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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 23
  • सुन्दरकाण्ड * २३
    लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन
    (साधु पुरुष)-का निवास कहाँ? हनुमान्‌जी मनमें इस प्रकार
    तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥
    राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
    हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
    एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
    साधु ते होइ न कारज हानी॥ २॥
    उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया।
    हनुमान्‌जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [हनुमान्‌जीने
    विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय
    करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ
    ही होता है]॥ २॥
    बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
    सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
    करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
    बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ ३॥
    ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्‌जीने उन्हें वचन सुनाये
    (पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम
    करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा
    समझाकर कहिये॥ ३॥
    की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
    मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
    की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
    आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ४॥