सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् २९९
तद् धनुर्दृश्यलिमाः स्युस्तच्छंकौः क्षितिज्या परि ।
दृश्य ज्या परिधिक्षुण्णा चक्रलिमोद्धृता फलम् । ६९ ।
इस उन्नत ज्या का चाप क्षितिज के ऊपर उस संस्कृत शंकु की दृश्यकला
(२१,०००) से भाग देने पर फल-
शंको दृश्ये नतिः साथ त्रिज्याघ्नी कोटि भाजिता
दृश्य भागः स्फुटः शंको स्याद् योजन करादिकः ।
शंकु का योजन में दृश्य भाग होता है । शंकु की दृश्योन्नति होती है । इस
दृश्योन्नति को त्रिज्या से गुणा कोटिज्या से भाग देने पर फल शंकु का योजनात्मक
दृश्य भाग होता है ।
परिधिघ्नोत्क्रमज्याथ भचक्र कलिकोद्धृता
त्रिज्याघ्नी कोटि जीवाप्तां लुप्तांश प्रमिति र्भवेत् । ७१ ।
पुनः उत्क्रमज्या को भू परिधि से गुणा कर भचक्र कला से भाग दें । और
फल को त्रिज्या से गुणा कर कोटिज्या से भाग दें । फल शंकु के अदृश्य भाग
का परिमाण होता है ।
हिमाद्रीशृंग तलतः कुनृपै (१६१) योजनैः स्थिते
दक्षिणे नीलशैलेऽत्र द्रष्टुः स्थानं प्रकल्प्यते । ७२ ।
हिमाचल के शृंग तल से दक्षिण की तरफ १६१ योजन पर नीलाचल (पुरी
में श्री जगन्नाथ मन्दिर) को द्रष्टा का स्थान मानें ।
तदन्तरोत्थदे र्लिप्ताद् व्यं कांग (६९२) न्युत्क्रमज्यका
सप्ततिः (७०) कोटि जीवाष्ट रसाग्न्यग्निमिता (३३६८) भवेत् । ७३ ।
उसकी (१६१) योजना की भुजकला ६९२, उत्क्रमज्या ७० तथा कोटिज्या
३३६८ हुयी ।
पूर्वोक्तः संस्कृत शंकुः (२१५) स्फुटो रुद्राक्षिः (२११) सम्मितः
दृश्यज्याधरणी शक्र (१४१) उन्नतज्येषु खाद्रयः (७०५) । ७४ ।
संस्कृत शंकु २१५, स्फुट शंकु २११, दृश्यज्या १४१ तथा उन्नतज्या (७०५) ।
दिगाद्रयो (७१०) नतकलादेव ३३ दृश्योन्नतिस्तथा
स्फुट दृश्योन्नति वेदगुण (३४) योजन सम्मिता । ७५ ।
उन्नतज्या का चाप (७१०) उन्नतकला, दृश्य की उन्नति ३३ स्फुट दृश्योन्नति
३४ तथा
षोडशा दृश्यमानानि योजनानि गिरेर्यतः
क्षितिज्या द्वादशांशोन्नस्तत्र दृश्यो हिमालयः । ७६ ।
दृश्यमान १६ योजन हुआ । अतः क्षितिज से १२ अंश (१६ योजन का चाप)