सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 386

अष्टादश प्रकाश
भूगोल विवरणम्
यत्प्रोचुर्भगवानिति श्रितजनाः सांख्याश्च पातञ्जला-
निर्लेपः पुरुषः परः शिव इति ब्रह्म मेति वेदान्तिनः
न्यायज्ञाः परमात्मशब्द ममृतं कर्मेति मीमांसकाः
सौराद्याः कुलदैवतं किमपि तत् कृष्णारूपं तत्वं भजे । १ ।
आश्रित लोग जिसको ऐश्वर्य शाली (भग-ऐश्वर्य) कहते हैं । सांख्य और
योग में जिसका नाम निर्लिप्त पुरुष और परम शिव, वेदान्त में जिसे ब्रह्म कहा
गया है, न्याय शास्त्र जिसे परमात्मा (अमर) कहता है, मीमांसक जिसे कर्म कहते
हैं तथा सूर्योपासक जिसे कुल देवता कहते हैं, उसी श्रीकृष्ण रूपी तत्व को में
नमस्कार करता हूँ ।
सृष्टिः प्राग् बहुधोदितामुनिवरैः तत् सार भूतां तदा
वक्ष्येऽन्यत्र कृतौ भविष्यदि यदा सृष्टिः तदीया दया
सिद्धान्त प्रथनोचिता मिह पुनः सौरोक्तरीत्या ब्रुवे
पूर्व प्रश्न गणानुवाद विहिता संस्थान मानादि च । २ ।
महर्षियों ने सृष्टि के विषय में बहुत कुछ कहा है यदि भगवान की दया हुयी
तो इस विषय पर विस्तार से एक अन्य ग्रन्थ में कहूँगा । यहां पुनः सूर्य सिद्धान्त
की रीति से इस ग्रन्थ के लिये उपयोगी बातें सृष्टि के बारे में कह रहा हूँ । पहले
कहे हुए प्रश्नों के उत्तर रूप में सृष्टि की स्थिति और परिमाण के विषय में भी
कहूंगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-श्रृणुष्वैक मनास्तत्वं गुह्य मध्यात्म संगितम्
प्रवक्ष्याम्येव भक्तानां नादेयं विद्यते मम । ३ ।
एक मन होकर सुनो क्योंकि अध्यात्म से सम्बन्धित होने के कारण यह तत्व
अति गोपनीय है । मेरे पार ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे भक्तों को न देकर अपने
पास रख लूं ।
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः
अव्यक्तो निर्गुणः शान्ति पञ्चविंशा त्परोऽव्ययः । ४ ।
परम ब्रह्म की मूर्ति ही परम पुरुष वासुदेव हैं । वह निर्गुण, शान्त, अव्यय
और २५ तत्वों से अतिरिक्त हैं ।
प्रकृत्यन्तर्गतो देहो बोध्यमानस्तु सर्वगः
संकर्षणोऽपः सृष्ट्यादौ वासुबीजमथा सृजत् । ५ ।
परम ब्रह्म के अंश रूप संकर्षण ने देहधारी होकर प्रकृति में प्रवेश किया ।