सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * २१
[दोहा ४]
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
हे तात! स्वर्ग और मोक्षके सब सुखोंको तराजूके एक
पलड़ेमें रखा जाय, तो भी वे सब मिलकर [दूसरे पलड़ेपर रखे
हुए] उस सुखके बराबर नहीं हो सकते, जो लव (क्षण)-मात्रके
सत्सङ्गसे होता है॥४॥
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥१॥
अयोध्यापुरीके राजा श्रीरघुनाथजीको हृदयमें रखे हुए नगरमें
प्रवेश करके सब काम कीजिये। उसके लिये विष अमृत हो
जाता है, शत्रु मित्रता करने लगते हैं, समुद्र गायके खुरके बराबर
हो जाता है, अग्निमें शीतलता आ जाती है॥१॥
गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।
राम कृपा करि चितवा जाही॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।
पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥२॥
और हे गरुड़जी! सुमेरु पर्वत उसके लिये रजके समान हो
जाता है, जिसे श्रीरामचन्द्रजीने एक बार कृपा करके देख लिया।
तब हनुमान्जीने बहुत ही छोटा रूप धारण किया और
भगवान्का स्मरण करके नगरमें प्रवेश किया॥२॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।
देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥