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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूगोल विवरणम् २९३
तथा इनका कर्ता है ।
तैजसं भास्वतो बिम्ब मुद् भूतं स्पर्श रूपकम्
पाञ्चभौतिक मप्येतद् भास्वत्वात् प्रदीपवत् । २८ ।
सूर्य का बिम्ब पञ्च भूतों से बना होने पर ही अत्यन्त तेजपूर्ण होने के कारण
दीपक की तरह उससे प्रकाश निकलता है । उसका तेज स्पर्श द्वारा अनुभव किया
जा सकता है । (छूने से गर्म मालूम होगा)
अस्याष्टौ भानु बिम्बस्यारम्भ का भूत भागकाः
चत्वारस्तेज सैन्येषा मे कैकोऽशः प्रकीर्तितः । २९ ।
सूर्य बिम्ब के आठ भूत विभाग हैं । इसमें ४ तेज से उत्पन्न हैं तथा अन्य
४ विभाग बाकी ४ महाभूतों के अधिनायक (प्रत्येक भाग एक महाभूत का स्वामी
हैं) ।
तेजः प्राधान्यतः सूर्य स्तै जसः प्रोच्यतेऽखिलैः
किन्तु दिव्यं रवेस्तेजो भौमाच्छत गुणाधिकम् । ३० ।
तेज तत्व प्रधान होने के कारण सूर्य को सभी तैजस कहते हैं । किन्तु दिव्य
रवि का तेज भौम, अग्नि आदि के तेज से १०० गुणा अधिक है ।
शीतस्पर्शाधिकरणं बिम्बमाप्यं हिमद्युतेः
करका वक्तदारब्धं चतुर्भिजर्ल भागकैः । ३१ ।
इसी प्रकार चन्द्र बिम्ब जल मय होने पर भी उसमें ८ में ४ भाज जल होने
के कारण उसमें शीतलता है । ओले की तरह
एकैक भागैरन्येषां भूतानां तत्र यत्पुनः
पर प्रकाशकत्वं तद् भानूमद् भानु संक्रमात् । ३२ ।
बाकी चार भागों में प्रत्येक १-१ महाभूत से सम्बन्धित है । सूर्य के प्रकाश
के कारण इसमें भी प्रकाश होता है ।
प्रथमां पिवते वह्निः कलामित्यादि यत् स्मृतेः
वाक्यं सौक्त्या पचयतो नैवेदं पारमार्थिकम् । ३३ ।
स्मृति वाक्य (शान्ति पाठ) में कहा गया है । कि चन्द्र प्रथम कला या किरण
से आग को पीता है वह यथार्थ नहीं (लाक्ष णिक) है । चन्द्र की शुक्लता कम
होने के कारण इस प्रकार कहा जाता है । तब वह शुक्ल अंश अग्नि के समान
लाल दीखता है)
तेजसः स्यात्कथं पानं दृष्टि भोगोऽत्र केवलः
देवदत्तेन भुज्यन्ते ग्रामा स इति वन्मतः । ३४ ।
तेज का पान नहीं हो सकता अतः इसका अर्थ यहां दृष्टि भोग, (आंख से