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सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड (श्रीरामचरितमानस पंचम सोपान - गीताप्रेस गोरखपुर सविस्तार सटीक)

Sampoorna Sundarkand of Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास (गीताप्रेस गोरखपुर) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 19
  • सुन्दरकाण्ड * १९
    [छन्द ३]
    करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
    कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं॥
    एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
    रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥
    भयंकर शरीरवाले करोड़ों योद्धा यत्न करके (बड़ी सावधानीसे)
    नगरकी चारों दिशाओंमें (सब ओरसे) रखवाली करते हैं। कहीं
    दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गदहों और बकरोंको खा रहे
    हैं। तुलसीदासने इनकी कथा इसीलिये कुछ थोड़ी-सी कही है
    कि ये निश्चय ही श्रीरामचन्द्रजीके बाणरूपी तीर्थमें शरीरोंको
    त्यागकर परमगति पावेंगे॥ ३॥
    [दोहा ३]
    पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
    अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार॥
    नगरके बहुसंख्यक रखवालोंको देखकर हनुमान्‌जीने मनमें
    विचार किया कि अत्यन्त छोटा रूप धरूँ और रातके समय
    नगरमें प्रवेश करूँ॥ ३॥
    मसक समान रूप कपि धरी।
    लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥
    नाम लंकिनी एक निसिचरी।
    सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥ १॥
    हनुमान्‌जी मच्छरके समान (छोटा-सा) रूप धारण कर
    नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके
    लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी
    रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे)