सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
अष्टादश प्रकाश
भूगोल विवरणम्
यत्प्रोचुर्भगवानिति श्रितजनाः सांख्याश्च पातञ्जला-
निर्लेपः पुरुषः परः शिव इति ब्रह्म मेति वेदान्तिनः
न्यायज्ञाः परमात्मशब्द ममृतं कर्मेति मीमांसकाः
सौराद्याः कुलदैवतं किमपि तत् कृष्णारूपं तत्वं भजे । १ ।
आश्रित लोग जिसको ऐश्वर्य शाली (भग-ऐश्वर्य) कहते हैं । सांख्य और
योग में जिसका नाम निर्लिप्त पुरुष और परम शिव, वेदान्त में जिसे ब्रह्म कहा
गया है, न्याय शास्त्र जिसे परमात्मा (अमर) कहता है, मीमांसक जिसे कर्म कहते
हैं तथा सूर्योपासक जिसे कुल देवता कहते हैं, उसी श्रीकृष्ण रूपी तत्व को में
नमस्कार करता हूँ ।
सृष्टिः प्राग् बहुधोदितामुनिवरैः तत् सार भूतां तदा
वक्ष्येऽन्यत्र कृतौ भविष्यदि यदा सृष्टिः तदीया दया
सिद्धान्त प्रथनोचिता मिह पुनः सौरोक्तरीत्या ब्रुवे
पूर्व प्रश्न गणानुवाद विहिता संस्थान मानादि च । २ ।
महर्षियों ने सृष्टि के विषय में बहुत कुछ कहा है यदि भगवान की दया हुयी
तो इस विषय पर विस्तार से एक अन्य ग्रन्थ में कहूँगा । यहां पुनः सूर्य सिद्धान्त
की रीति से इस ग्रन्थ के लिये उपयोगी बातें सृष्टि के बारे में कह रहा हूँ । पहले
कहे हुए प्रश्नों के उत्तर रूप में सृष्टि की स्थिति और परिमाण के विषय में भी
कहूंगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-श्रृणुष्वैक मनास्तत्वं गुह्य मध्यात्म संगितम्
प्रवक्ष्याम्येव भक्तानां नादेयं विद्यते मम । ३ ।
एक मन होकर सुनो क्योंकि अध्यात्म से सम्बन्धित होने के कारण यह तत्व
अति गोपनीय है । मेरे पार ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे भक्तों को न देकर अपने
पास रख लूं ।
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः
अव्यक्तो निर्गुणः शान्ति पञ्चविंशा त्परोऽव्ययः । ४ ।
परम ब्रह्म की मूर्ति ही परम पुरुष वासुदेव हैं । वह निर्गुण, शान्त, अव्यय
और २५ तत्वों से अतिरिक्त हैं ।
प्रकृत्यन्तर्गतो देहो बोध्यमानस्तु सर्वगः
संकर्षणोऽपः सृष्ट्यादौ वासुबीजमथा सृजत् । ५ ।
परम ब्रह्म के अंश रूप संकर्षण ने देहधारी होकर प्रकृति में प्रवेश किया ।
२९० सिद्धान्त दर्पण
वह सर्वगामी और बोध्य है । इससे सर्व प्रथम जल की सृष्टि हुयी और उसमें
संकर्षण ने बीज डाला ।
तदण्डम भवंद् हैमं सर्वमन्तस्तमो वृतम्
तत्रानिरुद्ध प्रथमं व्यक्तीभूत सनातनः । ६ ।
वह बीज सुवर्ण अण्ड में परिणत हुआ जिसके भीतर सिर्फ अन्धकार था ।
उस अन्धकार के भीतर चिरस्थायी अनिरुद्ध प्रकाशित हुये ।
हिरण्यगर्भो भगवाने ष छन्दसि पश्यते
आदित्यो ह्यादि भूतत्वात् प्रसृत्य सूर्य उच्यते । ७ ।
वेद में इस अनिरुद्ध को भगवान हिरण्य गर्भ कहा गया है । यह प्रथम उत्पत्ति
होने के कारण आदित्य सूर्य भी कहा गया ।
परं ज्योतिस्तमः पारे सूर्येऽयं सवितेति च
पर्येति भुवनान्येष भावयन् भूत भावनः । ८ ।
अन्धकार का अन्त करने के कारण इसे परम ज्योति कहा गया तथा सृष्टि
रचने के कारण सविता । वह प्राणियों का निर्माण करने के साथ साथ सभी
भुवनों (३ या १४ भुवन) का परिभ्रमण करते हैं ।
प्रकाशात्मा तमो हन्ता महानित्येष विश्रुतः
ऋचेऽस्य मण्डलं सामान्युस्रा मूर्तिर्यजूंषि च । ९ ।
अन्धकार को नष्ट करने का कारण सूर्य महान् के रूप में विख्यात् हैं । ऋक्
वेद का मन्त्र इनका मण्डल, सामवेद मन्त्र इनका किरण तथा यजुर्वेद मन्त्र इनका
शरीर के रूप में प्रतिपादित किया जाता है ।
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्म काल कृद् विभुः
सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वस्मिन् सः प्रतिष्ठितम् । १० ।
अतः सूर्य तीन वेदमय और ऐश्वर्य्यशाली है । वह काल की आत्मा हैं ।
अर्थात् समय का मान उन्हीं से निर्धारित हुआ है । वह काल के कर्ता और
सर्वव्यापी वह समस्तों की आत्मारूपी हैं । अतः हर स्थान के भीतर सूक्ष्मरूप से
हैं । (वृहद् रूप में ) सभी उनके भीतर हैं ।
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम्
छन्दां स्यश्वाः सूत्रयुताः पर्येत्येषवसीसदा । ११ ।
चर अचर सहित पूरा विश्व उनका रथ है, छन्द उनका घोड़ा, ये किरणों से
युक्त होकर सूर्य के समान परिक्रमा करते हैं । सभी सूर्य के वश में हैं ।
त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत्
सोऽहंकारं जगत्स्रष्टुंब्रह्माणमसृजत् प्रभुः । १२ ।
भूगोल विवरणम् २९१
सूर्य के तेज का एक पाद हो प्रकाशित है तथा तीन पाद अमृत के रूप में
गोपन है । उन्होंने अहंकार की सृष्टि कर जगत् बनाने के लिये ब्रह्मा की सृष्टि
की ।
तस्मै वेदान् वरान् दत्वा सर्व लोक पितामहम्
प्रतिष्ठाव्याण्ड मध्येऽथ स्वयं पर्यतिभासयन् । १३ ।
सूर्य ने ब्रह्मा को वेदरूपक वर देकर उनको अण्ड के भीतर स्थापित किया
तथा स्वयं प्रकाशित होकर भ्रमण करते हैं ।
अथ सृष्ट्यै मनश्चक्रे ब्रह्माहंकार मूर्त्तिमान्
मनश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्योऽग्नेस्ते जसां निधिः । १४ ।
ब्रह्मा ने अहंकार रूप में आकर सृष्टि करने में ध्यान दिया । उनके मन से
चन्द्र, कान ने अग्नि तथा आंख से सूर्य उत्पन्न हुए जो सभी तेजों के भण्डार हैं ।
मनसः खं ततो वायुरग्नि रापो धराक्रमात्
गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे । १५ ।
मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, से जल, जल से पृथ्वी-इस
प्रकार एक एक गुण बढ़ने के क्रमशः पञ्चमहाभूतों का जन्म हुआ ।
अग्निरापो भानुचन्द्रौ ततश्चाङ्गिरकादयः
तेजो भूखाम्बु वातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे । १६ ।
अग्नि, जल, सूर्य चन्द्र और तब मंगल आदि उत्पन्न हुये । तेज पृथ्वी,
आकाश, जल और पवन से इनकी (पांच तारा ग्रहों) भौम आदि) उत्पत्ति हुयी ।
पुनर्द्द्वादशधात्मानं विदधे राशि संज्ञकम्
नक्षत्र रूपिणं भूयः सप्त विंशात्मकं वशी । १७ ।
पुनः ब्रह्मा ने अपने को १२ भागों में बांट कर १२ राशियों का रूप ग्रहण
किया । इन्हीं १२ राशियों को २७ नक्षत्रों मे विभाजित किया ।
ततश्चरा परं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम्
ऊर्ध्वमध्या परेभ्यश्च स्रोतोभ्यः प्रकृतिं सृजन् । १८ ।
उसके बाद देवता तथा तब ऊपर, मध्य तथा नीचे क्रम से प्रकृति की सृष्टि
तथा चर अचर सहित पूरा विश्व बनाया ।
गुणकर्म विभागेन सृष्ट्या प्राग्वदनुक्रमात्
विभागं कल्पयामास यथास्वं वेद दर्शनात् । १९ ।
अपने वेद ज्ञान के द्वारा उन्होंने अपने अपने गुण और कर्म के अनुसार विभागों
[L32
२९२ सिद्धान्त दर्पण
ग्रह नक्षत्रताराणां भूमेर्विश्वस्य वा विभुः
देवासुर मनुष्याणां सिद्धानाञ्च यथा क्रमम् । २० ।
इन विभागों में क्रमशः ग्रह, नक्षत्र, तारागण, पृथ्वी, बिम्ब, ब्रह्माण्ड, देव,
असुर, मानव और सिद्ध उत्पन्न हुए ।
ब्रह्माण्ड मंत्रः सुषिरं यत्रेवं भू र्भुवादिकम्
कटाहद्वितयस्येव सम्पुटं गोलकाकृति । २१ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर खाली स्थान है जिसमें भू भुव, स्व आदि लोक है । दो
कड़ाहों को परस्पर किरानों से मिलाने पर जैसी गोल आकृति होती है, ब्रह्माण्ड
वैसा ही है ।
ब्रह्माण्ड मध्ये परिधि व्योमकक्षा भिधीयते ।
तन्मध्ये भ्रमणाद् भानां क्रमशोधः क्रमादधः । इति । २२ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर की परिधि को व्योम कक्षा कहते हैं । उसमें ऊपर से नीचे
की तरफ क्रमशः नक्षत्रों आदि का भ्रमण्ड होता है । (सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण
समाप्त) ।
नारदीये-इति सौररोक्त पद्यानां विंशत्या सूचितं क्रमः
अथैतदुक्त सूर्यादि स्वरूप प्रविविच्यते । २३ ।
सूर्य सिद्धान्त के इन २० पद्यों में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम दिखाया गया
है । अब उसमें कहे गये सूर्य आदि के स्वरूप का विशेष विचार किया जा रहा
है ।
चतुर्व्यूह प्रकारेण कृतिः सर्वत्र सर्वदा । इति ।
इति श्री नारदीयोक्तः प्रद्युम्नोऽत्रैव पद्मभू . २४ ।
हर जगह सदा चार स्तर से कार्य होता है- इस प्रकार श्री नारदीय पुराण में
कहा गया है । यहां प्रद्युम्न ही पद्मभू ब्रह्मा हैं । (उदाहरण सूर्य से ब्रह्मा, ब्रह्मा से
सूर्य । वासुदेव (सूर्य) से संकर्षण प्रद्युम्न, उससे अनिरुद्ध, अनिरुद्ध (विष्णु) से
ब्रह्मा ।
तत्कारणं महत्तत्त्व रूपीयः सूर्य उच्यते ।
ततोऽन्यः कथ्यते भूयः कार्यरूपी स्वयम्भुवः । २५ ।
ब्रह्मा का कारण महत्तत्व रूपी सूर्य है, ब्रह्म का कार्य रूपी एक और सूर्य
भी कहा जाता है ।
अतीत्वे रूप्यमर्कस्य ब्रह्माण्डान्तः प्रतीयते
तत्राद्यस्यात्म भूघस्र कर्तृत्वं सम्भवेत्यतः । २६ ।
अतः दो सूर्य हैं । प्रथम सूर्य आदि देव (ब्रह्मा ) की आत्मा भूमि का मालिक
भूगोल विवरणम् २९३
तथा इनका कर्ता है ।
तैजसं भास्वतो बिम्ब मुद् भूतं स्पर्श रूपकम्
पाञ्चभौतिक मप्येतद् भास्वत्वात् प्रदीपवत् । २८ ।
सूर्य का बिम्ब पञ्च भूतों से बना होने पर ही अत्यन्त तेजपूर्ण होने के कारण
दीपक की तरह उससे प्रकाश निकलता है । उसका तेज स्पर्श द्वारा अनुभव किया
जा सकता है । (छूने से गर्म मालूम होगा)
अस्याष्टौ भानु बिम्बस्यारम्भ का भूत भागकाः
चत्वारस्तेज सैन्येषा मे कैकोऽशः प्रकीर्तितः । २९ ।
सूर्य बिम्ब के आठ भूत विभाग हैं । इसमें ४ तेज से उत्पन्न हैं तथा अन्य
४ विभाग बाकी ४ महाभूतों के अधिनायक (प्रत्येक भाग एक महाभूत का स्वामी
हैं) ।
तेजः प्राधान्यतः सूर्य स्तै जसः प्रोच्यतेऽखिलैः
किन्तु दिव्यं रवेस्तेजो भौमाच्छत गुणाधिकम् । ३० ।
तेज तत्व प्रधान होने के कारण सूर्य को सभी तैजस कहते हैं । किन्तु दिव्य
रवि का तेज भौम, अग्नि आदि के तेज से १०० गुणा अधिक है ।
शीतस्पर्शाधिकरणं बिम्बमाप्यं हिमद्युतेः
करका वक्तदारब्धं चतुर्भिजर्ल भागकैः । ३१ ।
इसी प्रकार चन्द्र बिम्ब जल मय होने पर भी उसमें ८ में ४ भाज जल होने
के कारण उसमें शीतलता है । ओले की तरह
एकैक भागैरन्येषां भूतानां तत्र यत्पुनः
पर प्रकाशकत्वं तद् भानूमद् भानु संक्रमात् । ३२ ।
बाकी चार भागों में प्रत्येक १-१ महाभूत से सम्बन्धित है । सूर्य के प्रकाश
के कारण इसमें भी प्रकाश होता है ।
प्रथमां पिवते वह्निः कलामित्यादि यत् स्मृतेः
वाक्यं सौक्त्या पचयतो नैवेदं पारमार्थिकम् । ३३ ।
स्मृति वाक्य (शान्ति पाठ) में कहा गया है । कि चन्द्र प्रथम कला या किरण
से आग को पीता है वह यथार्थ नहीं (लाक्ष णिक) है । चन्द्र की शुक्लता कम
होने के कारण इस प्रकार कहा जाता है । तब वह शुक्ल अंश अग्नि के समान
लाल दीखता है)
तेजसः स्यात्कथं पानं दृष्टि भोगोऽत्र केवलः
देवदत्तेन भुज्यन्ते ग्रामा स इति वन्मतः । ३४ ।
तेज का पान नहीं हो सकता अतः इसका अर्थ यहां दृष्टि भोग, (आंख से
२९४ सिद्धान्त दर्पण
देखना ही है) । जैसे देवदत्त ने ग्राम का भोग किया-इसका अर्थ यह नहीं है कि
वह गांव को खा गया । भोग का अर्थ अपने सुविधा के लिये व्यवहार ही है ।
कला शब्देन तद् वृद्धि क्षयाभ्यामनुलक्षितः
काल एवोच्यते नो चेत् पदे दर्शेऽखिल क्षति । ३५ ।
कला शब्द का प्रयोग चन्द्र के प्रकाश में कमी या बढ़ने के समय के बारे
में किया गया है । नहीं तो अमावास्या में सभी किरणों का क्षय हो जाता है ।
उस समय कला वृद्धि की बात क्यों होगी ?
भूयसाल्पस्य बोधः स्यादिति न्यायेन शीतगोः
शैत्य नास्तोष्णतानुष्णा शीतस्पर्शाऽन्यथे भवेत् । ३६ ।
बड़े वस्तु से छोटा छिप जाता है यह न्याय (तर्क संगत) है । इसी कारण
चन्द्र में शीतलता की प्रधानता होने कारण उसकी थोड़ी सी उष्णता का बोध नहीं
होता है । किन्तु चन्द्रमा में बिल्कुल ही उष्णता नहीं है, ऐसी बात नहीं है ।
उष्णता नहीं होने पर उसका शीत स्पर्श अन्य प्रकार का होगा । (और ठण्डा
होगा- बर्फ के समान)
जलप्राये विधोः पृष्ठे निष्ठा वृक्षादयो जनैः
कलंकत्वेन वर्ण्यन्ते नाना प्राचीन वाङ्मयैः । ३७ ।
चन्द्रबिम्ब जलमय है । उसमें वृक्ष पर्वत आदि हैं । उन्हीं का कलंक के रूप
में वर्णन हुआ है । इस प्रसंग में अनेक प्रकार की प्राचीन कथायें भी हैं ।
चन्द्रवन्मंगलाद्यास्ते प्रागुक्ता भानि तु स्वतः
तैजसानित्यहं वच्मि जगुरात्यानि के चन । ३८ ।
चन्द्र के समान मंगल आदि है तारा स्वतः तैजस (प्रकाशित हैं ) ऐसा मेरा
मत है । कोई कोई इन्हें जल बिम्ब भी कहते हैं । बहुत दिनों से ऐसा मतभेद है ।
आप्यत्वेतु भकक्षायां दृश्यतेऽर्कस्य विस्तृतिः
विकला पञ्चकं यस्मात् ततः तत् कर संक्रमात् । ३९ ।
नक्षत्र गोल में रवि का व्यास ५ विकला मात्र है । अतः तारा गण विशुद्ध
फल बिम्ब होते तो रवि की किरण द्वारा उनकी-
तादृगुज्ज्वलता वानां न सम्भवति तान्यथ
यद्यर्क समते जांसि तदान स्यात्त मोनिशि । ४० ।
इतनी अधिक उज्ज्वलता नहीं होती । दूसरी तरफ वह सूर्य के समान तैजस
होने पर रात्रि में इतना अन्धकार नहीं होता । अर्थात् तारागण न सूर्य के समान
तैजस् हैं न चन्द्र के समान जलमय ।
भूगोल विवरणम् २९५
ततेङ्गीकृतं भौमज्योति रौपाधिकोपमम्
सूर्या शुपाधिकं तेजो यद् ग्रहेषु तथेष्यते । ४१ ।
अतः उनकी ज्योति पृथ्वी की ज्योति के समान औपाधिक है (उसी प्रकार
की है । सूर्य का औपाधिक तेज जिस ग्रह के ऊपर पड़ता है वही दीखता है ।
वर्णभेदो यथा वन्हेः स्यादाधारविशेषतः
तथाभेषु ग्रहेषु स्याद् भिन्ना सौपाधिको द्युतिः । ४२ ।
आधार के कारण जिस प्रकार अग्नि के वर्ण में भिन्नता आती है उसी प्रकार
सूर्य की किरण एक ही वर्ण की होती है, पर भिन्न भिन्न ग्रहों पर उसका अलग
अलग रंग होता है ।
पितरश्चन्द्र बिम्बस्य श्रूयन्ते पृष्ठवासिनः
यथा तथान्य ग्रह भेष्वपि स्थानं प्रतीयते । ४३ ।
(शास्त्र के अनुसार) चन्द्र के पृष्ठ प्रदेश में पितृ लोक रहते हैं । ठीक इसी
प्रकार अन्य ग्रहों पर भी भिन्न भिन्न प्राणी रहते हैं ।
यद्यद् भूतमया लोका स्तत्र तन्मय देहिनः
वर्तन्ते पार्थिवांशस्य सम्पर्काद् व्यवहारितः । ४४ ।
जिस महाभूत से जो लोक बना है वहां उसी महा भूत के शरीर वाले प्राणी
रहते हैं । पृथ्वी के जिस अंश के सम्पर्क में वे अधिक आते हैं । उसी का व्यवहार
करते हैं ।
ब्रह्माण्ड मध्य संस्थानो भूगोलः पाञ्चभौतिक
तदा रम्भकतामाप्तं भूमिभाग चतुष्टयम् । ४५ ।
ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित पृथ्वी पांच भूतों से बनी है । आरम्भ में इसमें ४
भाग (८ भाग में) भूमि का भाग था ।
जलादि भूत भागानां चतुष्कं पूर्ववत् मतम् ।
पृष्ठमस्याब्धि भागं सजल भागत्रयान्वितम् । ४६ ।
पहले लिखे गये मत के अनुसार जल आदि चार भूत प्रत्येक का एक एक
भाग था । पृथ्वी की सतह पर ३ भाग जल का है-
एकेनस्थल भागेन लक्ष्यते प्रायशो जनैः
गोल पृष्ठ चतुर्थांश स्थलेऽखिल जन स्थितः । ४७ ।
तथा एक भाग स्थल लोगों को दीखता है । इस प्रकार गोल सतह के एक
चतुर्थांश भाग स्थल में ही सभी मनुष्य स्थित है ।
लवणोदधिमध्यस्थं महाद्वीप द्वयं पृथक्
ऊर्ध्वा धराभिधं तत्र महानुद्धवोऽधरंस्तनुः । ४८ ।
२९६ सिद्धान्त दर्पण
लवण समुद्र के भीतर दो महाद्वीप अलग अलग स्थित हैं । एकं ऊर्ध्व और
दूसरा निचे का महाद्वीप ।
अधःस्थस्योत्तरार्धेन सहोर्ध्वः कथितोबुधैः
जम्बूद्वीपा ख्ययाधः स्थ द्वीपस्यार्द्धन्तुदक्षिणम् । ४९ ।
नीचे स्थित महाद्वीप के उत्तरी अंश और ऊपरी महाद्वीप को विद्वानों ने जम्बू
द्वीप कहा है । नीचे वाले द्वीप का दक्षिणार्द्ध तथा
कथ्यते ह्यासुरो भूमि र्भागैः द्वादशभिर्युतम्
तत्रषट् सागरा द्वीपा हृद देशोपमाः स्थिताः । ५० ।
१/१२ वां भाग (उत्तरार्द्ध का) और मिलाकर असुर भूमि के नाम से विख्यात
है । इसमें हृद और जनपद के समान ६ समुद्र और द्वीप हैं ।
जम्बूद्वीप स्तु बहुधा विभक्तो वर्ष पर्वतैः
तत्तन्मानानि नोक्तानि ब्रह्म सूर्यांश भास्करैः । ५१ ।
जम्बू द्वीप भी पर्वतों द्वारा बहुत से वर्षों से विभक्त है । इनका मान ब्रह्म गुप्त,
सूर्यांश पुरुष या भास्कराचार्य किसी ने नहीं कहा है ।
यत्तु विस्तृत गोलादौ वर्णितं भूधरादिकम्
तत्तदृष्टि विरुद्धत्वात् नाम्नेव गदितं बुधैः । ५२ ।
विस्तार भाव से वर्णित भूगोल आदि में वर्णित पर्वतों का वर्णन वास्तविक
नहीं है (दृष्टि विरोध है) । अतः पण्डित लोग इनका केवल नाम से ही वर्णन
करते हैं ।
तत्तच्छास्त्रो दितो मेरु कृताष्टा (८४) योजनोच्छ्रितः
कलाकृति (२५६) मितो मूल ऊर्ध्वस्थल्यां न खाग्निभिः । (३२० ) । ५३ ।
सभी शास्त्रों ने मेरु पर्वत की ऊंचाई ८४ योजन कही है । मूल भाग में इसका
विस्तार २५६ योजन तथा पृथ्वी के ऊपर इसका विस्तार ३२० योजन है ।
वर्षाचला हिमाद्र्याद्याः पञ्चाशत् योजनोच्छ्रितः
तावत् प्रस्थाश्च तत्रायं क्रियते गणितं क्रमः । ५४ ।
हिमालय आदि वर्ष पर्वतों (देश विभाजन करने वाले सीमा स्थित) में प्रत्येक
की उच्चता ५० योजन मात्र हैं । इनका प्रस्थ मध्य ५० योजन है । अत इस विषय
में एक प्रकार का गणित समझाया जा रहा है ।
यस्माद् गोलस्य शैलादि शकुंनां दूर वर्ति नाम्
व्यवधा दृश्यता मानं दृष्टि सीमा च बोध्यते । ५५ ।
इस गणित द्वारा दूर की वस्तु ओं पर्वत, शंकु आदि की दूरी, दृश्य भाग तथा
दृष्टि सीमा (पृथ्वी की गोल सतह पर कितनी दूर देख सकते हैं । आदि ज्ञात हो
"ता गोल परिधिक्षुण्णं भचक्र कलिको द् धृताः । ५८ ।"
Wait:
"ता" - 'त' with 'ा'.
"गोल" - 'ग' with 'ो', 'ल'.
"परिधिक्षुण्णं" - 'प', 'र' with 'ि', 'ध' with 'ि', 'क्ष' with 'ु', 'ण्' with 'ण' and anusvara = परिधिक्षुण्णं.
"भचक्र" - 'भ', 'च', 'क' with '्' and 'र' = भचक्र.
"कलिको द् धृताः" - 'क', 'ल' with 'ि', 'क' with 'ो', space, 'द्', space, 'ध' with 'ृ', 'त' with 'ा' and visarga (ः) = धृताः.
Wait, is it "धृताः" or "धृता"? Look at the end: there is a visarga: "धृताः । ५८ ।".
Wait, look at "द् धृताः":
'द्' has a virama: "द् धृताः".
Line 16:
"फल उत्क्रम ज्या होगी । उसका चाप करने पर वह दृष्टि मार्ग लिप्ता में"
Line 17:
"होगा । उसको भूगोल की परिधि से गुणा कर भचक्र की कला (२१,६००) से भाग"
Line 18:
"दे
२९८ सिद्धान्त दर्पण
इस ५० योजन शंकु को ५०२६ योजन की भूगोल परिधि के ऊपर स्थित
मानेंगे । पूर्व रीति के अनुसार इसके संस्कृत शंकु का मान २२५ कला होगा ।
द्विः स्थाद स्यादुत्क्रमज्या दृङ्नखा (२०२) स्तद्धनुः कलाः
दृङ् नागेशो (११८२) दृष्टि सीमा शरभै (२७५) योजनैर्मता । ६३ ।
दो स्थानों पर रखकर क्रिया करने पर इसकी उत्क्रमज्या २०२ होगी । इसकी
चापकला ११८२ ही दृष्टि सीमा का मान कला में हुआ दृष्टि सीमा का योजन
मान २७५ है (अर्थात् ५० योजन हिमालय से २७५ योजन तक की दूरी से दीख
सकता है) ।
द्रष्टृ शंक्वन्तर धरामानं चक्रकला हतम्
हृतं परिधिमानेन लब्धा भुजकला स्ततः । ६४ ।
द्रष्टा और दृश्य वस्तु (शंकु) के बीच की दूरी को चक्र कला (२१, ६००) से
गुणा भू परिधि (५०२६) से भाग देने पर भुज कला होगी ।
द्रष्टृ दृश्यान्तरे राशि त्रयोने दृष्टि सम्भवः ।
भुंज लिप्ता ज्यका वर्ग हीन त्रिज्याकृतेः पदम् । ६५ ।
इस भुजकला का परिमाण ३ राशि से कम होने पर द्रष्टा दृश्य वस्तु को देख
सकता है । भुजलिप्ता के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर उसका वर्गमूल
निकालने से
को टीज्या त्रिगुणा (३४३८) च्छोध्याशेषः स्यादुत्क्रमज्यका
अथ कोटिज्य याभ्यस्ता त्रिज्याप्तः संस्कृतो नरः । ६६ ।
कोटिज्या होगी । इस कोटिज्या को त्रिज्या (३४३८) से घटाने पर उत्क्रमज्या
होगी । इसके बाद संस्कृत शंकु को कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने
पर-
स्फुट शंकु स चेदल्प उत्क्रमज्या प्रमाणतः
तदा न दृश्यते भूयान् दृश्यते व्यवधान भित् । ६७ ।
स्फुट शंकु आता है । यह उत्क्रमज्या से कम होने पर नहीं दीखता है । यह
उत्क्रमज्या से जितना अधिक होता है उतना भाग अवरोध के ऊपर दीखता है ।
उत्क्रमज्योत्झितः स्पष्टा शंकुर्दृश्य ज्यका भवेत्,
सात्रिज्याघ्नान्तरक्ष्मात्थ भुजज्याप्तोन्नतज्यका । ६८ ।
स्फुट शंकु से उत्क्रमज्या घटाने पर दृश्य ज्या होती है । इस दृश्यज्या को
त्रिज्या से गुणा कर द्रष्टा और दृश्य के अन्तर की ज्या से भाग देने पर उन्नत ज्या
होती है ।
भूगोल विवरणम् २९९
तद् धनुर्दृश्यलिमाः स्युस्तच्छंकौः क्षितिज्या परि ।
दृश्य ज्या परिधिक्षुण्णा चक्रलिमोद्धृता फलम् । ६९ ।
इस उन्नत ज्या का चाप क्षितिज के ऊपर उस संस्कृत शंकु की दृश्यकला
(२१,०००) से भाग देने पर फल-
शंको दृश्ये नतिः साथ त्रिज्याघ्नी कोटि भाजिता
दृश्य भागः स्फुटः शंको स्याद् योजन करादिकः ।
शंकु का योजन में दृश्य भाग होता है । शंकु की दृश्योन्नति होती है । इस
दृश्योन्नति को त्रिज्या से गुणा कोटिज्या से भाग देने पर फल शंकु का योजनात्मक
दृश्य भाग होता है ।
परिधिघ्नोत्क्रमज्याथ भचक्र कलिकोद्धृता
त्रिज्याघ्नी कोटि जीवाप्तां लुप्तांश प्रमिति र्भवेत् । ७१ ।
पुनः उत्क्रमज्या को भू परिधि से गुणा कर भचक्र कला से भाग दें । और
फल को त्रिज्या से गुणा कर कोटिज्या से भाग दें । फल शंकु के अदृश्य भाग
का परिमाण होता है ।
हिमाद्रीशृंग तलतः कुनृपै (१६१) योजनैः स्थिते
दक्षिणे नीलशैलेऽत्र द्रष्टुः स्थानं प्रकल्प्यते । ७२ ।
हिमाचल के शृंग तल से दक्षिण की तरफ १६१ योजन पर नीलाचल (पुरी
में श्री जगन्नाथ मन्दिर) को द्रष्टा का स्थान मानें ।
तदन्तरोत्थदे र्लिप्ताद् व्यं कांग (६९२) न्युत्क्रमज्यका
सप्ततिः (७०) कोटि जीवाष्ट रसाग्न्यग्निमिता (३३६८) भवेत् । ७३ ।
उसकी (१६१) योजना की भुजकला ६९२, उत्क्रमज्या ७० तथा कोटिज्या
३३६८ हुयी ।
पूर्वोक्तः संस्कृत शंकुः (२१५) स्फुटो रुद्राक्षिः (२११) सम्मितः
दृश्यज्याधरणी शक्र (१४१) उन्नतज्येषु खाद्रयः (७०५) । ७४ ।
संस्कृत शंकु २१५, स्फुट शंकु २११, दृश्यज्या १४१ तथा उन्नतज्या (७०५) ।
दिगाद्रयो (७१०) नतकलादेव ३३ दृश्योन्नतिस्तथा
स्फुट दृश्योन्नति वेदगुण (३४) योजन सम्मिता । ७५ ।
उन्नतज्या का चाप (७१०) उन्नतकला, दृश्य की उन्नति ३३ स्फुट दृश्योन्नति
३४ तथा
षोडशा दृश्यमानानि योजनानि गिरेर्यतः
क्षितिज्या द्वादशांशोन्नस्तत्र दृश्यो हिमालयः । ७६ ।
दृश्यमान १६ योजन हुआ । अतः क्षितिज से १२ अंश (१६ योजन का चाप)
३०० सिद्धान्त दर्पण
ऊपर हिमालय नीलाद्रि से दृश्य होना चाहिये ।
धूमधूलि हिम घनेर दृष्टोऽपीह दूरगे
छादनाद् ध्रुवमत्स्यस्थ भाना स्यात्तत्समक्षता । ७७ ।
धूम, धूलि, हिम और मेघ द्वारा आच्छादित होने के कारण अति दूरी पर ये
पर्वत दीखते नहीं हैं । पर ध्रुव मत्स्य के अनेक नक्षत्र उसके सामने होने के कारण
(अवरोध से)
अतोन् तावदौन्नत्यं सिद्धं नायाम विस्तृती
प्रत्यक्षे तस्य तुच्छत्वं खार्णवांश (४०) मितं ततः । ७८ ।
हिमालय की स्थिति प्रत्यक्ष (आभास) होती है । पर उससे उसकी ऊंचाई,
लम्बाई और विस्तार वास्तव में सिद्ध नहीं होता । नक्षत्र मेघ आदि के कारण भी
छिप सकते हैं, यदि उतनी ऊंचाई तक हिमालय नहीं भी होता । वास्तव में
हिमालय की उन्नता ४० अंश ही है ।
सोऽयुतद्वय (२०,०००) हस्तोङ्गः शंकुश्चेत्संस्कृतः पुनः
दृग्दन्त (३२२) विकलास्तावत्युत्क्रमज्या (५/२
भूगोल विवरणम् ३०१
सार्द्धांशा (११/३०) स्तत्रलम्बांश दृष्ट्यंशाः पञ्चविंशति (२५)
तच्चापान्तर्गतः सूर्य क्षितिजाद् विश्वभागकैः । ८३ ।
क्योंकि उसका लम्बांश (११°/३०') अंक्षाश ७८°/३०') होने से दृष्ट्यंश (२५°)
इसके चाप के बीच में स्थित सूर्य क्षितिज से १३° उच्च देवताओं को दीखेगा ।
अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि देवता लोग ६ मास सूर्य को नहीं देखते ।
उच्चस्थो द्रक्ष्यते देवैः षण्मासास्तमय कथम्
विषुवत्कालके खण्ड ग्रहणे शीतगोस्तथा । ८४ ।
सम दिवस (जब सूर्य विषुव रेखा ०° क्रान्ति पर हो) में तब चन्द्र के खण्ड
ग्रहण में
अद्रक्षतः कुभान्तःस्थ मेरुच्छाया चतुः कला
अतो मेरूर्न्नति न्यूनं मन्यतां हिमवन् मिते । ८५ ।
भू छाया के अन्तर्गत मेरू की छाया ४ कला अधिक दीखती है । अतः
हिमवान की उच्चता से मेरू की उच्चता
३०२ सिद्धान्त दर्पण
अतो भारत वर्षस्य याम्य भागे त्रिकोणता
प्राक् पश्चान्मध्य देशानामन्तरज्ञानतोऽपि च । ९० ।
अतः इन तीन स्थानों का त्रिकोण भारत वर्ष के दक्षिणी भाग में स्थित है ।
पुनः भारत वर्ष का पूर्व, पश्चिम और मध्य भागों का अन्तर देखने से भी स्पष्ट होता
है कि -
शंखाग्रा कारता सिद्धि स्तद्वीपेऽस्मिन्न वृत्ततां
तन्मानता न चैवाब्धौ न चापि वलयाकृतिः । ९१ ।
भारत का आकार शंख के अग्रभाग की तरह है । अतः जम्बूद्वीप का आकार
वृत्ताकार नहीं है । इसी प्रकार समुद्र भी वलयाकार नहीं है । (जैसा पुराणों में
कहा गया है ।)
तत्ततोऽधिक मानोऽसौ सागरो विविधाकृतिः
प्राक्पश्चाद् याम्य सौम्याख्या नानारूपः स्थानभेदतः । ९२ ।
समुद्र भी विविध आकार के तथा अधिक मान के हैं । पूर्व पश्चिम, दक्षिण
तथा उत्तर नाम से इन समुद्रों का नाम करण हुआ है । स्थान भेद से इनका नाम
अलग अलग है ।
लवणार्णव मध्यस्था द्वीप भेदः परः शताः
दशार्बुदाधिका संख्या मनुष्याणां भुविश्रुता । ९३ ।
लवण समुद्र में भिन्न भिन्न सौ से अधिक द्वीप हैं । सुना जाता है । कि
पृथ्वी पर १०० कोटि से भी अधिक लोग रहते हैं ।
समन्ताद् योजनं कल्पे भूगोलः किल वर्द्धते
इति सिद्धान्त तो वृद्धे वैषम्याद्देश भेदतः । ९४ ।
एक कल्प में पृथ्वी गोल की वृद्धि चारों तरफ चार कोस होती है यह सिद्धान्त
स्थिर हो चुका है । अवश्य स्थान भेद से यह वृद्धि कम या अधिक होती है ।
बहुदिक् प्रसरद् वात क्षुब्धाम्भोधि जला हते
वर्षो द्रेकान्नदी वेगान्मृदां नाना विध स्थिते । ९५ ।
अनेक दिशाओं में हवा से क्षुब्ध समुद्र जल के आघात से तथा वर्षा वेग
और नदी के प्रवाह से मिट्टी का कटाव अनेक प्रकार से होता है ।
उन्मजन्ति निमजन्ति केचित्केचित्कदा कदा
क्षुद्राद्वीपा महन्तस्तु भिन्नाकारा भवन्ति हि । ९६ ।
मिट्टी के असमान कटाव के कारण विभिन्न आकार के छोटे और बड़े द्वीप
कभी दब जाते हैं । तथा कभी समुद्र से ऊपर उठ जाते हैं । तथा आकार भी
बदल जाता है ।
भूगोल विवरणम् ३०३
तथापि वृत्ततो भूमेर्मृद् भिस्तो यैर्न भिद्यते ।
मृदा पमाञ्च संस्थानान्याप्नुवन्ति सदा भिदाम् । ९७ ।
तथापि मिट्टी और पानी के इस परिवर्तन से पृथ्वी का गोलकार नहीं बदलता
है । सिर्फ मिट्टी और पानी का स्थान परिवर्तन होता है ।
लवणोदेन सम्पृक्ताः क्षीरोदाद्याक्वचित्क्वचित्
दघतिक्षीर दध्यादि न स्वरूपन्तु कात्स्न्यर्तः । ९८ ।
क्षीर और दधि मिला हुआ लवण समुद्र कहीं कहीं पर है । पुराणों में वर्णित
शुद्ध क्षीर या दधि समुद्र कहीं नहीं है ।
तत्प्राक् सिद्धान्त सम्प्रोक्त सृष्टिकाल कुसंस्थिते-
र्वर्तते वर्तमानक्ष्मा संस्थिते श्चान्तरं महत् । ९९ ।
अवश्य पहले के सिद्धान्त ग्रन्थों में वर्णित सृष्टिकाल तथा पृथ्वी की स्थिति
से अभी की पृथ्वी की स्थिति में बहुत अन्तर है ।
आदियामले-यस्य शृंगैक देशस्था देवास्त्रींशं त्रिकोटयः
समेरु पृथिवीमध्ये श्रूयते न च दृश्यते । इति । १०० ।
आदि यामल ग्रन्थ के अनुसार जिसके श्रृंग के एक स्थान पर ३३ कोटि
देवता रहते हैं । वही मेरु पर्वत पृथ्वी के मध्य भाग में है वह मेरु सिर्फ सुनने
में आता है किन्तु दीखता नहीं है ।
सूर्य सिद्धान्ते-अनेक रत्न निचयो जाम्बू नद मयो गिरिः
भूगोल मध्य गो मेरू रुभयत्र विनिर्गतः । १०१ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार -भूमि के मध्य भाग में दोनों दिशाओं में निकले
हुये दो मेरू हैं । यह सुवर्णमय तथा इनमें अनेक मणि माणिक्य हैं ।
उपरिष्टात् स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः
अधस्तादसुरास्त द्व वद्विषन्तोऽन्योऽन्य माश्रितः । १०२ ।
उनके ऊपर इन्द्र सहित देवता गण और महर्षि निवास करते हैं । नीचे स्थित
मेरु (कुमेरू) पर देवताओं के द्वेषी असुरों का आश्रय स्थान है ।
ततः समन्ता परिधि क्रमेणायं महार्णवः
मेखलेव स्थितो धात्रा देवासुर विभागकृत् । इति । १०३ ।
यह दोनों मेरु के चारों तरफ पृथ्वी की परिधि के रूप में महा समुद्र घेरे हुए
हैं और इसके द्वारा देव तथा असुरों का विभाग स्पष्ट दिखाई देता है (उद्धरण
समाप्त)
देवावासः सुमेर्वाख्यः कुमेरु रसुरश्रयः
तत्सामान्तरगा रेखा व्यक्षरूपा परिधिर्महान् । १०४ ।
३०४ सिद्धान्त दर्पण
सुमेरू पर देवता तथा कुमेरू पर असुरों का वास है । इन दोनों स्थानों से
बराबर दूरी पर स्थित महापरिधि को व्यक्ष या विषुव वृत्त कहा जाता है ।
अक्षांश मेरू पर्यन्तं क्रमोना वृत्त रेखिकाः
तद् भिदो मेरू युक् सक्ता द्राघिमाख्याः समा मताः । १०५ ।
इस विषुव वृत्त से क्रम से छोटे होते गये वृत्त मेरू तक ही दीखते हैं । जिन्हें
अक्षांश रेखा कहते हैं । दोनों मेरू पर्वत के बीच की रेखा जो इन अक्ष वृत्तों को
काटती है उसे द्राघिमा (देशान्तर ) रेखा कहते हैं ।
इत्थामाकाश वद् भूमावपि सर्वं प्रकल्प्यते
भूमध्यात्स्व स्थितिर्यस्मात् पृष्ठे सूत्र समाभवेत् । १०६ ।
इस प्रकार आकाश में जिन रेखाओं की कल्पना की गयी है, उसी अनुसार
पृथ्वी पर भी रेखाओं की कल्पना है । आकाश वर्णित रेखा से भू केन्द्र का सूत्र
(रेखा) पृथ्वी की सतह को जहां स्पर्श करता है, वहां वही रेखा मानी जाती है ।
ब्रह्माण्डात्म विराड् देह मेरुदण्डायिते स्थिरे
वायौ भूरादयः स्युताश्चक्राणोवतनौ नृणाम् । १०७ ।
जिस प्रकार मनुष्य देह में चक्र हैं । (मेरू दण्ड में ६ तथा ऊपर सहस्त्रार)
उसी प्रकार परमात्मा के विराट देह में भी मेरुदण्ड रूपी जो स्थायी वायु (प्रवह)
है उसमें भू, भुवः स्वः आदि लौक स्थित हैं ।
ख मेरु समरुत् प्रोक्तो लोकाधार तया गमैः
गर्भोद सिन्धु युङ् मूलः षोडशाधार भृच्छिखः । १०८ ।
आकाश के मेरु को शास्त्रों ने सभी लोकों का आधार माना है । प्रसिद्ध है
कि वहां बहुत पवन होता है । उसका श्रृंग १६ आधार का है । तथा मूल जल
समुद्र के भीतर है ।
लोका लोक तया प्रोक्ता कटाह प्रथमावृतिः
हिरणमयो भूमि संज्ञा ततो दश गुणोत्तरा । १०९ ।
पृथ्वी का नाम हिरण्मयी है । लोगों की दृष्टि में इसका आकार कड़ाह के
समान (गोलाकार है ) । भूमि का इसका प्रथम आवरण है । उससे क्रमशः
दस-दस गुणा अधिक
क्रमाज्जलादयः प्रोक्ताः प्रकृत्यन्ताः प्रसंगताः ।
यस्याधारण भूगोल शास्त्रे देशादि वर्णना । ११० ।
जल आदि के आवरण हैं, अन्त में प्रकृति है । प्रसंग के अनुसार इनका
शास्त्रों में वर्णन है । देश, (सागर, नगर) आदि का वर्णन साधारणतः भूगोल में
ही होता है, अतः
भूगोल विवरणम् ३०५
कर्तुर्महा तदेतस्मिन् गणितेदिक् प्रदर्शिता
पश्चाद् व्यासादि गोलस्य वाच्यं दृक्शास्त्र सम्मतम् । १११ ।
अतः इस गणित शास्त्र में उसका दिग्दर्शन मात्र दिया गया है। बाद में गोल
अध्याय में वास्तविक व्यास आदि के बारे में कहा जायेगा ।
अथ भूभाग संस्थान परिचित्ये कुतूहलात्
लिख्यन्ते कतिचित्श्लोकाः सत्सिद्धान्त शिरोमणौ । ११२ ।
भूभाग में कौन सा स्थान कहां पर है इसका परिचय और कुतूहल शान्ति के
लिये प्रमाणिक सिद्धान्त शिरोमणि के कई श्लोक लिखे जाते हैं ।
सिद्धान्त शिरोमणौ-लंका कुमध्ये यम कोटिरस्याः
प्राक्पश्चिमे रोमकपत्तनञ्च ।
अधस्ततः सिद्ध पुरं सुमेरू सौम्येऽथ याम्ये वडवानलश्च । ११३ ।
सिद्धान्त शिरोमणि के अनुसार-पृथ्वी के मध्य (विषुव रेखा पर) लंका नगरी
है। उससे पूर्व (९०° पर ) यम कोटि पत्तन, लंका से पश्चिम उतनी ही दूरी पर
रोमक पत्तन है। लंका के ठीक नीचे (१८०° पर) सिद्ध पुर तथा इन चारों से ठीक
उत्तर (९०°) पर सुमेरू और दक्षिण में कुमेरू या बड़वानल है ।
कुवृत्त पादान्तरितानि यानि स्थानानि षड्गोल विदोवदन्ति
वसन्त मेरौ सुरसिद्ध संघा और्वेच सर्वे नरकाः सदैत्याः । ११४ ।
यह सभी ६ स्थान एक दूसरे से एक वृत्त पाद (९०°) की दूरी पर हैं। (कुमेरू
और सुमेरू के बीच दूरी २ पाद या १८०° की दूरी है)। मेरू में सुर और सिद्ध
निवास करते हैं । तथा और्व या बड़वानल (कुमेरू) में असुर रहते हैं ।
यो यत्र तिष्ठत्यवनीं तलस्था मात्मानमस्या उपरिस्थितञ्च
समन्यतेऽतः कु चतुर्थ संस्था अधश्चते तिर्यंगिता मनन्ति । ११५ ।
पृथ्वी में जो जहां पर है अपने से पृथ्वी को नीचे तथा अपने को ऊपर समझता
है। ९०° की दूरी से लोगों को वह तिरघा मानते हैं ।
अधः शिरस्काः कुजलान्तरस्थाश्छाया मनुष्या इव नीरतीरे ।
अनाकुलास्तिर्यगधः स्थिताश्च तिष्ठन्तिते तत्र वयं यथात्र । ११६ ।
जिस प्रकार जल में छाया नीचे की तरफ दीखती है उसी प्रकार पृथ्वी पर
परस्पर १८०° दूरी पर स्थित मनुष्य अपने को ऊपर और दूसरे को नीचे की तरफ
सिर किये हुये देखते हैं । लेकिन हम लोग जिस प्रकार स्थिर होकर बैठे हैं ।
उसी प्रकार नीचे की दिशा या तिर्यक् दिशा वाले भी ।
भूमेरर्द्धं क्षारसिन्धो रुदक्स्थं जम्बूद्वीपं प्राहुराचार्य वर्याः
उर्ध्वेऽन्यस्मिन् द्वीप षट् कस्य याम्ये क्षार क्षीराद्यम्बुधिना निवेशः । ११७ ।
लवण समुद्र के उत्तर स्थित आधी पृथ्वी को श्रेष्ठ आचार्यों
३०६ सिद्धान्त दर्पण
है । इसके विपरीत पृथ्वी के दक्षिणार्द्ध में ६ द्वीप तथा लवण क्षीर आदि समुद्र
हैं ।
लवण जलधीरादौ दुग्धसिन्धुश्च तस्मा
दमृतमृतरश्मिश्रीश्च यस्माद् वभूव ।
महतचरणपद्मः पद्म जन्मादि देवै र्वसति
सकल वासो वासुदेवश्च यत्र । ११८ ।
पहले लवण तथा उसके बाद क्षीर समुद्र हैं । क्षीर समुद्र से चन्द्र और लक्ष्मी
का जन्म हुआ । इसमें स्वयं वासुदेव निवास करते हैं । जिनके शरीर में सम्पूर्ण
ब्रह्माण्ड है । ब्रह्मा आदि सभी देवता उनकी चरण वन्दना करते हैं ।
दध्नोघृतस्येक्षुरसस्य तस्मान्मद् यस्य च स्वादु जलस्य चान्त्यः
स्वादु द्यकान्तर्वड़वानलौऽसौ पाताल लोकाः पृथिवी पुटानि । ११९ ।
क्षीर के बाद दधि (दही) घृत (घी) गुड़ (ईख का रस), मद्य और अन्त में
पानी का समुद्र क्रमशः अधिक दूरी पर है । इस स्वादु जल समुद्र के भीतर
बड़वानल है । पृथ्वी के गड्ढों को ही पाताल कहा जाता है ।
चञ्चत् फणामणि गणांशुकृत प्रकाशा
एतेषुसासुर गणाः फणिनोवसन्ति ।
दीव्यन्ति दिव्य रमणी रमणीय देहैः
सिद्धाश्च तत्र चलसत् कनका विभासैः । १२० ।
पाताल लोक में असुर और सर्प निवास करते हैं । सर्पों के सिर की मणि
से वह प्रकाशित है । सिद्ध अपने रूप गुण रूपी मणि को धारण कर वहां विचरण
करते हैं । उनके विचरण (या क्रीड़ा) के समय उनके देह के स्वर्ण गहने सदा
चमकते हैं । सिद्ध और दिव्य स्त्रियों के सुन्दर देह गहनों की क्रान्ति से प्रकाशित
हैं ।
शाकं ततः शाल्मलीमत्र क्रौशं क्रौञ्चञ्च गोमेदक (प्लक्ष) पुष्करे च
द्वयोर्द्वयोरन्तरमेक मेकं समुद्रयोर्द्वीप मुदाहरन्ति । १२१ ।
ये सभी सात समुद्र वलयाकार हैं । इनके भीतर ६ द्वीप हैं । द्वीपों के नाम
क्रमशः शाक, शाल्मली, कौश, क्रौञ्च, गोमेदक और पुष्कर, गोमेदक का एक
अन्य नाम प्लक्ष है ।
लंकादेशाद्धिमगिरि रुदग् हेमकूटोऽथ तस्मात्
तस्माञ्चान्यो निषध इति ते सिन्धु पर्यन्त दैर्घ्याः
एवं सिद्धादुद गपि पुरा च्छृंग वच्छृङ्ग नीला
वर्षाण्येषां जगुरिह बुधा अन्तरे द्रोणि देशान् । १२२ ।
लंका से हिमालय उत्तर की तरफ है । उससे उत्तर हेमकूट पर्वत तथा और
भूगोल विवरणम् ३०७
उत्तर निषध पर्वत है । प्रत्येक का विस्तार समुद्र तक है । पुनः सिद्धपुर से उत्तर
क्रमशः श्रृंगवान् शुक्ल और नील पर्वत है । दो दो पर्वतों के बीच में जो वर्ष हैं
उन्हें द्रोणी देश कहते हैं ।
भारत वर्ष मिदं ह्युदगस्मात् किन्नर वर्ष मतो हरिवर्षम्
सिद्धपुराच्च तथा कुरु तस्माद् विद्धि हिरण्मय रम्यक वर्षे । १२३ ।
लंका से उत्तर दिशा में पहले भारतवर्ष तब किन्नर देश तथा उसके बाद हरि
देश है । सिद्ध पुर से उत्तर क्रमशः कुरु, हिरण्मय तथा रम्यक देश हैं ।
माल्यवांश्च यमकोटि पत्तनो द्रोमकाच्च किल गन्धमादनः
नीलशैल निषधावधी च तावन्तराले मनयोरिलावृतम् । १२४ ।
यमकोटि पत्तन से उत्तर की तरफ माल्यवान् तथा रोमक में उत्तर गन्धमादन
पर्वत है । यह दोनों क्रमशः नील और निषध पर्वत तक फैले हुए हैं । इनके बीच
के क्षेत्र को इलावृत्त वर्ष कहा जाता है ।
माल्यवज्जलधि मध्यवर्ती यतत् तु भद्र तुरगं जगुर्बुधाः
गन्धशैल जलराशि मध्यगं केतुमालक भिला कलाविदः । १२५ ।
माल्यवान पर्वत तथा समुद्र के बीच का भाग भद्र तुरग कहलाता है ।
गन्धमादन तथा समुद्र के बीच का क्षेत्र को भूगोल विद लोग केतुमालक देश
कहते हैं ।
निषध नील सुगन्ध समाल्यकै रतमिला वृत्त मावृत मांवभौ
अमरकेरकुलाय समाकुलं रुचिर काञ्चन चित्र महीतलम् । १२६ ।
निषध, नील, गन्धमादन और माल्यवान् इन चार पर्वतों से चार दिशाओं में
घिरा हुआ विस्तृत इलावृत्त देश है । इस देश में देवता घर बनाकर सुख से रहते
हैं । इस देश की मिट्टी सुन्दर और बिचित्र है तथा उसके नीचे स्वर्ण भण्डार है ।
इह हि मेरु गिरिः किल मध्यगः कनक रत्नमयस्त्रिद शालयः
द्रुहिण जन्म कुपद् मज कर्णिकेति च पुराणविदोऽ मुमवर्णमन् । १२७ ।
इसके मध्यभाग में मेरू पर्वत है । इसकी मिट्टी स्वर्णमय है तथा पुराणविदों
के अनुसार यहां देवताओं का निवास है । यह पर्वत ही पृथ्वी रूपी पद्म की
डण्टी (कर्णिका) है जिससे ब्रह्म का जन्म हुआ था ।
विष्कम्भ शैलाः खलु मन्दरोऽस्य सुगन्ध शैला विपुलः सुपार्श्वः
तेषुकमात्सन्ति च केतु वृक्षाः कदम्ब जम्बू वट पिप्पलाख्या । १२८ ।
इस मेरू पर्वत के चार विष्कम्भः (शाखा) पर्वत हैं-मन्दर, (मन्दराचल) सुगन्ध •
(गन्धमादन) विपुल और सुपार्श्व । इनमें क्रमशः कदम्ब, जम्बू (जामुन), वट
तथा पीपल की प्रधानता है ।
३०८ सिद्धान्त दर्पण
जम्बूफलामलगल द्रसतः प्रवृत्ता
जम्बूनदोरसहुते मृदभूत् सुवर्णम् ।
जाम्बूनदं हि तदप सुरसिद्ध संघाः
शाश्वत्पिवन्त्यमृतपान पराङ्मुखास्ते । १२९ ।
पके हुए जम्बू फल के रस गिरने से जम्बू रस की एक नदी बन गयी है ।
जिसके संसर्ग से मिट्टी से सोना बना । इस जम्बू नद का पानी पीने के लिये
देवताओं और सिद्धों का इतना आग्रह है कि वे अमृत पान से भी विमुख हो जाते
हैं ।
वनं तथा चैत्र रथं विचित्रं तेष्वप्सरो नन्दन नन्दनञ्च
धृत्याह्वयं यद् धृतिकृत् सुराणां भ्राजिष्णवैभ्राजमिति प्रसिद्धम् । १३० ।
मेरु के चार विष्कुम्भ पर्वतों के नीचे के भाग में चार वन हैं । प्रसिद्ध हैं-चैत्ररथ
अत्यन्त विचित्र है, नन्दन में अप्सरायें क्रीड़ा करती है, धृति वन देवताओं को धैर्य
देता है । तथा वैभ्राज अत्यन्त रुचिकर है ।
संरास्यथैतेष्वरुणञ्च मानस महाहदं श्वेत जलं यथाक्रमम्
सरत्सुरामा रमणश्रमालसाः सुरा रमन्ते जल के लिलालसाः । १३१ ।
इन चार वनों में चार हृद (झील) हैं- अरुण, मानस, महाह्रद और श्वेत
दल) देव स्त्रियां घूमने से थककर इन्हीं हृदों में जल क्रीड़ा करती हैं ।
सद्रत्नकाञ्चनमयं शिखरत्रयञ्च
मेरौ मुरारिक परारिपुराणि तेषु
तेषामधः शतमखज्वनान्त संख्य
रक्षोऽम्बुपानिल धनेशपुराणि चाष्टौ । १३२ ।
मेरु के पर्वत के तीन शृंग हैं-प्रत्येक रत्न और स्वर्ण से बने हैं । एक पर
विष्णु, दूसरे पर ब्रह्मा और तीसरे पर शिव अपना अपना पुर बनाकर रहते हैं ।
इन चोटियों के नीचे क्रमशः इन्द्र, अग्नि, यम, राक्षस, वरुण, पवन, कुबेर तथा
शिव के नगर हैं ।
विष्णु पदी विष्णुपदा त्यतिता मेरौ चतुर्द्धास्मात्
विष्कुम्भा चल मस्तक शस्तसरः संगता वयता । १३३ ।
विष्णु के पाद से निकल कर गंगा का अवतरण पहले मेरू पर हुआ । उससे
वह चार भागों में विभक्त होकर चार विष्कुम्भ पर्वतों के नीचे के चार हृदों में
मिल कर आगे बढ़ी ।
शीतारूया भद्राश्वं सालकनन्दा च भारतं वर्षम्
वंक्षुश्च केतुमालम् भद्रारूया चोत्तरान कुरुन् याता । १३४ ।
शीता गंगा भद्राश्व देश में, अलकनन्दा (गंगा) भारत वर्ष में वंक्षु गंगा