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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

भूगोल विवरणम् ३०७
उत्तर निषध पर्वत है । प्रत्येक का विस्तार समुद्र तक है । पुनः सिद्धपुर से उत्तर
क्रमशः श्रृंगवान् शुक्ल और नील पर्वत है । दो दो पर्वतों के बीच में जो वर्ष हैं
उन्हें द्रोणी देश कहते हैं ।
भारत वर्ष मिदं ह्युदगस्मात् किन्नर वर्ष मतो हरिवर्षम्
सिद्धपुराच्च तथा कुरु तस्माद् विद्धि हिरण्मय रम्यक वर्षे । १२३ ।
लंका से उत्तर दिशा में पहले भारतवर्ष तब किन्नर देश तथा उसके बाद हरि
देश है । सिद्ध पुर से उत्तर क्रमशः कुरु, हिरण्मय तथा रम्यक देश हैं ।
माल्यवांश्च यमकोटि पत्तनो द्रोमकाच्च किल गन्धमादनः
नीलशैल निषधावधी च तावन्तराले मनयोरिलावृतम् । १२४ ।
यमकोटि पत्तन से उत्तर की तरफ माल्यवान् तथा रोमक में उत्तर गन्धमादन
पर्वत है । यह दोनों क्रमशः नील और निषध पर्वत तक फैले हुए हैं । इनके बीच
के क्षेत्र को इलावृत्त वर्ष कहा जाता है ।
माल्यवज्जलधि मध्यवर्ती यतत् तु भद्र तुरगं जगुर्बुधाः
गन्धशैल जलराशि मध्यगं केतुमालक भिला कलाविदः । १२५ ।
माल्यवान पर्वत तथा समुद्र के बीच का भाग भद्र तुरग कहलाता है ।
गन्धमादन तथा समुद्र के बीच का क्षेत्र को भूगोल विद लोग केतुमालक देश
कहते हैं ।
निषध नील सुगन्ध समाल्यकै रतमिला वृत्त मावृत मांवभौ
अमरकेरकुलाय समाकुलं रुचिर काञ्चन चित्र महीतलम् । १२६ ।
निषध, नील, गन्धमादन और माल्यवान् इन चार पर्वतों से चार दिशाओं में
घिरा हुआ विस्तृत इलावृत्त देश है । इस देश में देवता घर बनाकर सुख से रहते
हैं । इस देश की मिट्टी सुन्दर और बिचित्र है तथा उसके नीचे स्वर्ण भण्डार है ।
इह हि मेरु गिरिः किल मध्यगः कनक रत्नमयस्त्रिद शालयः
द्रुहिण जन्म कुपद् मज कर्णिकेति च पुराणविदोऽ मुमवर्णमन् । १२७ ।
इसके मध्यभाग में मेरू पर्वत है । इसकी मिट्टी स्वर्णमय है तथा पुराणविदों
के अनुसार यहां देवताओं का निवास है । यह पर्वत ही पृथ्वी रूपी पद्म की
डण्टी (कर्णिका) है जिससे ब्रह्म का जन्म हुआ था ।
विष्कम्भ शैलाः खलु मन्दरोऽस्य सुगन्ध शैला विपुलः सुपार्श्वः
तेषुकमात्सन्ति च केतु वृक्षाः कदम्ब जम्बू वट पिप्पलाख्या । १२८ ।
इस मेरू पर्वत के चार विष्कम्भः (शाखा) पर्वत हैं-मन्दर, (मन्दराचल) सुगन्ध •
(गन्धमादन) विपुल और सुपार्श्व । इनमें क्रमशः कदम्ब, जम्बू (जामुन), वट
तथा पीपल की प्रधानता है ।