सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
- सुन्दरकाण्ड * १७
भी किया। हनुमान्जीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ ३॥
पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमान्जी उसको मारकर समुद्रके
पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु
(पुष्परस)-के लोभसे भौंरे गुञ्जार कर रहे थे॥ ३॥
नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४॥
अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और
पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए।
सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान्जी भय त्यागकर उसपर
दौड़कर जा चढ़े॥ ४॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ
बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता
है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला
है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥
१८ * श्रीरामचरितमानस *
अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६ ॥
वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके
परकोटे (चहारदीवारी)-का परम प्रकाश हो रहा है॥ ६॥
[छन्द १]
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके
अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग
और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी,
घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन
गिन सकता है ? अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त
बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती॥ १॥
[छन्द २]
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और
बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी
कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं।
कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल
(पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे
भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं॥ २॥
- सुन्दरकाण्ड * १९
[छन्द ३]
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे)
नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं
दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे
हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है
कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको
त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥
[दोहा ३]
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्जीने मनमें
विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय
नगरमें प्रवेश करूँ॥ ३॥
मसक समान रूप कपि धरी।
लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
नाम लंकिनी एक निसिचरी।
सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १॥
हनुमान्जी मच्छरके समान (छोटा-सा) रूप धारण कर
नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके
लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी
रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे)
२० * श्रीरामचरितमानस *
कहाँ चला जा रहा है?॥ १॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २॥
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं,
वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा,
जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥
पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३॥
वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे
हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब
ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके
विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि—॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि के मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४॥
जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका
संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं
श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप)-को नेत्रोंसे देख पायी॥ ४॥
- सुन्दरकाण्ड * २१
[दोहा ४]
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक
पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे
हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्रके
सत्सङ्गसे होता है॥४॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥१॥
अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें
प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो
जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर
हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है॥१॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥२॥
और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो
जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया।
तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और
भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया॥२॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥
२२ * श्रीरामचरितमानस *
गयउ दसानन मंदिर माहीं।
अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ ३॥
उन्होंने एक-एक (प्रत्येक) महलकी खोज की। जहाँ-तहाँ
असंख्य योद्धा देखे। फिर वे रावणके महलमें गये। वह अत्यन्त
विचित्र था, जिसका वर्णन नहीं हो सकता॥ ३॥
सयन किएँ देखा कपि तेही।
मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥
भवन एक पुनि दीख सुहावा।
हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥ ४॥
हनुमान्जीने उस (रावण)-को शयन किये देखा; परन्तु
महलमें जानकीजी नहीं दिखायी दीं। फिर एक सुन्दर महल
दिखायी दिया। वहाँ (उसमें) भगवान्का एक अलग मन्दिर बना
हुआ था॥ ४॥
[दोहा ५]
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराइ॥
वह महल श्रीरामजीके आयुध (धनुष-बाण)-के चिह्नोंसे
अङ्कित था, उसकी शोभा वर्णन नहीं की जा सकती। वहाँ नवीन-
नवीन तुलसीके वृक्ष-समूहोंको देखकर कपिराज श्रीहनुमान्जी
हर्षित हुए॥ ५॥
लंका निसिचर निकर निवासा।
इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ १॥
- सुन्दरकाण्ड * २३
लङ्का तो राक्षसोंके समूहका निवासस्थान है। यहाँ सज्जन
(साधु पुरुष)-का निवास कहाँ? हनुमान्जी मनमें इस प्रकार
तर्क करने लगे। उसी समय विभीषणजी जागे॥ १॥
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी॥ २॥
उन्होंने (विभीषणने) रामनामका स्मरण (उच्चारण) किया।
हनुमान्जीने उन्हें सज्जन जाना और हृदयमें हर्षित हुए। [हनुमान्जीने
विचार किया कि] इनसे हठ करके (अपनी ओरसे ही) परिचय
करूँगा, क्योंकि साधुसे कार्यकी हानि नहीं होती [प्रत्युत लाभ
ही होता है]॥ २॥
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥ ३॥
ब्राह्मणका रूप धरकर हनुमान्जीने उन्हें वचन सुनाये
(पुकारा)। सुनते ही विभीषणजी उठकर वहाँ आये। प्रणाम
करके कुशल पूछी [और कहा कि] हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा
समझाकर कहिये॥ ३॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई॥
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ४॥
२४ * श्रीरामचरितमानस *
क्या आप हरिभक्तोंमेंसे कोई हैं? क्योंकि आपको देखकर
मेरे हृदयमें अत्यन्त प्रेम उमड़ रहा है। अथवा क्या आप दीनोंसे
प्रेम करनेवाले स्वयं श्रीरामजी ही हैं, जो मुझे बड़भागी बनाने
(घर बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने) आये हैं?॥४॥
[दोहा ६]
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम॥
तब हनुमान्जीने श्रीरामचन्द्रजीकी सारी कथा कहकर अपना
नाम बताया। सुनते ही दोनोंके शरीर पुलकित हो गये और
श्रीरामजीके गुणसमूहोंका स्मरण करके दोनोंके मन [प्रेम और
आनन्दमें] मग्न हो गये॥६॥
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहिं कृपा भानुकुल नाथा॥१॥
[विभीषणजीने कहा—] हे पवनपुत्र! मेरी रहनी सुनो। मैं
यहाँ वैसे ही रहता हूँ, जैसे दाँतोंके बीचमें बेचारी जीभ। हे तात!
मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुलके नाथ श्रीरामचन्द्रजी क्या कभी
मुझपर कृपा करेंगे?॥१॥
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं॥
अब मोहि भा भरोस हनुमंता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥२॥
मेरा तामसी (राक्षस) शरीर होनेसे साधन तो कुछ बनता नहीं
और न मनमें श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमलोंमें प्रेम ही है। परन्तु हे
- सुन्दरकाण्ड * २५
हनुमान्! अब मुझे विश्वास हो गया कि श्रीरामजीकी मुझपर कृपा
है; क्योंकि हरिकी कृपाके बिना संत नहीं मिलते ॥ २ ॥
जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।
तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।
करहिं सदा सेवक पर प्रीती॥ ३॥
जब श्रीरघुवीरने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके
(अपनी ओरसे) दर्शन दिये हैं। [हनुमान्जीने कहा—] हे
विभीषणजी! सुनिये, प्रभुकी यही रीति है कि वे सेवकपर सदा
ही प्रेम किया करते हैं॥ ३॥
कहहु कवन मैं परम कुलीना।
कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा।
तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥ ४॥
भला कहिये, मैं ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? [जातिका] चञ्चल
वानर हूँ और सब प्रकारसे नीच हूँ। प्रातःकाल जो हमलोगों
(बंदरों)-का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले॥ ४॥
[दोहा ७]
अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर॥
हे सखा! सुनिये, मैं ऐसा अधम हूँ; पर श्रीरामचन्द्रजीने तो
मुझपर भी कृपा ही की है। भगवान्के गुणोंका स्मरण करके
हनुमान्जीके दोनों नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया॥ ७॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी।
फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी॥
२६ * श्रीरामचरितमानस *
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा।
पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा॥ १ ॥
जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी)-को भुलाकर
[विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुःखी क्यों न हों? इस
प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय
(परम) शान्ति प्राप्त की॥ १ ॥
पुनि सब कथा बिभीषन कही।
जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही॥
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता।
देखी चहउँ जानकी माता॥ २ ॥
फिर विभीषणजीने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहाँ (लङ्कामें)
रहती थीं, वह सब कथा कही। तब हनुमान्जीने कहा—हे भाई!
सुनो, मैं जानकी माताको देखना चाहता हूँ॥ २ ॥
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई।
चलेउ पवनसुत बिदा कराई॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ।
बन असोक सीता रह जहवाँ॥ ३ ॥
विभीषणजीने [माताके दर्शनकी] सब युक्तियाँ (उपाय) कह
सुनायीं। तब हनुमान्जी विदा लेकर चले। फिर वही (पहलेका
मसक-सरीखा) रूप धरकर वहाँ गये, जहाँ अशोकवनमें (वनके
जिस भागमें) सीताजी रहती थीं॥ ३ ॥
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
- सुन्दरकाण्ड * २७
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी ॥ ४ ॥
सीताजीको देखकर हनुमान्जीने उन्हें मनहीमें प्रणाम किया।
उन्हें बैठे-ही-बैठे रात्रिके चारों पहर बीत जाते हैं। शरीर दुबला
हो गया है, सिरपर जटाओंकी एक वेणी (लट) है। हृदयमें
श्रीरघुनाथजीके गुणसमूहोंका जाप (स्मरण) करती रहती हैं॥ ४ ॥
[दोहा ८]
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥
श्रीजानकीजी नेत्रोंको अपने चरणोंमें लगाये हुए हैं (नीचेकी
ओर देख रही हैं) और मन श्रीरामजीके चरणकमलोंमें लीन है।
जानकीजीको दीन (दुःखी) देखकर पवनपुत्र हनुमान्जी बहुत ही
दुःखी हुए॥ ८ ॥
तरु पल्लव महँ रहा लुकाई।
करइ बिचार करौं का भाई॥
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा।
संग नारि बहु किएँ बनावा ॥ १ ॥
हनुमान्जी वृक्षके पत्तोंमें छिप रहे और विचार करने लगे कि
हे भाई! क्या करूँ (इनका दुःख कैसे दूर करूँ)? उसी समय
बहुत-सी स्त्रियोंको साथ लिये सज-धजकर रावण वहाँ आया॥ १ ॥
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा।
साम दान भय भेद देखावा ॥
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी।
मंदोदरी आदि सब रानी ॥ २ ॥
२८ * श्रीरामचरितमानस *
उस दुष्टने सीताजीको बहुत प्रकारसे समझाया। साम, दान,
भय और भेद दिखलाया। रावणने कहा—हे सुमुखि ! हे सयानी !
सुनो। मन्दोदरी आदि सब रानियोंको—॥ २ ॥
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा।
एक बार बिलोकु मम ओरा॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही।
सुमिरि अवधपति परम सनेही॥ ३॥
मैं तुम्हारी दासी बना दूँगा, यह मेरा प्रण है। तुम एक बार
मेरी ओर देखो तो सही! अपने परम स्नेही कोसलाधीश
श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके जानकीजी तिनकेकी आड़ (परदा)
करके कहने लगीं—॥ ३॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा।
कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥
अस मन समुझु कहति जानकी।
खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ४॥
हे दशमुख! सुन, जुगनूके प्रकाशसे कभी कमलिनी खिल
सकती है? जानकीजी फिर कहती हैं—तू [अपने लिये भी]
ऐसा ही मनमें समझ ले। रे दुष्ट! तुझे श्रीरघुवीरके बाणकी खबर
नहीं है॥ ४॥
सठ सूनें हरि आनेहि मोही।
अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ ५॥
रे पापी! तू मुझे सूनेमें हर लाया है। रे अधम! निर्लज्ज! तुझे
लज्जा नहीं आती? ॥ ५॥
- सुन्दरकाण्ड * २९
[दोहा ९]
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन॥
अपनेको जुगनूके समान और रामचन्द्रजीको सूर्यके समान
सुनकर और सीताजीके कठोर वचनोंको सुनकर रावण तलवार
निकालकर बड़े गुस्सेमें आकर बोला—॥९॥
सीता तैं मम कृत अपमाना।
कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना॥
नाहिं त सपदि मानु मम बानी।
सुमुखि होति न त जीवन हानी॥१॥
सीता! तूने मेरा अपमान किया है। मैं तेरा सिर इस कठोर
कृपाणसे काट डालूँगा। नहीं तो [अब भी] जल्दी मेरी बात मान
ले। हे सुमुखि! नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा!॥१॥
स्याम सरोज दाम सम सुंदर।
प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर॥
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा।
सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा॥२॥
[सीताजीने कहा—] हे दशग्रीव! प्रभुकी भुजा जो श्याम
कमलकी मालाके समान सुन्दर और हाथीकी सूँड़के समान [पुष्ट
तथा विशाल] है, या तो वह भुजा ही मेरे कण्ठमें पड़ेगी या तेरी
भयानक तलवार ही। रे शठ! सुन, यही मेरा सच्चा प्रण है॥२॥
चंद्रहास हरु मम परितापं।
रघुपति बिरह अनल संजातं॥
सीतल निसित बहसि बर धारा।
कह सीता हरु मम दुख भारा॥३॥
३० * श्रीरामचरितमानस *
सीताजी कहती हैं—हे चन्द्रहास (तलवार) ! श्रीरघुनाथजीके
विरहकी अग्निसे उत्पन्न मेरी बड़ी भारी जलनको तू हर ले। हे
तलवार! तू शीतल, तीव्र और श्रेष्ठ धारा बहाती है (अर्थात् तेरी
धारा ठंडी और तेज है), तू मेरे दुःखके बोझको हर ले॥ ३॥
सुनत बचन पुनि मारन धावा।
मयतनयाँ कहि नीति बुझावा॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई।
सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई॥ ४॥
सीताजीके ये वचन सुनते ही वह मारने दौड़ा। तब मय
दानवकी पुत्री मन्दोदरीने नीति कहकर उसे समझाया। तब
रावणने सब राक्षसियोंको बुलाकर कहा कि जाकर सीताको
बहुत प्रकारसे भय दिखलाओ॥ ४॥
मास दिवस महुँ कहा न माना।
तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना॥ ५॥
यदि महीनेभरमें यह कहा न माने तो मैं इसे तलवार
निकालकर मार डालूँगा॥ ५॥
[दोहा १०]
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद॥
[यों कहकर] रावण घर चला गया। यहाँ राक्षसियोंके समूह
बहुत-से बुरे रूप धरकर सीताजीको भय दिखलाने लगे॥ १०॥
त्रिजटा नाम राच्छसी एका।
राम चरन रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौँ बोलि सुनाएसि सपना।
सीतहि सेइ करहु हित अपना॥ १॥
- सुन्दरकाण्ड * ३१
उनमें एक त्रिजटा नामकी राक्षसी थी। उसकी श्रीरामचन्द्रजीके
चरणोंमें प्रीति थी और वह विवेक (ज्ञान)-में निपुण थी। उसने
सबोंको बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया और कहा—सीताजीकी
सेवा करके अपना कल्याण कर लो॥१॥
सपनें बानर लंका जारी।
जातुधान सेना सब मारी॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा।
मुंडित सिर खंडित भुज बीसा॥२॥
स्वप्नमें [मैंने देखा कि] एक बंदरने लङ्का जला दी। राक्षसोंकी
सारी सेना मार डाली गयी। रावण नंगा है और गदहेपर सवार है।
उसके सिर मुँड़े हुए हैं, बीसों भुजाएँ कटी हुई हैं॥२॥
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई।
लंका मनहुँ बिभीषन पाई॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई।
तब प्रभु सीता बोलि पठाई॥३॥
इस प्रकारसे वह दक्षिण (यमपुरीकी) दिशाको जा रहा है
और मानो लङ्का विभीषणने पायी है। नगरमें श्रीरामचन्द्रजीकी
दुहाई फिर गयी। तब प्रभुने सीताजीको बुला भेजा॥३॥
यह सपना मैं कहउँ पुकारी।
होइहि सत्य गएँ दिन चारी॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीं।
जनकसुता के चरनन्हि परीं॥४॥
३२ * श्रीरामचरितमानस *
मैं पुकारकर (निश्चयके साथ) कहती हूँ कि यह स्वप्न चार
(कुछ ही) दिनों बाद सत्य होकर रहेगा। उसके वचन सुनकर वे
सब राक्षसियाँ डर गयीं और जानकीजीके चरणोंपर गिर पड़ीं ॥ ४ ॥
[दोहा ११]
जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच॥
तब (इसके बाद) वे सब जहाँ-तहाँ चली गयीं। सीताजी
मनमें सोच करने लगीं कि एक महीना बीत जानेपर नीच राक्षस
रावण मुझे मारेगा॥ ११॥
त्रिजटा सन बोलीं कर जोरी।
मातु बिपति संगिनि तैं मोरी॥
तजौं देह करु बेगि उपाई।
दुसह बिरहु अब नहिं सहि जाई॥ १॥
सीताजी हाथ जोड़कर त्रिजटासे बोलीं—हे माता! तू मेरी
विपत्तिकी संगिनी है। जल्दी कोई ऐसा उपाय कर जिससे मैं
शरीर छोड़ सकूँ। विरह असह्य हो चला है, अब यह सहा नहीं
जाता॥ १॥
आनि काठ रचु चिता बनाई।
मातु अनल पुनि देहि लगाई॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी।
सुनै को श्रवन सूल सम बानी॥ २॥
काठ लाकर चिता बनाकर सजा दे। हे माता! फिर उसमें
आग लगा दे। हे सयानी! तू मेरी प्रीतिको सत्य कर दे। रावणकी
शूलके समान दुःख देनेवाली वाणी कानोंसे कौन सुने?॥ २॥
विभीषण-मिलन, अशोक वाटिका, सीता-संवाद एवं मुद्रिका-प्रदान (दोहा ९-१९)
- सुन्दरकाण्ड * ३३
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि।
प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि॥
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी।
अस कहि सो निज भवन सिधारी॥ ३॥
सीताजीके वचन सुनकर त्रिजटाने चरण पकड़कर उन्हें
समझाया और प्रभुका प्रताप, बल और सुयश सुनाया। [उसने
कहा—] हे सुकुमारी! सुनो, रात्रिके समय आग नहीं मिलेगी।
ऐसा कहकर वह अपने घर चली गयी॥ ३॥
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला।
मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला॥
देखिअत प्रगट गगन अंगारा।
अवनि न आवत एकउ तारा॥ ४॥
सीताजी [मन-ही-मन] कहने लगीं—[क्या करूँ] विधाता
ही विपरीत हो गया। न आग मिलेगी, न पीड़ा मिटेगी।
आकाशमें अंगारे प्रकट दिखायी दे रहे हैं, पर पृथ्वीपर एक भी
तारा नहीं आता॥ ४॥
पावकमय ससि स्रवत न आगी।
मानहुँ मोहि जानि हतभागी॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका।
सत्य नाम करु हरु मम सोका॥ ५॥
चन्द्रमा अग्निमय है, किन्तु वह भी मानो मुझे हतभागिनी
जानकर आग नहीं बरसाता। हे अशोकवृक्ष! मेरी विनती सुन!
मेरा शोक हर ले और अपना [अशोक] नाम सत्य कर॥ ५॥
३४ * श्रीरामचरितमानस *
नूतन किसलय अनल समाना।
देहि अगिनि जनि करहि निदाना॥
देखि परम बिरहाकुल सीता।
सो छन कपिहि कलप सम बीता॥ ६ ॥
तेरे नये-नये कोमल पत्ते अग्निके समान हैं। अग्नि दे, विरह-
रोगका अन्त मत कर (अर्थात् विरह-रोगको बढ़ाकर सीमातक
न पहुँचा)। सीताजीको विरहसे परम व्याकुल देखकर वह क्षण
हनुमान्जीको कल्पके समान बीता॥ ६ ॥
[सोरठा १२]
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥
तब हनुमान्जीने हृदयमें विचारकर [सीताजीके सामने] अँगूठी
डाल दी, मानो अशोकने अंगारा दे दिया। [यह समझकर]
सीताजीने हर्षित होकर उठकर उसे हाथमें ले लिया॥ १२॥
तब देखी मुद्रिका मनोहर।
राम नाम अंकित अति सुंदर॥
चकित चितव मुदरी पहिचानी।
हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ १ ॥
तब उन्होंने राम-नामसे अङ्कित अत्यन्त सुन्दर एवं मनोहर
अँगूठी देखी। अँगूठीको पहचानकर सीताजी आश्चर्यचकित होकर
उसे देखने लगीं और हर्ष तथा विषादसे हृदयमें अकुला उठीं॥ १ ॥
जीति को सकइ अजय रघुराई।
माया तें असि रचि नहिं जाई॥
- सुन्दरकाण्ड * ३५
सीता मन बिचार कर नाना।
मधुर बचन बोलेउ हनुमाना॥ २॥
[वे सोचने लगीं—] श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय हैं, उन्हें
कौन जीत सकता है? और मायासे ऐसी (मायाके उपादानसे
सर्वथा रहित दिव्य, चिन्मय) अँगूठी बनायी नहीं जा सकती।
सीताजी मनमें अनेक प्रकारके विचार कर रही थीं। इसी समय
हनुमान्जी मधुर वचन बोले—॥ २॥
रामचंद्र गुन बरनैं लागा।
सुनतहिं सीता कर दुख भागा॥
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई।
आदिहु तें सब कथा सुनाई॥ ३॥
वे श्रीरामचन्द्रजीके गुणोंका वर्णन करने लगे, [जिनके]
सुनते ही सीताजीका दुःख भाग गया। वे कान और मन लगाकर
उन्हें सुनने लगीं। हनुमान्जीने आदिसे लेकर सारी कथा कह
सुनायी॥ ३॥
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई।
कही सो प्रगट होति किन भाई॥
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ।
फिरि बैठीं मन बिसमय भयऊ॥ ४॥
[सीताजी बोलीं—] जिसने कानोंके लिये अमृतरूप यह
सुन्दर कथा कही, वह हे भाई! प्रकट क्यों नहीं होता? तब
हनुमान्जी पास चले गये। उन्हें देखकर सीताजी फिरकर (मुख
फेरकर) बैठ गयीं; उनके मनमें आश्चर्य हुआ॥ ४॥
३६ * श्रीरामचरितमानस *
राम दूत मैं मातु जानकी।
सत्य सपथ करुनानिधान की॥
यह मुद्रिका मातु मैं आनी।
दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी॥५॥
[हनुमान्जीने कहा—] हे माता जानकी! मैं श्रीरामजीका दूत
हूँ। करुणानिधानकी सच्ची शपथ करता हूँ। हे माता! यह अँगूठी
मैं ही लाया हूँ। श्रीरामजीने मुझे आपके लिये यह सहिदानी
(निशानी या पहिचान) दी है॥५॥
नर बानरहि संग कहु कैसें।
कही कथा भइ संगति जैसें॥६॥
[सीताजीने पूछा—] नर और वानरका सङ्ग कहो कैसे हुआ?
तब हनुमान्जीने जैसे सङ्ग हुआ था, वह सब कथा कही॥६॥
[दोहा १३]
कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास॥
हनुमान्जीके प्रेमयुक्त वचन सुनकर सीताजीके मनमें विश्वास
उत्पन्न हो गया। उन्होंने जान लिया कि यह मन, कर्म और
वचनसे कृपासागर श्रीरघुनाथजीका दास है॥१३॥
हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी।
सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना।
भयहु तात मो कहूँ जलजाना॥१॥
भगवान्का जन (सेवक) जानकर अत्यन्त गाढ़ी प्रीति हो
गयी। नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया और शरीर अत्यन्त