सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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अतो भारत वर्षस्य याम्य भागे त्रिकोणता
प्राक् पश्चान्मध्य देशानामन्तरज्ञानतोऽपि च । ९० ।
अतः इन तीन स्थानों का त्रिकोण भारत वर्ष के दक्षिणी भाग में स्थित है ।
पुनः भारत वर्ष का पूर्व, पश्चिम और मध्य भागों का अन्तर देखने से भी स्पष्ट होता
है कि -
शंखाग्रा कारता सिद्धि स्तद्वीपेऽस्मिन्न वृत्ततां
तन्मानता न चैवाब्धौ न चापि वलयाकृतिः । ९१ ।
भारत का आकार शंख के अग्रभाग की तरह है । अतः जम्बूद्वीप का आकार
वृत्ताकार नहीं है । इसी प्रकार समुद्र भी वलयाकार नहीं है । (जैसा पुराणों में
कहा गया है ।)
तत्ततोऽधिक मानोऽसौ सागरो विविधाकृतिः
प्राक्पश्चाद् याम्य सौम्याख्या नानारूपः स्थानभेदतः । ९२ ।
समुद्र भी विविध आकार के तथा अधिक मान के हैं । पूर्व पश्चिम, दक्षिण
तथा उत्तर नाम से इन समुद्रों का नाम करण हुआ है । स्थान भेद से इनका नाम
अलग अलग है ।
लवणार्णव मध्यस्था द्वीप भेदः परः शताः
दशार्बुदाधिका संख्या मनुष्याणां भुविश्रुता । ९३ ।
लवण समुद्र में भिन्न भिन्न सौ से अधिक द्वीप हैं । सुना जाता है । कि
पृथ्वी पर १०० कोटि से भी अधिक लोग रहते हैं ।
समन्ताद् योजनं कल्पे भूगोलः किल वर्द्धते
इति सिद्धान्त तो वृद्धे वैषम्याद्देश भेदतः । ९४ ।
एक कल्प में पृथ्वी गोल की वृद्धि चारों तरफ चार कोस होती है यह सिद्धान्त
स्थिर हो चुका है । अवश्य स्थान भेद से यह वृद्धि कम या अधिक होती है ।
बहुदिक् प्रसरद् वात क्षुब्धाम्भोधि जला हते
वर्षो द्रेकान्नदी वेगान्मृदां नाना विध स्थिते । ९५ ।
अनेक दिशाओं में हवा से क्षुब्ध समुद्र जल के आघात से तथा वर्षा वेग
और नदी के प्रवाह से मिट्टी का कटाव अनेक प्रकार से होता है ।
उन्मजन्ति निमजन्ति केचित्केचित्कदा कदा
क्षुद्राद्वीपा महन्तस्तु भिन्नाकारा भवन्ति हि । ९६ ।
मिट्टी के असमान कटाव के कारण विभिन्न आकार के छोटे और बड़े द्वीप
कभी दब जाते हैं । तथा कभी समुद्र से ऊपर उठ जाते हैं । तथा आकार भी
बदल जाता है ।