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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 25
  • सुन्दरकाण्ड * २५
    हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा
    है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते ॥ २ ॥
    जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
    तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
    सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
    करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३॥
    जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके
    (अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमान्जीने कहा—] हे
    विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा
    ही प्रेम किया करते हैं॥ ३॥
    कहहु कवन मैं परम कुलीना।
    कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
    प्रात लेइ जो नाम हमारा।
    तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ ४॥
    भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका] चञ्चल
    वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों
    (बंदरों)-का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥
    [दोहा ७]
    अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
    कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
    हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो
    मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके
    हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ ७॥
    जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
    फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥