सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)
Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा
DevanagariHindipublished128 पृष्ठ
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- सुन्दरकाण्ड * १७
भी किया। हनुमान्जीने तुरंत ही उसका कपट पहचान लिया॥ २॥
ताहि मारि मारुतसुत बीरा।
बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥
तहाँ जाइ देखी बन सोभा।
गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥ ३॥
पवनपुत्र धीरबुद्धि वीर श्रीहनुमान्जी उसको मारकर समुद्रके
पार गये। वहाँ जाकर उन्होंने वनकी शोभा देखी। मधु
(पुष्परस)-के लोभसे भौंरे गुञ्जार कर रहे थे॥ ३॥
नाना तरु फल फूल सुहाए।
खग मृग बृंद देखि मन भाए॥
सैल बिसाल देखि एक आगें।
ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥ ४॥
अनेकों प्रकारके वृक्ष फल-फूलसे शोभित हैं। पक्षी और
पशुओंके समूहको देखकर तो वे मनमें [बहुत ही] प्रसन्न हुए।
सामने एक विशाल पर्वत देखकर हनुमान्जी भय त्यागकर उसपर
दौड़कर जा चढ़े॥ ४॥
उमा न कछु कपि कै अधिकाई।
प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥
गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।
कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥ ५॥
[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! इसमें वानर हनुमान्की कुछ
बड़ाई नहीं है। यह प्रभुका प्रताप है, जो कालको भी खा जाता
है। पर्वतपर चढ़कर उन्होंने लङ्का देखी। बहुत ही बड़ा किला
है, कुछ कहा नहीं जाता॥ ५॥