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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

२६ * श्रीरामचरितमानस *
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १ ॥
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी)-को भुलाकर
[विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस
प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय
(परम) शान्ति प्राप्त की॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥ २ ॥
फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लङ्कामें)
रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्जीने कहा—हे भाई!
सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ॥ ३ ॥
विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह
सुनायीं। तब हनुमान्जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका
मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके
जिस भागमें) सीताजी रहती थीं॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥