * श्रीरामचरितमानस *
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥
हनुमान्जीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी
प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़
दो॥ ५॥
[दोहा १५]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण
अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न
करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी
सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥
- सुन्दरकाण्ड * ४१
कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर
श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन)-की आज्ञा नहीं है।
[अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी
वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि
[ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने
कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से)
होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥
मोरें हृदय परम संदेहा।
सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
कनक भूधराकार सरीरा।
समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे
बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना
शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के आकारका
(अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय
उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥
४२ * श्रीरामचरितमानस *
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने
फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
[दोहा १६]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु
प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है
(अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना॥ १॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी
सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय
जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल
और शीलके निधान होओ॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥
हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके
- सुन्दरकाण्ड * ४३
खजाने होओ। श्रीरघुनाथजी तुमपर बहुत कृपा करें। 'प्रभु कृपा
करें' ऐसा कानोंसे सुनते ही हनुमान्जी पूर्ण प्रेममें मग्न हो गये॥२॥
बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥३॥
हनुमान्जीने बार-बार सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और
फिर हाथ जोड़कर कहा—हे माता! अब मैं कृतार्थ हो गया।
आपका आशीर्वाद अमोघ (अचूक) है, यह बात प्रसिद्ध है॥३॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा।
लागि देखि सुंदर फल रूखा॥
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी।
परम सुभट रजनीचर भारी॥४॥
हे माता! सुनो, सुन्दर फलवाले वृक्षोंको देखकर मुझे बड़ी
ही भूख लग आयी है। [सीताजीने कहा—] हे बेटा! सुनो, बड़े
भारी योद्धा राक्षस इस वनकी रखवाली करते हैं॥४॥
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं।
जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता! यदि आप मनमें सुख मानें
(प्रसन्न होकर आज्ञा दें) तो मुझे उनका भय तो बिलकुल नहीं
है॥५॥
[दोहा १७]
देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु॥
४४ * श्रीरामचरितमानस *
हनुमान्जीको बुद्धि और बलमें निपुण देखकर जानकीजीने
कहा—जाओ। हे तात! श्रीरघुनाथजीके चरणोंको हृदयमें धारण
करके मीठे फल खाओ॥ १७॥
चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा।
फल खाएसि तरु तोरैं लागा॥
रहे तहाँ बहु भट रखवारे।
कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे॥ १ ॥
वे सीताजीको सिर नवाकर चले और बागमें घुस गये। फल
खाये और वृक्षोंको तोड़ने लगे। वहाँ बहुत-से योद्धा रखवाले थे।
उनमेंसे कुछको मार डाला और कुछने जाकर रावणसे पुकार
की—॥ १ ॥
नाथ एक आवा कपि भारी।
तेहिं असोक बाटिका उजारी॥
खाएसि फल अरु बिटप उपारे।
रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे॥ २ ॥
[और कहा—] हे नाथ! एक बड़ा भारी बंदर आया है।
उसने अशोकवाटिका उजाड़ डाली। फल खाये, वृक्षोंको उखाड़
डाला और रखवालोंको मसल-मसलकर जमीनपर डाल दिया॥ २ ॥
सुनि रावन पठाए भट नाना।
तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना॥
सब रजनीचर कपि संघारे।
गए पुकारत कछु अधमारे॥ ३ ॥
यह सुनकर रावणने बहुत-से योद्धा भेजे। उन्हें देखकर
हनुमान्जीने गर्जना की। हनुमान्जीने सब राक्षसोंको मार डाला,
कुछ जो अधमरे थे, चिल्लाते हुए गये॥ ३ ॥
- सुन्दरकाण्ड * ४५
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा।
चला संग लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा।
ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥४॥
फिर रावणने अक्षयकुमारको भेजा। वह असंख्य श्रेष्ठ
योद्धाओंको साथ लेकर चला। उसे आते देखकर हनुमान्जीने
एक वृक्ष [हाथमें] लेकर ललकारा और उसे मारकर महाध्वनि
(बड़े जोर)-से गर्जना की॥४॥
[दोहा १८]
कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि॥
उन्होंने सेनामें कुछको मार डाला और कुछको मसल डाला
और कुछको पकड़-पकड़कर धूलमें मिला दिया। कुछने फिर
जाकर पुकार की कि हे प्रभु! बंदर बहुत ही बलवान् है॥१८॥
सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।
पठएसि मेघनाद बलवाना॥
मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।
देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥१॥
पुत्रका वध सुनकर रावण क्रोधित हो उठा और उसने
[अपने जेठे पुत्र] बलवान् मेघनादको भेजा। (उससे कहा
कि—) हे पुत्र! मारना नहीं; उसे बाँध लाना। उस बंदरको देखा
जाय कि कहाँका है॥१॥
चला इंद्रजित अतुलित जोधा।
बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा॥
४६ * श्रीरामचरितमानस *
कपि देखा दारुन भट आवा।
कटकटाइ गर्जा अरु धावा॥२॥
इन्द्रको जीतनेवाला अतुलनीय योद्धा मेघनाद चला। भाईका
मारा जाना सुन उसे क्रोध हो आया। हनुमान्जीने देखा कि
अबकी भयानक योद्धा आया है। तब वे कटकटाकर गर्जे
और दौड़े॥२॥
अति बिसाल तरु एक उपारा।
बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा॥
रहे महाभट ताके संगा।
गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा॥३॥
उन्होंने एक बहुत बड़ा वृक्ष उखाड़ लिया और [उसके
प्रहारसे] लंकेश्वर रावणके पुत्र मेघनादको बिना रथका कर दिया
(रथको तोड़कर उसे नीचे पटक दिया)। उसके साथ जो बड़े-
बड़े योद्धा थे, उनको पकड़-पकड़कर हनुमान्जी अपने शरीरसे
मसलने लगे॥३॥
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा।
भिरे जुगल मानहुँ गजराजा॥
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई।
ताहि एक छन मुरुछा आई॥४॥
उन सबको मारकर फिर मेघनादसे लड़ने लगे। [लड़ते हुए
वे ऐसे मालूम होते थे] मानो दो गजराज (श्रेष्ठ हाथी) भिड़ गये
हों। हनुमान्जी उसे एक घूँसा मारकर वृक्षपर जा चढ़े। उसको
क्षणभरके लिये मूर्च्छा आ गयी॥४॥
- सुन्दरकाण्ड * ४७
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया।
जीति न जाइ प्रभंजन जाया॥ ५॥
फिर उठकर उसने बहुत माया रची; परन्तु पवनके पुत्र उससे
जीते नहीं जाते॥ ५॥
[दोहा १९]
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार॥
अन्तमें उसने ब्रह्मास्त्रका सन्धान (प्रयोग) किया, तब
हनुमान्जीने मनमें विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्रको नहीं मानता
हूँ तो उसकी अपार महिमा मिट जायगी॥ १९॥
ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहिं मारा।
परतिहुँ बार कटकु संघारा॥
तेहिं देखा कपि मुरुछित भयऊ।
नागपास बाँधेसि लै गयऊ॥ १॥
उसने हनुमान्जीको ब्रह्मबाण मारा, [जिसके लगते ही वे
वृक्षसे नीचे गिर पड़े] परन्तु गिरते समय भी उन्होंने बहुत-सी
सेना मार डाली। जब उसने देखा कि हनुमान्जी मूर्च्छित हो गये
हैं, तब वह उनको नागपाशसे बाँधकर ले गया॥ १॥
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥ २॥
[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सुनो, जिनका नाम जपकर
ज्ञानी (विवेकी) मनुष्य संसार (जन्म-मरण)-के बन्धनको काट
४८ * श्रीरामचरितमानस *
डालते हैं, उनका दूत कहीं बन्धनमें आ सकता है? किन्तु प्रभुके
कार्यके लिये हनुमान्जीने स्वयं अपनेको बँधा लिया॥ २॥
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए।
कौतुक लागि सभाँ सब आए॥
दसमुख सभा दीखि कपि जाई।
कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई॥ ३॥
बंदरका बाँधा जाना सुनकर राक्षस दौड़े और कौतुकके लिये
(तमाशा देखनेके लिये) सब सभामें आये। हनुमान्जीने जाकर
रावणकी सभा देखी। उसकी अत्यन्त प्रभुता (ऐश्वर्य) कुछ कही
नहीं जाती॥ ३॥
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता।
भृकुटि बिलोकत सकल सभीता॥
देखि प्रताप न कपि मन संका।
जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका॥ ४॥
देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े बड़ी नम्रताके साथ भयभीत
हुए सब रावणकी भौं ताक रहे हैं। (उसका रुख देख रहे हैं।)
उसका ऐसा प्रताप देखकर भी हनुमान्जीके मनमें जरा भी डर
नहीं हुआ। वे ऐसे निःशङ्क खड़े रहे, जैसे सर्पोंके समूहमें गरुड़
निःशङ्क (निर्भय) रहते हैं॥ ४॥
[दोहा २०]
कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद॥
हनुमान्जीको देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा।
- सुन्दरकाण्ड * ४९
फिर पुत्र-वधका स्मरण किया तो उसके हृदयमें विषाद उत्पन्न
हो गया ॥ २० ॥
कह लंकेस कवन तैं कीसा।
केहि कें बल घालेहि बन खीसा॥
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही।
देखउँ अति असंक सठ तोही ॥ १ ॥
लङ्कापति रावणने कहा—रे वानर! तू कौन है? किसके
बलपर तूने वनको उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मुझे
(मेरा नाम और यश) कानोंसे नहीं सुना? रे शठ! मैं तुझे
अत्यन्त निःशङ्क देख रहा हूँ॥ १॥
मारे निसिचर केहिं अपराधा।
कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया।
पाइ जासु बल बिरचति माया॥ २॥
तूने किस अपराधसे राक्षसोंको मारा? रे मूर्ख! बता, क्या
तुझे प्राण जानेका भय नहीं है? [हनुमान्जीने कहा—] हे रावण!
सुन; जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंके समूहोंकी
रचना करती है; ॥ २ ॥
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा।
पालत सृजत हरत दससीसा॥
जा बल सीस धरत सहसानन।
अंडकोस समेत गिरि कानन॥ ३ ॥
जिनके बलसे हे दशशीश! ब्रह्मा, विष्णु, महेश (क्रमशः)
५० * श्रीरामचरितमानस *
सृष्टिका सृजन, पालन और संहार करते हैं; जिनके बलसे
सहस्रमुख (फणों)-वाले शेषजी पर्वत और वनसहित समस्त
ब्रह्माण्डको सिरपर धारण करते हैं; ॥ ३ ॥
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता॥
हर कोदंड कठिन जेहिं भंजा।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा॥ ४॥
जो देवताओंकी रक्षाके लिये नाना प्रकारकी देह धारण करते
हैं और जो तुम्हारे-जैसे मूर्खोंको शिक्षा देनेवाले हैं; जिन्होंने
शिवजीके कठोर धनुषको तोड़ डाला और उसीके साथ
राजाओंके समूहका गर्व चूर्ण कर दिया॥ ४॥
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली।
बधे सकल अतुलित बलसाली॥ ५॥
जिन्होंने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिको मार डाला, जो
सब-के-सब अतुलनीय बलवान् थे; ॥ ५॥
[दोहा २१]
जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि॥
जिनके लेशमात्र बलसे तुमने समस्त चराचर जगत्को जीत
लिया और जिनकी प्रिय पत्नीको तुम [चोरीसे] हर लाये हो,
मैं उन्हींका दूत हूँ॥ २१॥
जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई।
सहसबाहु सन परी लराई॥
- सुन्दरकाण्ड * ५१
समर बालि सन करि जसु पावा।
सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा॥ १ ॥
मैं तुम्हारी प्रभुताको खूब जानता हूँ, सहस्रबाहुसे तुम्हारी
लड़ाई हुई थी और बालिसे युद्ध करके तुमने यश प्रास किया
था। हनुमान्जीके [मार्मिक] वचन सुनकर रावणने हँसकर बात
टाल दी॥ १ ॥
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा।
कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा॥
सब कें देह परम प्रिय स्वामी।
मारहिं मोहि कुमारग गामी॥ २ ॥
हे [राक्षसोंके] स्वामी! मुझे भूख लगी थी, (इसलिये) मैंने
फल खाये और वानर-स्वभावके कारण वृक्ष तोड़े। हे (निशाचरोंके)
मालिक! देह सबको परम प्रिय है। कुमार्गपर चलनेवाले (दुष्ट)
राक्षस जब मुझे मारने लगे॥ २ ॥
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे।
तेहि पर बाँधेउँ तनयँ तुम्हारे॥
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा।
कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा॥ ३ ॥
तब जिन्होंने मुझे मारा, उनको मैंने भी मारा। उसपर तुम्हारे
पुत्रने मुझको बाँध लिया। [किन्तु] मुझे अपने बाँधे जानेकी कुछ
भी लज्जा नहीं है। मैं तो अपने प्रभुका कार्य किया चाहता हूँ॥ ३ ॥
बिनती करउँ जोरि कर रावन।
सुनहु मान तजि मोर सिखावन॥
५२ * श्रीरामचरितमानस *
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी।
भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी॥४॥
हे रावण! मैं हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान
छोड़कर मेरी सीख सुनो। तुम अपने पवित्र कुलका विचार करके
देखो और भ्रमको छोड़कर भक्तभयहारी भगवान्को भजो॥४॥
जाकें डर अति काल डेराई।
जो सुर असुर चराचर खाई॥
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै।
मोरे कहें जानकी दीजै॥५॥
जो देवता, राक्षस और समस्त चराचरको खा जाता है, वह
काल भी जिनके डरसे अत्यन्त डरता है, उनसे कदापि वैर न
करो और मेरे कहनेसे जानकीजीको दे दो॥५॥
[दोहा २२]
प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि॥
खरके शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतोंके रक्षक और दयाके
समुद्र हैं। शरण जानेपर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हें
अपनी शरणमें रख लेंगे॥२२॥
राम चरन पंकज उर धरहू।
लंका अचल राजु तुम्ह करहू॥
रिषि पुलस्ति जसु बिमल मयंका।
तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका॥ १ ॥
तुम श्रीरामजीके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करो और
लङ्काका अचल राज्य करो। ऋषि पुलस्त्यजीका यश निर्मल
- सुन्दरकाण्ड * ५३
चन्द्रमाके समान है। उस चन्द्रमामें तुम कलंक न बनो॥१॥
राम नाम बिनु गिरा न सोहा।
देखु बिचारि त्यागि मद मोहा॥
बसन हीन नहिं सोह सुरारी।
सब भूषन भूषित बर नारी॥२॥
रामनामके बिना वाणी शोभा नहीं पाती, मद-मोहको छोड़,
विचारकर देखो। हे देवताओंके शत्रु! सब गहनोंसे सजी हुई
सुन्दरी स्त्री भी कपड़ोंके बिना (नंगी) शोभा नहीं पाती॥२॥
राम बिमुख संपति प्रभुताई।
जाइ रही पाई बिनु पाई॥
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं।
बरषि गएँ पुनि तबहिं सुखाहीं॥३॥
रामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली
जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके
मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका
ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख
जाती हैं॥३॥
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी।
बिमुख राम त्राता नहिं कोपी॥
संकर सहस बिष्नु अज तोही।
सकहिं न राखि राम कर द्रोही॥४॥
हे रावण! सुनो, मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुखकी
रक्षा करनेवाला कोई भी नहीं है। हजारों शंकर, विष्णु और ब्रह्मा
५४ * श्रीरामचरितमानस *
भी श्रीरामजीके साथ द्रोह करनेवाले तुमको नहीं बचा सकते ॥ ४ ॥
[दोहा २३]
मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान॥
मोह ही जिसका मूल है ऐसे (अज्ञानजनित), बहुत पीड़ा
देनेवाले, तमरूप अभिमानका त्याग कर दो और रघुकुलके
स्वामी, कृपाके समुद्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका भजन करो ॥ २३ ॥
जदपि कही कपि अति हित बानी।
भगति बिबेक बिरति नय सानी॥
बोला बिहसि महा अभिमानी।
मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी॥ १॥
यद्यपि हनुमान्जीने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीतिसे सनी
हुई बहुत ही हितकी वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी
रावण बहुत हँसकर (व्यंगसे) बोला कि हमें यह बंदर बड़ा
ज्ञानी गुरु मिला! ॥ १ ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही।
लागेसि अधम सिखावन मोही॥
उलटा होइहि कह हनुमाना।
मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना॥ २॥
रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गयी है। अधम! मुझे शिक्षा
देने चला है। हनुमान्जीने कहा—इससे उलटा ही होगा (अर्थात्
मृत्यु तेरी निकट आयी है, मेरी नहीं)। यह तेरा मतिभ्रम
(बुद्धिका फेर) है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है॥ २॥
- सुन्दरकाण्ड * ५५
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना।
बेगि न हरहु मूढ़ कर प्राना॥
सुनत निसाचर मारन धाए।
सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए॥ ३॥
हनुमान्जीके वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया
[और बोला—] अरे! इस मूर्खका प्राण शीघ्र ही क्यों नहीं हर
लेते? सुनते ही राक्षस उन्हें मारने दौड़े। उसी समय मन्त्रियोंके
साथ विभीषणजी वहाँ आ पहुँचे॥ ३॥
नाइ सीस करि बिनय बहूता।
नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
आन दंड कछु करिअ गोसाँई।
सबहीं कहा मंत्र भल भाई॥ ४॥
उन्होंने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावणसे कहा
कि दूतको मारना नहीं चाहिये, यह नीतिके विरुद्ध है। हे गोसाईं!
कोई दूसरा दण्ड दिया जाय। सबने कहा—भाई! यह सलाह
उत्तम है॥ ४॥
सुनत बिहसि बोला दसकंधर।
अंग भंग करि पठइअ बंदर॥ ५॥
यह सुनते ही रावण हँसकर बोला—अच्छा तो, बंदरको
अंग-भंग करके भेज (लौटा) दिया जाय॥ ५॥
[दोहा २४]
कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥
मैं सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदरकी ममता पूँछपर
५६ * श्रीरामचरितमानस *
होती है। अतः तेलमें कपड़ा डुबोकर उसे इसकी पूँछमें बाँधकर
फिर आग लगा दो॥ २४॥
पूँछहीन बानर तहँ जाइहि।
तब सठ निज नाथहि लइ आइहि॥
जिन्ह कै कीन्हिसि बहुत बड़ाई।
देखउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई॥ १॥
जब बिना पूँछका यह बंदर वहाँ (अपने स्वामीके पास)
जायगा, तब यह मूर्ख अपने मालिकको साथ ले आयेगा। जिनकी
इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता (सामर्थ्य) तो
देखूँ!॥ १॥
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना।
भइ सहाय सारद मैं जाना॥
जातुधान सुनि रावन बचना।
लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना॥ २॥
यह वचन सुनते ही हनुमान्जी मनमें मुसकराये [और मन-
ही-मन बोले कि] मैं जान गया, सरस्वतीजी [इसे ऐसी बुद्धि
देनेमें] सहायक हुई हैं। रावणके वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही
(पूँछमें आग लगानेकी) तैयारी करने लगे॥ २॥
रहा न नगर बसन घृत तेला।
बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आए पुरबासी।
मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी॥ ३॥
[पूँछके लपेटनेमें इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि]
- सुन्दरकाण्ड * ५७
नगरमें कपड़ा, घी और तेल नहीं रह गया। हनुमान्जीने ऐसा
खेल किया कि पूँछ बढ़ गयी (लंबी हो गयी)। नगरवासी लोग
तमाशा देखने आये। वे हनुमान्जीको पैरसे ठोकर मारते हैं और
उनकी बहुत हँसी करते हैं॥ ३॥
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।
नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥
पावक जरत देखि हनुमंता।
भयउ परम लघुरूप तुरंता॥ ४॥
ढोल बजते हैं, सब लोग तालियाँ पीटते हैं। हनुमान्जीको
नगरमें फिराकर, फिर पूँछमें आग लगा दी। अग्निको जलते हुए
देखकर हनुमान्जी तुरंत ही बहुत छोटे रूपमें हो गये॥ ४॥
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं।
भईं सभीत निसाचर नारीं॥ ५॥
बन्धनसे निकलकर वे सोनेकी अटारियोंपर जा चढ़े। उनको
देखकर राक्षसोंकी स्त्रियाँ भयभीत हो गयीं॥ ५॥
[दोहा २५]
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥
उस समय भगवान्की प्रेरणासे उनचासों पवन चलने लगे।
हनुमान्जी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाशसे जा लगे॥ २५॥
देह बिसाल परम हरुआई।
मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई॥
जरइ नगर भा लोग बिहाला।
झपट लपट बहु कोटि कराला॥ १॥
५८ * श्रीरामचरितमानस *
देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही हलकी (फुर्तीली) है। वे
दौड़कर एक महलसे दूसरे महलपर चढ़ जाते हैं। नगर जल रहा
है, लोग बेहाल हो गये हैं। आगकी करोड़ों भयंकर लपटें झपट
रही हैं॥ १॥
तात मातु हा सुनिअ पुकारा।
एहिं अवसर को हमहि उबारा॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई।
बानर रूप धरें सुर कोई॥ २॥
हाय बप्पा! हाय मैया! इस अवसरपर हमें कौन बचावेगा?
[चारों ओर] यही पुकार सुनायी पड़ रही है। हमने तो पहले
ही कहा था कि यह वानर नहीं है, वानरका रूप धरे कोई देवता
है!॥ २॥
साधु अवज्ञा कर फलु ऐसा।
जरइ नगर अनाथ कर जैसा॥
जारा नगरु निमिष एक माहीं।
एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥ ३॥
साधुके अपमानका यह फल है कि नगर अनाथके नगरकी
तरह जल रहा है। हनुमान्जीने एक ही क्षणमें सारा नगर जला
डाला। एक विभीषणका घर नहीं जलाया॥ ३॥
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा।
जरा न सो तेहि कारन गिरिजा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी।
कूदि परा पुनि सिंधु मझारी॥ ४॥