सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् २९१
सूर्य के तेज का एक पाद हो प्रकाशित है तथा तीन पाद अमृत के रूप में
गोपन है । उन्होंने अहंकार की सृष्टि कर जगत् बनाने के लिये ब्रह्मा की सृष्टि
की ।
तस्मै वेदान् वरान् दत्वा सर्व लोक पितामहम्
प्रतिष्ठाव्याण्ड मध्येऽथ स्वयं पर्यतिभासयन् । १३ ।
सूर्य ने ब्रह्मा को वेदरूपक वर देकर उनको अण्ड के भीतर स्थापित किया
तथा स्वयं प्रकाशित होकर भ्रमण करते हैं ।
अथ सृष्ट्यै मनश्चक्रे ब्रह्माहंकार मूर्त्तिमान्
मनश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्योऽग्नेस्ते जसां निधिः । १४ ।
ब्रह्मा ने अहंकार रूप में आकर सृष्टि करने में ध्यान दिया । उनके मन से
चन्द्र, कान ने अग्नि तथा आंख से सूर्य उत्पन्न हुए जो सभी तेजों के भण्डार हैं ।
मनसः खं ततो वायुरग्नि रापो धराक्रमात्
गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे । १५ ।
मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, से जल, जल से पृथ्वी-इस
प्रकार एक एक गुण बढ़ने के क्रमशः पञ्चमहाभूतों का जन्म हुआ ।
अग्निरापो भानुचन्द्रौ ततश्चाङ्गिरकादयः
तेजो भूखाम्बु वातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे । १६ ।
अग्नि, जल, सूर्य चन्द्र और तब मंगल आदि उत्पन्न हुये । तेज पृथ्वी,
आकाश, जल और पवन से इनकी (पांच तारा ग्रहों) भौम आदि) उत्पत्ति हुयी ।
पुनर्द्द्वादशधात्मानं विदधे राशि संज्ञकम्
नक्षत्र रूपिणं भूयः सप्त विंशात्मकं वशी । १७ ।
पुनः ब्रह्मा ने अपने को १२ भागों में बांट कर १२ राशियों का रूप ग्रहण
किया । इन्हीं १२ राशियों को २७ नक्षत्रों मे विभाजित किया ।
ततश्चरा परं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम्
ऊर्ध्वमध्या परेभ्यश्च स्रोतोभ्यः प्रकृतिं सृजन् । १८ ।
उसके बाद देवता तथा तब ऊपर, मध्य तथा नीचे क्रम से प्रकृति की सृष्टि
तथा चर अचर सहित पूरा विश्व बनाया ।
गुणकर्म विभागेन सृष्ट्या प्राग्वदनुक्रमात्
विभागं कल्पयामास यथास्वं वेद दर्शनात् । १९ ।
अपने वेद ज्ञान के द्वारा उन्होंने अपने अपने गुण और कर्म के अनुसार विभागों
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