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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

२९० सिद्धान्त दर्पण
वह सर्वगामी और बोध्य है । इससे सर्व प्रथम जल की सृष्टि हुयी और उसमें
संकर्षण ने बीज डाला ।
तदण्डम भवंद् हैमं सर्वमन्तस्तमो वृतम्
तत्रानिरुद्ध प्रथमं व्यक्तीभूत सनातनः । ६ ।
वह बीज सुवर्ण अण्ड में परिणत हुआ जिसके भीतर सिर्फ अन्धकार था ।
उस अन्धकार के भीतर चिरस्थायी अनिरुद्ध प्रकाशित हुये ।
हिरण्यगर्भो भगवाने ष छन्दसि पश्यते
आदित्यो ह्यादि भूतत्वात् प्रसृत्य सूर्य उच्यते । ७ ।
वेद में इस अनिरुद्ध को भगवान हिरण्य गर्भ कहा गया है । यह प्रथम उत्पत्ति
होने के कारण आदित्य सूर्य भी कहा गया ।
परं ज्योतिस्तमः पारे सूर्येऽयं सवितेति च
पर्येति भुवनान्येष भावयन् भूत भावनः । ८ ।
अन्धकार का अन्त करने के कारण इसे परम ज्योति कहा गया तथा सृष्टि
रचने के कारण सविता । वह प्राणियों का निर्माण करने के साथ साथ सभी
भुवनों (३ या १४ भुवन) का परिभ्रमण करते हैं ।
प्रकाशात्मा तमो हन्ता महानित्येष विश्रुतः
ऋचेऽस्य मण्डलं सामान्युस्रा मूर्तिर्यजूंषि च । ९ ।
अन्धकार को नष्ट करने का कारण सूर्य महान् के रूप में विख्यात् हैं । ऋक्
वेद का मन्त्र इनका मण्डल, सामवेद मन्त्र इनका किरण तथा यजुर्वेद मन्त्र इनका
शरीर के रूप में प्रतिपादित किया जाता है ।
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्म काल कृद् विभुः
सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वस्मिन् सः प्रतिष्ठितम् । १० ।
अतः सूर्य तीन वेदमय और ऐश्वर्य्यशाली है । वह काल की आत्मा हैं ।
अर्थात् समय का मान उन्हीं से निर्धारित हुआ है । वह काल के कर्ता और
सर्वव्यापी वह समस्तों की आत्मारूपी हैं । अतः हर स्थान के भीतर सूक्ष्मरूप से
हैं । (वृहद् रूप में ) सभी उनके भीतर हैं ।
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम्
छन्दां स्यश्वाः सूत्रयुताः पर्येत्येषवसीसदा । ११ ।
चर अचर सहित पूरा विश्व उनका रथ है, छन्द उनका घोड़ा, ये किरणों से
युक्त होकर सूर्य के समान परिक्रमा करते हैं । सभी सूर्य के वश में हैं ।
त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत्
सोऽहंकारं जगत्स्रष्टुंब्रह्माणमसृजत् प्रभुः । १२ ।