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सर्वकोश
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 18

१८ * श्रीरामचरितमानस *
अति उतंग जलनिधि चहु पासा।
कनक कोट कर परम प्रकासा॥ ६ ॥
वह अत्यन्त ऊँचा है, उसके चारों ओर समुद्र है। सोनेके
परकोटे (चहारदीवारी)-का परम प्रकाश हो रहा है॥ ६॥
[छन्द १]
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥
विचित्र मणियोंसे जड़ा हुआ सोनेका परकोटा है, उसके
अंदर बहुत-से सुन्दर-सुन्दर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुन्दर मार्ग
और गलियाँ हैं; सुन्दर नगर बहुत प्रकारसे सजा हुआ है। हाथी,
घोड़े, खच्चरोंके समूह तथा पैदल और रथोंके समूहोंको कौन
गिन सकता है ? अनेक रूपोंके राक्षसोंके दल हैं, उनकी अत्यन्त
बलवती सेना वर्णन करते नहीं बनती॥ १॥
[छन्द २]
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं॥
कहूँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥
वन, बाग, उपवन (बगीचे), फुलवाड़ी, तालाब, कुएँ और
बावलियाँ सुशोभित हैं। मनुष्य, नाग, देवताओं और गन्धर्वोंकी
कन्याएँ अपने सौन्दर्यसे मुनियोंके भी मनोंको मोहे लेती हैं।
कहीं पर्वतके समान विशाल शरीरवाले बड़े ही बलवान् मल्ल
(पहलवान) गरज रहे हैं। वे अनेकों अखाड़ोंमें बहुत प्रकारसे
भिड़ते और एक-दूसरेको ललकारते हैं॥ २॥