सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 29
- सुन्दरकाण्ड * २९
[दोहा ९]
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान
सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार
निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला—॥९॥
सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥१॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर
कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान
ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा!॥१॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥२॥
[सीताजीने कहा—] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम
कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट
तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी
भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥२॥
चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
कह सीता हरु मम दुख भारा॥३॥