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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

२८ * श्रीरामचरितमानस *
उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान,
भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा—हे सुमुखि ! हे सयानी !
सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको—॥ २ ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार
मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश
श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा)
करके कहने लगीं—॥ ३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४॥
हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल
सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं—तू [अपने लिये भी]
ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर
नहीं है॥ ४॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५॥
रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे
लज्जा नहीं आती? ॥ ५॥