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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

२० * श्रीरामचरितमानस *
कहाँ चला जा रहा है?॥ १॥
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।
मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥
मुठिका एक महा कपि हनी।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥ २॥
हे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं,
वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्‌जीने उसे एक घूँसा मारा,
जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥
पुनि संभारि उठी सो लंका।
जोरि पानि कर बिनय ससंका॥
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।
चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा॥ ३॥
वह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे
हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब
ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके
विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि—॥ ३॥
बिकल होसि तैं कपि के मारे।
तब जानेसु निसिचर संघारे॥
तात मोर अति पुन्य बहूता।
देखेउँ नयन राम कर दूता॥ ४॥
जब तू बंदरके मारनेसे व्याकुल हो जाय, तब तू राक्षसोंका
संहार हुआ जान लेना। हे तात! मेरे बड़े पुण्य हैं, जो मैं
श्रीरामचन्द्रजीके दूत (आप)-को नेत्रोंसे देख पायी॥ ४॥