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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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३०४ सिद्धान्त दर्पण
सुमेरू पर देवता तथा कुमेरू पर असुरों का वास है । इन दोनों स्थानों से
बराबर दूरी पर स्थित महापरिधि को व्यक्ष या विषुव वृत्त कहा जाता है ।
अक्षांश मेरू पर्यन्तं क्रमोना वृत्त रेखिकाः
तद् भिदो मेरू युक् सक्ता द्राघिमाख्याः समा मताः । १०५ ।
इस विषुव वृत्त से क्रम से छोटे होते गये वृत्त मेरू तक ही दीखते हैं । जिन्हें
अक्षांश रेखा कहते हैं । दोनों मेरू पर्वत के बीच की रेखा जो इन अक्ष वृत्तों को
काटती है उसे द्राघिमा (देशान्तर ) रेखा कहते हैं ।
इत्थामाकाश वद् भूमावपि सर्वं प्रकल्प्यते
भूमध्यात्स्व स्थितिर्यस्मात् पृष्ठे सूत्र समाभवेत् । १०६ ।
इस प्रकार आकाश में जिन रेखाओं की कल्पना की गयी है, उसी अनुसार
पृथ्वी पर भी रेखाओं की कल्पना है । आकाश वर्णित रेखा से भू केन्द्र का सूत्र
(रेखा) पृथ्वी की सतह को जहां स्पर्श करता है, वहां वही रेखा मानी जाती है ।
ब्रह्माण्डात्म विराड् देह मेरुदण्डायिते स्थिरे
वायौ भूरादयः स्युताश्चक्राणोवतनौ नृणाम् । १०७ ।
जिस प्रकार मनुष्य देह में चक्र हैं । (मेरू दण्ड में ६ तथा ऊपर सहस्त्रार)
उसी प्रकार परमात्मा के विराट देह में भी मेरुदण्ड रूपी जो स्थायी वायु (प्रवह)
है उसमें भू, भुवः स्वः आदि लौक स्थित हैं ।
ख मेरु समरुत् प्रोक्तो लोकाधार तया गमैः
गर्भोद सिन्धु युङ् मूलः षोडशाधार भृच्छिखः । १०८ ।
आकाश के मेरु को शास्त्रों ने सभी लोकों का आधार माना है । प्रसिद्ध है
कि वहां बहुत पवन होता है । उसका श्रृंग १६ आधार का है । तथा मूल जल
समुद्र के भीतर है ।
लोका लोक तया प्रोक्ता कटाह प्रथमावृतिः
हिरणमयो भूमि संज्ञा ततो दश गुणोत्तरा । १०९ ।
पृथ्वी का नाम हिरण्मयी है । लोगों की दृष्टि में इसका आकार कड़ाह के
समान (गोलाकार है ) । भूमि का इसका प्रथम आवरण है । उससे क्रमशः
दस-दस गुणा अधिक
क्रमाज्जलादयः प्रोक्ताः प्रकृत्यन्ताः प्रसंगताः ।
यस्याधारण भूगोल शास्त्रे देशादि वर्णना । ११० ।
जल आदि के आवरण हैं, अन्त में प्रकृति है । प्रसंग के अनुसार इनका
शास्त्रों में वर्णन है । देश, (सागर, नगर) आदि का वर्णन साधारणतः भूगोल में
ही होता है, अतः