सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 27
- सुन्दरकाण्ड * २७
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥
सीताजीको देखकर हनुमान्जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया।
उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला
हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें
श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥ ४ ॥
[दोहा ८]
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥
श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी
ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है।
जानकीजीको दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत ही
दुःखी हुए॥ ८ ॥
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि
हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय
बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥