सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ * श्रीरामचरितमानस *
क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर
मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे
प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने
(घर बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं?॥४॥
[दोहा ६]
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
तब हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना
नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और
श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और
आनन्दमें] मग्न हो गये॥६॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥
[विभीषणजीने कहा—] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं
यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात!
मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी
मुझपर कृपा करेंगे?॥१॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं
और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे