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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
  • सुन्दरकाण्ड * २३
    लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन
    (साधु पुरुष)-का निवास कहाँ? हनुमान्‌जी मनमें इस प्रकार
    तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥
    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
    हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
    एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
    साधु ते होइ न कारज हानी॥ २॥
    उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया।
    हनुमान्‌जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [हनुमान्‌जीने
    विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय
    करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ
    ही होता है]॥ २॥
    बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
    सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
    बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ ३॥
    ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्‌जीने उन्हें वचन सुनाये
    (पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम
    करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा
    समझाकर कहिये॥ ३॥
    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
    मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
    आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ४॥

२४ * श्रीरामचरितमानस *
क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर
मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे
प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने
(घर बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं?॥४॥
[दोहा ६]
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
तब हनुमान्‌जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना
नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और
श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और
आनन्दमें] मग्न हो गये॥६॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥
[विभीषणजीने कहा—] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं
यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात!
मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी
मुझपर कृपा करेंगे?॥१॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं
और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे

  • सुन्दरकाण्ड * २५
    हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा
    है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते ॥ २ ॥
    जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
    तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
    करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३॥
    जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके
    (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमान्जीने कहा—] हे
    विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा
    ही प्रेम किया करते हैं॥ ३॥
    कहहु कवन मैं परम कुलीना।
    कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
    प्रात लेइ जो नाम हमारा।
    तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ ४॥
    भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका] चञ्चल
    वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों
    (बंदरों)-का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥
    [दोहा ७]
    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
    हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो
    मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके
    हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ ७॥
    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
    फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥

२६ * श्रीरामचरितमानस *
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १ ॥
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी)-को भुलाकर
[विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस
प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय
(परम) शान्ति प्राप्त की॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥ २ ॥
फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लङ्कामें)
रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्जीने कहा—हे भाई!
सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ॥ ३ ॥
विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह
सुनायीं। तब हनुमान्जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका
मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके
जिस भागमें) सीताजी रहती थीं॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥

  • सुन्दरकाण्ड * २७
    कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
    जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥
    सीताजीको देखकर हनुमान्‌जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया।
    उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला
    हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें
    श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥ ४ ॥
    [दोहा ८]
    निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
    परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥
    श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी
    ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है।
    जानकीजीको दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्‌जी बहुत ही
    दुःखी हुए॥ ८ ॥
    तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।
    करइ बिचार करौं का भाई॥
    तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
    संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
    हनुमान्‌जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि
    हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय
    बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १ ॥
    बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
    साम दान भय भेद देखावा ॥
    कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
    मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥

२८ * श्रीरामचरितमानस *
उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान,
भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा—हे सुमुखि ! हे सयानी !
सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको—॥ २ ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार
मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश
श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा)
करके कहने लगीं—॥ ३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४॥
हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल
सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं—तू [अपने लिये भी]
ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर
नहीं है॥ ४॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५॥
रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे
लज्जा नहीं आती? ॥ ५॥

  • सुन्दरकाण्ड * २९
    [दोहा ९]
    आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
    परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
    अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान
    सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार
    निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला—॥९॥
    सीता तैं मम कृत अपमाना।
    कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
    नाहिं त सपदि मानु मम बानी।
    सुमुखि होति न त जीवन हानी॥१॥
    सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर
    कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान
    ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा!॥१॥
    स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
    प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
    सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
    सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥२॥
    [सीताजीने कहा—] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम
    कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट
    तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी
    भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥२॥
    चंद्रहास हरु मम परितापं।
    रघुपति बिरह अनल संजातं॥
    सीतल निसित बहसि बर धारा।
    कह सीता हरु मम दुख भारा॥३॥

३० * श्रीरामचरितमानस *
सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके
विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे
तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी
धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय
दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब
रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको
बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५॥
यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार
निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥
[दोहा १०]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह
बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौँ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १॥

  • सुन्दरकाण्ड * ३१
    उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके
    चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान)-में निपुण थी। उसने
    सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी
    सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥१॥
    सपनें बानर लंका जारी।
    जातुधान सेना सब मारी॥
    खर आरूढ़ नगन दससीसा।
    मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥२॥
    स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी
    सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है।
    उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥२॥
    एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
    लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
    नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
    तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
    इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है
    और मानो लङ्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी
    दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥३॥
    यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
    होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
    तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
    जनकसुता के चरनन्हि परीं॥४॥

३२ * श्रीरामचरितमानस *
मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार
(कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे
सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥
[दोहा ११]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी
मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस
रावण मुझे मारेगा॥ ११॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १॥
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं—हे माता! तू मेरी
विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं
शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं
जाता॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें
आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी
शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने?॥ २॥

विभीषण-मिलन, अशोक वाटिका, सीता-संवाद एवं मुद्रिका-प्रदान (दोहा ९-१९)

  • सुन्दरकाण्ड * ३३
    सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
    प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
    निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
    अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३॥
    सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें
    समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने
    कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी।
    ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥
    कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
    मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
    देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
    अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४॥
    सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता
    ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी।
    आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी
    तारा नहीं आता॥ ४॥
    पावकमय ससि स्रवत न आगी।
    मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
    सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
    सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५॥
    चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी
    जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन!
    मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥

३४ * श्रीरामचरितमानस *
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-
रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक
न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण
हनुमान्‌जीको कल्पके समान बीता॥ ६ ॥
[सोरठा १२]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
तब हनुमान्‌जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी
डाल दी, मानो अशोकने अंगारा दे दिया। [यह समझकर]
सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १ ॥
तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर
अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर
उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥

  • सुन्दरकाण्ड * ३५
    सीता मन बिचार कर नाना।
    मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २॥
    [वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें
    कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे
    सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती।
    सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय
    हनुमान्‌जी मधुर वचन बोले—॥ २॥
    रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
    सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
    लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
    आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३॥
    वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके]
    सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर
    उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्‌जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह
    सुनायी॥ ३॥
    श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
    कही सो प्रगट होति किन भाई॥
    तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
    फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४॥
    [सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह
    सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब
    हनुमान्‌जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख
    फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥

३६ * श्रीरामचरितमानस *

राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत
हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी
मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी
(निशानी या पहिचान) दी है॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ?
तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही॥६॥
[दोहा १३]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास
उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और
वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥१३॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहूँ जलजाना॥१॥
भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो
गयी। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त

  • सुन्दरकाण्ड * ३७
    पुलकित हो गया। [सीताजीने कहा—] हे तात हनुमान्!
    विरहसागरमें डूबती हुई मुझको तुम जहाज हुए॥ १ ॥
    अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी।
    अनुज सहित सुख भवन खरारी॥
    कोमलचित कृपाल रघुराई।
    कपि केहि हेतु धरी निठुराई॥ २ ॥
    मैं बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित खरके
    शत्रु सुखधाम प्रभुका कुशल-मङ्गल कहो। श्रीरघुनाथजी तो
    कोमलहृदय और कृपालु हैं। फिर हे हनुमान्! उन्होंने किस
    कारण यह निष्ठुरता धारण कर ली है?॥ २॥
    सहज बानि सेवक सुखदायक।
    कबहुँक सुरति करत रघुनायक॥
    कबहुँ नयन मम सीतल ताता।
    होइहहिं निरखि स्याम मृदु गाता॥ ३॥
    सेवकको सुख देना उनकी स्वाभाविक बान है। वे श्रीरघुनाथजी
    क्या कभी मेरी भी याद करते हैं? हे तात! क्या कभी उनके
    कोमल साँवले अङ्गोंको देखकर मेरे नेत्र शीतल होंगे?॥ ३॥
    बचनु न आव नयन भरे बारी।
    अहह नाथ हौं निपट बिसारी॥
    देखि परम बिरहाकुल सीता।
    बोला कपि मृदु बचन बिनीता॥ ४॥
    [मुँहसे ] वचन नहीं निकलता, नेत्रोंमें [विरहके आँसुओंका]

३८ * श्रीरामचरितमानस *
जल भर आया। [बड़े दुःखसे वे बोलीं—] हा नाथ! आपने मुझे
बिलकुल ही भुला दिया! सीताजीको विरहसे परम व्याकुल
देखकर हनुमान्‌जी कोमल और विनीत वचन बोले—॥४॥
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता।
तव दुख दुखी सुकृपा निकेता॥
जनि जननी मानहु जियँ ऊना।
तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना॥५॥
हे माता! सुन्दर कृपाके धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजीके सहित
[शरीरसे ] कुशल हैं, परन्तु आपके दुःखसे दुःखी हैं। हे माता!
मनमें ग्लानि न मानिये (मन छोटा करके दुःख न कीजिये)।
श्रीरामचन्द्रजीके हृदयमें आपसे दूना प्रेम है॥५॥
[दोहा १४]
रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयउ भरे बिलोचन नीर॥
हे माता! अब धीरज धरकर श्रीरघुनाथजीका संदेश सुनिये।
ऐसा कहकर हनुमान्‌जी प्रेमसे गद्गद हो गये। उनके नेत्रोंमें
[प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥१४॥
कहेउ राम बियोग तव सीता।
मो कहुँ सकल भए बिपरीता॥
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू।
कालनिसा सम निसि ससि भानू॥१॥
[हनुमान्‌जी बोले—] श्रीरामचन्द्रजीने कहा है कि हे सीते!
तुम्हारे वियोगमें मेरे लिये सभी पदार्थ प्रतिकूल हो गये हैं।
वृक्षोंके नये-नये कोमल पत्ते मानो अग्निके समान, रात्रि

  • सुन्दरकाण्ड * ३९
    कालरात्रिके समान, चन्द्रमा सूर्यके समान ॥ १॥
    कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
    बारिद तपत तेल जनु बरिसा॥
    जे हित रहे करत तेइ पीरा।
    उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा॥ २॥
    और कमलोंके वन भालोंके वनके समान हो गये हैं। मेघ
    मानो खौलता हुआ तेल बरसाते हैं। जो हित करनेवाले थे, वे
    ही अब पीड़ा देने लगे हैं। त्रिविध (शीतल, मन्द, सुगन्ध) वायु
    साँपके श्वासके समान (जहरीली और गरम) हो गयी है॥ २॥
    कहेहू तें कछु दुख घटि होई।
    काहि कहौं यह जान न कोई॥
    तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा।
    जानत प्रिया एकु मनु मोरा॥ ३॥
    मनका दुःख कह डालनेसे भी कुछ घट जाता है। पर कहूँ
    किससे? यह दुःख कोई जानता नहीं। हे प्रिये! मेरे और तेरे
    प्रेमका तत्त्व (रहस्य) एक मेरा मन ही जानता है॥ ३॥
    सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं।
    जानु प्रीति रसु एतनेहि माहीं॥
    प्रभु संदेसु सुनत बैदेही।
    मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही॥ ४॥
    और वह मन सदा तेरे ही पास रहता है। बस, मेरे प्रेमका
    सार इतनेमें ही समझ ले। प्रभुका सन्देश सुनते ही जानकीजी
    प्रेममें मग्न हो गयीं। उन्हें शरीरकी सुध न रही॥ ४॥

४० * श्रीरामचरितमानस *
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता।
सुमिरु राम सेवक सुखदाता॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई।
सुनि मम बचन तजहु कदराई॥ ५॥
हनुमान्‌जीने कहा—हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीका स्मरण करो। श्रीरघुनाथजीकी
प्रभुताको हृदयमें लाओ और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़
दो॥ ५॥
[दोहा १५]
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु॥
राक्षसोंके समूह पतंगोंके समान और श्रीरघुनाथजीके बाण
अग्निके समान हैं। हे माता! हृदयमें धैर्य धारण करो और
राक्षसोंको जला ही समझो॥ १५॥
जौं रघुबीर होति सुधि पाई।
करते नहिं बिलंबु रघुराई॥
राम बान रबि उएँ जानकी।
तम बरूथ कहँ जातुधान की॥ १॥
श्रीरामचन्द्रजीने यदि खबर पायी होती तो वे विलम्ब न
करते। हे जानकीजी! रामबाणरूपी सूर्यके उदय होनेपर राक्षसोंकी
सेनारूपी अन्धकार कहाँ रह सकता है?॥ १॥
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई।
प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई॥

  • सुन्दरकाण्ड * ४१
    कछुक दिवस जननी धरु धीरा।
    कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ॥ २ ॥
    हे माता! मैं आपको अभी यहाँसे लिवा जाऊँ; पर
    श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ है, मुझे प्रभु (उन)-की आज्ञा नहीं है।
    [अतः] हे माता! कुछ दिन और धीरज धरो। श्रीरामचन्द्रजी
    वानरोंसहित यहाँ आवेंगे ॥ २ ॥
    निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं।
    तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं ॥
    हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना।
    जातुधान अति भट बलवाना ॥ ३ ॥
    और राक्षसोंको मारकर आपको ले जायँगे। नारद आदि
    [ऋषि-मुनि] तीनों लोकोंमें उनका यश गावेंगे। [सीताजीने
    कहा—] हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान (नन्हें-नन्हें-से)
    होंगे, राक्षस तो बड़े बलवान् योद्धा हैं ॥ ३ ॥
    मोरें हृदय परम संदेहा।
    सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा ॥
    कनक भूधराकार सरीरा।
    समर भयंकर अतिबल बीरा ॥ ४ ॥
    अतः मेरे हृदयमें बड़ा भारी सन्देह होता है [कि तुम-जैसे
    बंदर राक्षसोंको कैसे जीतेंगे!] यह सुनकर हनुमान्जीने अपना
    शरीर प्रकट किया। सोनेके पर्वत (सुमेरु)-के आकारका
    (अत्यन्त विशाल) शरीर था, जो युद्धमें शत्रुओंके हृदयमें भय
    उत्पन्न करनेवाला, अत्यन्त बलवान् और वीर था ॥ ४ ॥

४२ * श्रीरामचरितमानस *
सीता मन भरोस तब भयऊ।
पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥५॥
तब (उसे देखकर) सीताजीके मनमें विश्वास हुआ। हनुमान्जीने
फिर छोटा रूप धारण कर लिया॥ ५॥
[दोहा १६]
सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥
हे माता! सुनो, वानरोंमें बहुत बल-बुद्धि नहीं होती। परन्तु
प्रभुके प्रतापसे बहुत छोटा सर्प भी गरुड़को खा सकता है
(अत्यन्त निर्बल भी महान् बलवान्को मार सकता है) ॥ १६ ॥
मन संतोष सुनत कपि बानी।
भगति प्रताप तेज बल सानी॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना।
होहु तात बल सील निधाना॥ १॥
भक्ति, प्रताप, तेज और बलसे सनी हुई हनुमान्जीकी वाणी
सुनकर सीताजीके मनमें सन्तोष हुआ। उन्होंने श्रीरामजीके प्रिय
जानकर हनुमान्जीको आशीर्वाद दिया कि हे तात! तुम बल
और शीलके निधान होओ॥ १॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ २॥
हे पुत्र! तुम अजर (बुढ़ापेसे रहित), अमर और गुणोंके