सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
भूगोलस्थिति वर्णनम् २६९
से चन्द्र क्रान्ति मार्ग नहीं छोड़ता, बिल्कुल शर नहीं रहने पर पृथ्वी कैसे क्रान्ति
मार्ग को छोड़ सकती है ? (अर्थात् विषुव तल में कैसे गति हो सकती है ?)
खे वाक्षितं व्रजतु कुशलै घूर्णमानं दधित्थं
चक्रं चक्राम्यतु भुविदिवि स्यन्दनस्थं करस्थम् ।
पृथ्वी पृष्ठे लुठतु कठीनीगोलकः खेलया वा-
देह भ्रान्तिर्न भवति विना स्व स्व मार्गा भिमुख्यात् । ६४ ।
घूमते हुए कैथ फल को आकाश में फेंकने से, रथ चक्र को आकाश में या
जमीन पर लुढ़काने से, या खेल में गेन्द लुढ़काने से उनका अपने अक्ष पर भ्रमण
अपनी गति की दिशा में ही होता है । किन्तु पृथ्वी विषुव कक्षा में अपने अक्ष
पर घूमती है । तो उसके बदले क्रान्ति मार्ग पर क्यों गति है ?
यदि भ्रामं भ्रामं भ्रमति धरणी क्रान्ति पथगा
तिरश्चिरा भानां पतिरि वतदा वासि पुरुषैः
स्व पूर्वाद्याशास्थ द्रुम धरणि भृत् क्रोश गमने
सुलक्ष्यो दिग् भेदः प्रतिदिन मुडुनां तदुदये । ६५ ।
चन्द्र विषुव पर तिरछे रह कर अपने अक्ष पर घूमते हुए विमण्डल में चलता
है, यदि पृथ्वी भी इसी प्रकार विषुवमार्ग पर घूमते हुए क्रान्ति मार्ग पर गति करती
है तो पृथ्वी के लोग पृथ्वी पर पूर्व आदि दिशा में स्थित वृक्ष और पर्वतों की
कोण गति देखते जिस प्रकार नक्षत्रों का उदय अलग अलग दिशा में देखते हैं ।
स्व कक्षा वृत्तत्वे भवति सवितुर्मूर भिमुखी
मयास्थीः क्रान्त्युद्भावप वलय दैर्घ्याद् गति पथः
दिशोर्याम्यो दीच्यो र्गुण वद् जुरिष्टो तियदिचेत्
इतिक्षमाया दृश्यस्त नु रयन सन्धौ दिनकरः । ६६ ।
अपनी कक्षा वृत्त (अक्ष पर विषुव वृत्त में गति) के साथ साथ पृथ्वी यदि
क्रान्ति वृत्त में सूर्याभिमुखी भी हो, तो क्रान्ति वृत्त के दैर्घ्य (दीर्घ वृत्त या वलय
के लम्बा होने) के कारण क्रान्ति गति पथ उत्तर और दक्षिणी दिशा में ज्या के
समान सरल होगा (चाप के समान गोला कार नहीं) यदि मेरे मत का तुम इस
प्रकार अर्थ लेते हो तो मेरा उत्तर है कि इस अवस्था में सायन सूर्य कर्क और
मकर आदि में दूरी के कारण (दीर्घ वलय का दूर का भाग में) छोटा और मेष,
तुला के आदि में निकटता के कारण छोटा दीखना चाहिये । (पर ऐसा नहीं
होता) ।
विदुरोऽनाथ स्येत्थं विषुवति भुवः सन्निधि वशा
न्निशानाथ स्येत्थं शरसु सरलेऽपक्रमपथे
क्वसाम्पूरूयात् लक्ष्यं रजनी लक्ष्मक्षितिगतै-
र्भिभिन्नाकारं यत्तदवनि गति र्नत्र घटते । ६७ ।
२७० सिद्धान्त दर्पण
इसी प्रकार चन्द्र का क्रान्ति मार्ग (विमण्डल) अत्यन्त सरल होने के कारण
चन्द्र का कलंक भी पृथ्वी वासियों को एक ही प्रकार दीखना चाहिये । किन्तु
यह भी नहीं होता, चन्द्र कलंक भिन्न भिन्न आकार (दिशा) में पृथ्वी से दीखता
है (अतः ग्रन्थकार के मत से पृथ्वी का भ्रमण नहीं होता)
केन्द्राभिमुख्य घटना कृष्टस्यामां तथापि भूमति
अदिन कराभिमुख्यतया स्रष्टुः सेच्छा वसात्क्रान्तो । ६८ ।
यदि तुम्हारा कहना है कि सूर्य केन्द्र द्वारा आकृष्ट होने पर भी पृथ्वी की गति
सूर्य की दिशा में न होकर क्रान्ति वृत्त में सृष्टि कर्त्ता की इच्छा के कारण है, तो
मैं कहूँगा कि उसी सृष्टि कर्त्ता की इच्छा से पृथ्वी स्थिर रहे उसमें हलचल नहीं
हो ।
इति वदसि तदिच्छा प्रामाण्यै मन्यतां महीस्थास्युः
आकर्षण गुरु भानोः स्याचेत् किं नास्ति तत् क्ष्मायां । ६९ ।
यदि बड़ा होने के कारण सूर्य में आकर्षण है (ऐसा कहते हो) तो वह पृथ्वी
में भी क्यों नहीं होगा । (आकर्षण शक्ति केवल बड़ी वस्तु में ही कैसे होगी ?
स्थिराश्मकान्तेन कृशेनयस्मादाकृष्यते तत् पृथुलोह पिण्डः
आकर्षणे कारणमेव शक्ति र्निसर्ग का नो पृथुता न तेजः । ७० ।
स्थिर छोटा लौह चुम्बक भी बड़े पिण्ड को खींचता है । इससे यह सिद्ध है
कि आकर्षण शक्ति का कारण पिण्ड का बड़ा होना नहीं, उसकी अपनी स्वाभाविक
(नैसर्गिक) शक्ति है ।
यदि क्षुद्र द्रव्यं भ्रमति वृहदाकर्षण बला-
नतु क्षुद्रं स्थूलं भ्रमण कृदियं वाक् तव तदा ।
स्वतन्त्रत्वे सा सम्भवति न पराधीन वलयो-
र्यतः सर्वाकर्षिणयुत भगवदिच्छा बलवती । ७१ ।
इतना समझाने पर भी यदि तुम्हारा कहना है कि बड़ी वस्तु छोटे को खींच
सकती है पर छोटी वस्तु बड़े को नहीं तो मेरा उत्तर है कि यह स्वतन्त्र वस्तु के
लिये ही यह बात सम्भव है । जिस द्रव्य (छोटा या बड़ा) में स्वाधीन बल नहीं
है उसके लिये यह ठीक नहीं है । प्रत्येक वस्तु को आकर्षित करने वाली शक्ति
सदा भगवान की इच्छा के अधीन है ।
तड़ागान्तर्यष्टि कृश तनु मनु क्रामति यथा
महानौः कैवर्त्ता चरण परतन्त्रा जगदिदम्
तथा पर्यत्यर्कः पृथुरपि महेशा शयवशात् -
त्रिलोको लोकानामवनविधये सग्रह गणः । ७१ ।
जिस प्रकार तालाब में स्थित छोटे यूप दण्ड को नाविक की इच्छा के कारण
Here is the complete, line-by-line transcription of the page into Devanagari Markdown:
भूगोलस्थिति वर्णनम् २७१
बड़ी बड़ी नौकायें परिक्रमा करती हैं, उसी प्रकार ईश्वर की इच्छा से छोटी पृथ्वी
की परिक्रमा विशाल सूर्य अन्य ग्रहों के साथ त्रिभुवन के लोकोपकार के लिये
करता है ।
सूर्योवान्य ग्रहो वा निजतन परतो भ्रान्त माघ्नोतु तस्याः
का हानि र्भू स्थित्वे भवति वदसखे यस्य योऽस्ति स्वभावः
सोऽन्येषां दर्शनात् किं व्यभिचरति भवान् यन्त्र साहाय्य वत्वात्
सर्वेषां भ्रान्ति दर्शो न किमुडु पततोः पश्यति भ्रान्ति मारात् । ७३ ।
सूर्य और अन्य ग्रह अपने अक्ष पर घूमते है । इस कथा के साथ पृथ्वी के
स्थिर रहने में क्या विरोध है ? कौन चलता है और कौन नहीं चलता इसमें कोई
कठिनाई नहीं है- जिसकी जैसा स्वभाव है वैसा करेगा । आपने यन्त्र की सहायता
से ग्रहों की गति देख ली पर निकट के चन्द्र की (अपने अक्ष पर) गति क्यों नहीं
देख पाये ?
भ्रान्ति र्नोपग्रहाणां प्रभवति महतां खेचराणामिवे
' or 'र्न'?
Wait, could it be "र्कोनल"?
Wait, look at the translation:
"जिस प्रकार रवि और आग का गुण उष्म होता है"
रवि (अर्क) और आग (अनल).
अर्क + अनल = अर्काऽनल!
If the author adapted the Siddhanta Shiromani verse:
Original: "यथोष्णताऽर्काग्न्योश्च शीतता विधौ"
Here, instead of "अर्काग्न्योश्च", the author wrote:
"र्कोनल योश्च" or "र्कानल योश्च" or "र्काऽनल योश्च"?
Wait! Let's look at:
य थ ो ष् ण ता
Then:
र्का or र्को?
Wait, the top of the letter after space:
There is a repha! It curves to the right from the top of the vertical stem!
And to the left of the stem is a loop like 'क'!
So it is 'र्क'!
Wait, is there an aa-matra or an o-matra or an avagraha?
There is a vertical line with a repha? No, the vertical line has 'क' attached.
Then the next letter is 'न'!
Wait, is there a letter between 'क' and 'न'?
No! It is: 'र्क' then 'न' then 'ल'?
Wait, is it "र्कानल"?
Wait, look at the repha:
भूगोलस्थिति वर्णनम् २७३
यदि सभी ग्रहों की कक्षा के केन्द्र में सूर्य मण्डल है तो पृथ्वी से देखने पर
वह स्फुट सूर्य (१) बुध, शुक्र तथा ( २) मंगल गुरु शनि का क्रमशः
मध्यता शीघ्रता पातः सोऽस्तीति त्वं ब्रवीषिचेत्
तदापरिधिभिः स्वीयैर्दृक् सिद्धेः शीघ्र मन्दजः । ८२ ।
(१) मध्यम मान तथा (२) शीघ्रोच्च होगा । उस अवस्था में प्रत्यक्ष देखे गये
शीघ्र और मन्दपरिधि से
सर्व संस्कार शालिन्यां विहितायां स्फुटी कृतौ ।
कन्या मीन स्थिते भानौ केन्द्र चक्रान्तिक स्थयोः । ८३ ।
सभी संस्कार कर ग्रह स्पष्ट करने पर स्पष्ट सूर्य जब कन्या या मीन राशि में
हो तो उच्च के निकट स्थित (सूर्य के दूसरी तरफ के कक्षा के भाग में )
भौम भार्गवयो दृश्यः प्रभेदाः स्वस्थितेः क्रमात्
कलाभि र्द्विशरै (मं-५२) रब्धि सायकैः (शु-५४) पुनरेतयोः । ८४ ।
मंगल और शुक्र के दृक् सिद्ध मान से गणितागत मान में क्रमशः ५२ तथा
५४ कला की अन्तर पड़ता है ।
चक्रार्द्ध स्थितयो द्व्यंग बाहुभि (म २६२) विशिखामरैः (शु ३३४)
प्रभेदश्चेत्यमन्येषां दृश्यते परिधिक्रमात् । ८५ ।
पुनः यह दोनों चक्रार्द्ध (पृथ्वी की तरफ का कक्षा भाग ) में रहने पर क्रमशः
२६२ (मंगल) तथा ३३४ (शुक्र) कला का अन्तर दीखता है । इसी प्रकार अन्य
ग्रहों का भी भेद दीखेगा ।
तत्कथं सूर्य बिम्बस्य सम्भवेद् मध्यशीघ्रता
तमूरी कुर्वतः सर्वमुदयस्तत्वेन यत्नतः । ८६ ।
अतः स्फुट सूर्य को बुध, शुक्र का मध्यम तथा मंगल गुरु, शनि का शीघ्रोच्च
कैसे माना जा सकता है सूर्य को सभी ग्रहों का कक्षा केन्द्र जो लोग यत्नपूर्वक
स्थिर करते हैं उनका यह मत है ।
काकतालीयवत् क्वापि दृक् सिद्धावपि ते मतम् ।
नास्माभिर्मन्यते साधु कदाचित् कं प्रमातृभिः । ८७ ।
काकतालीय न्याय (कौवा ताल वृक्ष पर बैठने के बाद उसका एक फल गिर
पड़ा अत यह माना गया कि कौवा के कारण फल टूटा) के समान इस विधि से
अभी दृक् सिद्ध होता है । अतः यही मत ठीक है-यह मत युक्ति युक्त और सब
समय ठीक नहीं होगा । अतः यह मत मैं नहीं मानता ।
सर्वग्रहाणां भ्रमिकृत् केन्द्रस्थो मध्यमोरविः
स्वीकार्यश्चेत् तदेव स्यात् दृक् सिद्धः सार्वकालिकी । ८८ ।
२७४ सिद्धान्त दर्पण
मध्यम रवि को सभी ग्रहों का कक्षा केन्द्र मानने से स्पष्ट ग्रह सब समय
दृकसिद्ध होते रहे हैं ।
स्फुटार्क स्येति केन्द्रत्वा सिद्धावाकृष्य भावतः
निजोच्च देवताकृष्ट श्चन्द्रवद् भ्रान्ति मेति सः । ८९ ।
अतः स्फुट रवि ग्रह कक्षा के केन्द्र में नहीं है, इससे सिद्ध हुआ कि ग्रह
स्फुट रवि की तरफ आकर्षित नहीं है और वह अपने उच्चके देवता से आकृष्ट
होकर चन्द्र के समान स्वयं घूमते हैं । यही मानना युक्ति युक्त लगता है ।
चक्रार्द्ध योगाद् भृगु जस्य चन्द्र फलाल्प भावादय भूमिजस्य
परोच्च मन्दोच्चफलाल्प भेदात् तौदृक् समौ वा भवदुक्तितः स्वाम् । ९० ।
चक्रार्द्ध में रहने पर शुक्र का मन्दफल अत्यन्त कम है तथा मंगल के परोच्च
और मन्दोच्च में बहुत कम अन्तर होने के कारण आपके मत से भी वह दोनों दृक्
सिद्ध हो सकते हैं ।
स्थित्वा स्वमध्येऽपमण्डला नुसारात् तनु भ्रान्ति मता सवित्रा
आकृष्ट कक्षाः सुतरां प्रयान्तु बुधादयः क्रान्ति पथेन खेटाः । ९१ ।
किन्तु आकाश में क्रान्ति वृत्त के धरातल में अपने अक्ष ( धरातल पर लम्बरूप)
पर घूमते हुए सूर्य से आकर्षण के कारण बुध आदि ग्रह क्रान्ति वृत्त में ही गति
कर सकते हैं । उनका विमण्डल क्रान्ति वृत्त में होगा )
तयार्यमा कर्षत कक्षया भुवा विधुः समाकृष्ट तनु प्रयाति चेत् ।
तदा कुगोल भ्रमि सिद्ध्या दिशा प्रयातु मेवा र्हति नान्यथा क्वचित् । ९२ ।
उसी सूर्य द्वारा आकर्षित होकर पृथिवी चलती है तथा पृथिवी के आकर्षण से
चन्द्र चलता है । यदि ऐसा है तो चन्द्र भी पृथिवी की तरह अपने अक्ष पर घूमने
की दिशा में जाने को बाध्य है, अन्य दिशा में नहीं जा सकता ।
क्षितेस्तथा क्रान्ति पथाभिमुख्यतो विदिश्यपि स्याद् विषुवेध्रुवेक्षणम्
न चाप मस्तद् ध्रुव पार्श्वक भ्रमे भवेद् विधोरित्यवला चला कथम् । ९३ ।
और भी, सूर्य के आकर्षण के कारण पृथिवी की गति क्रान्ति कृत में होने से
(पृथिवी की अक्ष पर गति भी उसी तल में होगी) तथा विषुव दिन पर ध्रुव एक
कोण पर दीखेगा (विषुव क्षेत्र से) । पुनः पृथिवी की क्रान्ति वृत्त गति से आकृष्ट
चन्द्र की स्पष्ट क्रान्ति कैसे होगी । वह क्रान्ति वृत्त में ही चलेगा । इन सबसे
पृथिवी का स्थिर होना सिद्ध है ।
मन्दोच्च पाता प्रभवाधरोर्द्धव याम्योत्तरावस्थिति दृष्टि हेतो
प्रति व्यपादि भ्रममण्डलानां योगाद् यदुत्पद्यत एव वृत्तम् । ९४ ।
मन्दोच्च, शीघ्रोच्च और पात आदि के कारण ग्रह की ऊपर, नीचे उत्तर तथा
दक्षिण में अवस्थिति होती है-इस गति को मार्ग दिखाने वाले वृत्त वास्तविक
भूगोलस्थिति वर्णनम् २७५
वृत्त नहीं है । वरन्
तया तदेवो दिन मत्र वृत्त भासो ग्रहाणां सरणिर्यदेतत्
युक्तञ्च पातोच्च गतीक्षणार्तं क्षेपाभिरक्षात् मसुराः प्रदिष्टाः । ९५ ।
ये सिर्फ वृत्त का आभास (या उसकी अदृश्य दिशा या रेखा) हैं। इसी कक्षा
में ग्रह का शर (बिम्ब से कदम्ब प्रोत वृत्त कक्षा को जिस बिन्दु पर काटता है)
होता है । पाश्चात्य लोग जिस प्रकार ग्रह गति का कारण (सूर्य) का आकर्षण
और विक्षेप मानते हैं, उसी प्रकार हम उन्हें आकर्षण और विक्षेप शक्ति वाला
देवता मानते हैं ।
भवन्मते भूमिरियं ग्रहेभ्यो न भिद्यते तुल्यगुणा स्थितत्वात्
तथा सति स्थूलतराः पृथिव्या जीवाद्याः पातवशाद् विदूरम् । ९६ ।
यदि पृथ्वी भी अन्य ग्रहों के समान मानी जाय तो पृथ्वी से आकार में बहुत
बड़ा वृहस्पति पात के कारण बहुत दूर (उत्तर या दक्षिण दिशा में) क्यों चला
जाता है ?
विक्षेप मृच्छन्ति कथं क्ष्मा किं नक्षिप्यते शुक्र समात्व दुक्त्या ।
बिम्बानपेक्षा यदिष स्तदस्या गुरोरपि क्षुद्र इतीर्यते चेत् । ९७ ।
शुक्र के समान पृथ्वी भी सूर्य के निकट है, पर पृथ्वी का शुक्र की तरह
विक्षेप क्यों नहीं होता ? शर या पात गी गति बिम्ब मानकर निर्भर नहीं है अतः
गुरु से पृथ्वी कर शर कम होना सम्भव है ।
क्षित्यां तदापि त्रिकलेषु मर्त्यां क्रान्ति प्रभेदात् विषुवायनेषु
दृक् सिद्धभावात्तरणेर्न हि स्यात् ग्रह प्रभाकाल विलग्न सिद्धिः । ९८ ।
यदि तुम्हारे मत के अनुसार पृथ्वी का विक्षेप तीन कला माना जाय तो विषुव
और आयन स्थिति में भेद के कारण सूर्य दृक् सिद्ध नहीं होगा । फलतः ग्रहण,
छाया, समय और लग्न आदि नहीं सिद्ध हो पायेगा ।
अतः शराभावत एव साक्षान्निश्चीयते निश्चलता चलायाः
यद् गोलयोः सायन भाग यानो र्न क्रान्ति भेदोऽ पतनर्भुजैक्य । ९९ ।
पृथ्वी का शर नहीं मानने यह सब सिद्ध हो जायेगा । अतः पृथ्वी को स्थिर
मानना ही सिद्धान्त है । दोनों गोलों में सायन सूर्य का भुज समान होने पर जरा
भी क्रान्ति भेद नहीं होता । इससे भी पृथ्वी स्थिर मालूम होती है ।
यथा रवे नास्ति शरो मंते ते तथा भुवो सम्मत एव मात्थ
चेत् खेट कक्षादर पार्श्व केन्द्र स्थिते महत्वा दति भास्वर त्वात् । १०० ।
पृथ्वी की गति मानने से उसका शर मानना पड़ता है । जिससे यह गड़बड़ी
हो रही है । जिस प्रकार तुम्हारे मत से सूर्य का शर नहीं है । उसी प्रकार हमारे
२७६ सिद्धान्त दर्पण
मत से पृथ्वी का शर नहीं है । सूर्य बिम्ब भी मध्यम सूर्य से अलग रहता है,
इस कारण तुम सूर्य का शर क्यों नहीं मानते हो ?
भानोग्रहेभ्यो बहु भेद लाभात् प्रत्यक्षतेऽमानि मयेह भाव ।
बुधा दि साधर्म्यजषः पृथिव्याः सचेन्निसर्गादचलैव सा स्ताम् । १०१ ।
तुम्हारा मत है कि सूर्य के बाकी ग्रहों के समान पृथ्वी भी है, केवल एक
अन्तर है कि और ग्रहों की तरह पृथ्वी का शर नहीं है । इसी तर्क से मेरा मानना
है कि बाकी सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, पर पृथ्वी स्थिर है । स्वभाव
से ही पृथ्वी अचल है, इसमें आपको आपत्ति क्यों ?
भू धर्मिणो भौम मुखा यदि स्युः सर्वर्तुमन्तस्तदिमान् किमन्तः
स्ववारि वाष्पोद् भव मेघ संघा नाच्छादयन्त्यर्क मया शशीव । १०२ ।
यदि मंगल आदि ग्रहों का गुण पृथ्वी के समान ही है और इनमें भी पृथ्वी
की तरह ६ ऋतुएं हैं तो अमावस्या में जिस प्रकार चन्द्र सूर्य को ढंक लेता है और
उसी प्रकार उन ग्रहों के पिण्ड से निकले वाष्प के मेघ पृथ्वी और ग्रह के बीच
आवरण का कार्य करते । वह क्यों नहीं होता ?
मृण्मयसौ भूर्महती ग्रहास्ते तोयात्मकाः क्षुद्र निजप्रमाणाः
विरुद्ध धर्मावत एव पृथ्वी तारा ग्रहों स्तास्तु चलौ क्रमात् स्तः । १०३ ।
बुध शुक्र का बिम्ब जलीय है, पृथ्वी का बिम्ब मिट्टी का और उन से बड़ा
है । इससे स्पष्ट है कि ग्रह समान धर्मी नहीं है । अतः पृथ्वी को स्थिर और बुध
आदि को चल मानने में कोई असंगति नहीं है ।
भास्वत् करोत्तप्त मृदन्ति कस्सा दुद् गत्य वाष्पाणि जलाद् घनाः स्युः
न केवलात्तोयमय ग्रहेषु तत्सम्भवो वस्तुत एव नास्ते । १०४ ।
मिट्टी के निकट का जल सूर्य की गर्मी से वाष्प बन जाता है । जिससे मेघ
होता है । अन्य ग्रहों का केवल जलीय बिम्ब होने से उन परं वाष्प नहीं बनता
अतः मेघ नहीं दीखता । (यह सभी बातें पूर्णतः गलत हैं)
यष्ट्य ग्र युग्म प्रथिताल्प भूरि मृत्पिण्डयो र्यंत्रधृतौ तुलास्यात्
तद् भार केन्द्राख्य मदोर्यतेऽस्यां स्थान भ्रमेतद् ग्रहणात् वृत्ते । १०५ ।
एक डण्डे के दो छोरों पर क्रमशः बड़ा और छोटा पिण्ड लटकाने से जिस
स्थान पर डण्डा पकड़ने से डण्डा समतल रहता है, उस स्थान को भार केन्द्र
कहते हैं । उस भार केन्द्र को सूत्र से लटका कर घुमाने से
क्षुद्रस्य पिण्डस्य वृहत्प्रमाणं स्यान्मण्डलं भ्रान्ति भवं गुरोस्तु
अल्पायतं तद्धरणी तरण्यो रस्यां क्रियायां परिकल्पितायां । १०६ ।
छोटा पिण्ड बड़े वृत्त में तथा बड़ा पिण्ड छोटे वृत्त में भ्रमण करेगा । पृथ्वी
भूगोलस्थिति वर्णनम् २७७
और सूर्य को इसी प्रकार छोटा और बड़ा पिण्ड मान कर
तद् भार केन्द्र रवि बिम्ब मध्ये पतत्यतः तिष्ठतितत् ख मध्ये
क्ष्मा दूरगा भ्राम्यति युक्ति रेशा तवास्ति चेत्सापि भवेत् सदोषा । १०७ ।
दोनों का भारकेन्द्र सूर्य बिम्ब में पड़ता है । अतः सूर्य बिम्ब को आकाश
मध्य में और स्थिर माना गया है । इस प्रकार दूर पर स्थित पृथ्वी विशाल वृत्त
में रह कर भ्रमण कर रही है । यदि सूर्य के स्थिर और पृथ्वी के चल होने का
यही कारण आप बताते हैं तो इसमें भी दोष है ।
यत् तन्मते घनफलेन (५,१२,३४,२०,०,४,६७,७०७)
गुरो (४६,०८२) विभक्ताद् भास्वद् घनात्
(४५,९२,६४,६२,९१,३३,५३,८८२) फलमभूद्रसगोऽष्ट
(८९६) संख्य सैकैत (८९७) दाप्त मुभयान्तर वर्त्म
(२४,५०,००,०००) लब्धं क्रोशात्मकं धृतिनखाचल बाहु संख्यम् । १०८ ।
सूर्य भार उसके आकार के घनफल के अनुपात में है उसे वृहस्पति के भार
वृहस्पति व्यास के घनफल ) से भाग देने पर
४५,९२,६४,६२,९१,३३,५३,८८२
────────────────────────── = ८९६ + शेष
५१,२३,४२,००,४६७,७०७
आता है । लब्धि में एक जोड़ने पर ८९७ आता है । इससे सूर्य और गुरु की
दूरी को भाग में देने पर
२४,५०,००,०००
────────────── = २,७,२०,१८ कोस आता है ।
८९७
यन्मध्यतो रवि तनोरियतान्तरेण
स्याद् भारकेन्द्र मधिकं रविमण्डलाद्धत्
सार्द्धेन्दु भूप भुज दृग भुज (२,२२,१६१) सम्मितात्तद्
बाह्ये पतत्यत इनस्य कथं स्थिरत्वम् । १०९ ।
अतः सूर्य केन्द्र से २,७२,०१८ कोस दूरी पर भार केन्द्र होना चाहिये । रवि
व्यासाद्धं २,२२,१६१ x १/२ है, जो भार केन्द्र की दूरी के आधे से कुछ कम है ।
अतः भार केन्द्र किसी प्रकार सूर्य बिम्ब में नहीं आता है । अतः सूर्य की स्थिरता
के लिये आपने जो कारण दिया है वह ठीक नहीं है ।
अत्रापि सूर्या भिमुखत्व सिद्धिः सर्वग्रहाणां समकालता च
कक्षाभ्रमे सम्भवतीत्य सिद्धा तत्कल्पना नल्प मतेकृता किम् । ११० ।
यहां भी सूर्य केन्द्र की तरफ सभी ग्रहों का कक्षा भ्रमण से भगण काल समता
सिद्ध होता है । फिर आप इतने बुद्धि मान होकर भार केन्द्र की कल्पना क्यों करते
हैं, जो सूर्य बिम्ब में अलग है ।
२७८ सिद्धान्त दर्पण
न वास्तवो तद् घटना ग्रहेषु भवेद् गुरुत्वं यद मीषु नास्ते
केन्द्राभिकृष्टे गुरुतैव वस्तु न्युक्तं प्रसंगात्पठतां हिताय । १११ ।
ग्रहों का भार नापा नहीं जा सकता अतः उनके भार केन्द्र की व्याख्या निरर्थक
है । छात्रों और शिक्षकों के हित के लिए भार केन्द्र के प्रसंग में इसकी चर्चा की
गयी ।
भ्राम्यद्धरा पृष्ठग तुंग वेष्म शृंगस्य रेखा प्रभिमण्डलोत्था
महत्यतस्तत् पत दश्म खण्ड भू संगतिः स्यात् परत श्व किञ्चित् । ११२ ।
पृथ्वी घूमने के कारण उसकी सतह पर ऊंचे घर या पर्वत के शिखर बड़े
वृत्त में घूमते हैं । अतः उनकी गति (सतह की गति से अधिक होती है । यदि
उसके शिखर से पत्थर गिराया जाय तो वह अपने ठीक नीचे के बिन्दु से कुछ
पूर्व की तरफ गिरेगा । (पृथ्वी की गति पूर्व दिशा में है ) ।
भू भ्रान्त्य भावे पतनं महीत्थं स्यादित्यवादी यदिदन्मयुक्तम् ।
भूवायु रत्नावह नामधेयं प्रत्यग् दिशो वाति सदैव धीरः । ११३ ।
पृथ्वी नहीं घूमने से ऐसा नहीं होता यह आपका निष्कर्ष है । मेरे मत से
इसका कारण है कि आवह नामक भूवायु सदा धीर भाव से पश्चिम से पूर्व की
तरफ गति करती है ।
तत्प्रेर्यमाणा स्तृणराजवृक्षा प्रायेण पूर्वांतत भाव लक्ष्याः
पुनर्मही मध्यग रेखाकायाः प्रायोनतः प्राग् गतभूमिभागः । ११४ ।
इस वायु से प्रभावित होकर घास वृक्ष आदि प्रायः पूर्व को ओर भी थोड़ा
पूर्व की तरफ झुक जाने के कारण पत्थर थोड़ा पूर्व की तरफ गिरता है ।
अतः क्वचित् प्राचि पतेत्कदाचि दशादिकं नत्ववनि भ्रमेण
समे स्थले सावरणेतु सर्व स्याधो गति स्यादृजु रेखयैव । ११५ ।
अतः इसकी व्याख्या के लिये पृथ्वी का भ्रमण मानने की जरूरत नहीं है ।
समान स्थल में और ऊपर में आवरण रहने पर जिससे हवा का प्रवेश नहीं हो,
सभी द्रव्य ठीक नीचे की तरफ ही गिरते दिखायी देते हैं ।
यावद्दूरे यस्य यस्य ग्रहस्य ब्रध्ना मध्य स्थान मास्ते तथैव
कालेनस्याद् यावता यस्य पूर्णो भास्वद् बिम्बाभि प्रमः पर्ययाख्यः । ११६ ।
सूर्य बिम्ब केन्द्र से ग्रह केन्द्र तक दूरी को ग्रह की दूरी कहते हैं । तथा ग्रह
को सूर्य का एक चक्कर लगाने में जितना समय लगता है उसे भगण काल कहते
हैं ।
तत्खेटाक्रान्तः स्फुरद् योजनानां ये स्युर्धात द्वन्द्वजाता घनांकाः
तत्तत्कालस्यापि वर्गाङ्का ये वर्गास्याद् यो घनेनानुपातः । ११७ ।
भूगोलस्थिति वर्णनम् २७९
सूर्य से ग्रह की दूरी का घन तथा ग्रह के भगण काल के वर्ग का अनुपात
अन्योऽन्यं सर्वखेटस्यतुल्यं सोऽयं यद्
वद् भूः शरांकाग्नि (३६५) घस्त्रैः
सप्ताष्टाङ्गैः (६८७) मंगलोऽभि भ्रमेत् तद्
वर्गाद्वन्द्वस्याभवद्योऽनुपातः (३।३१) । ११८ ।
सभी ग्रहों के लिये समान होता है । पृथ्वी के भगणकाल (३६५ दिन) तथा
मंगल के भगण काल (६८७ दिन ) के वर्ग का अनुपात ।
(मंगल भगण)² ६८७²
───────────── = ───── = ३/३१ = ३.५१९
(पृथ्वी भगण)² ३६५²
सोऽयं लक्षक्षुण्ण पञ्चाद्रि वेद (४,७५,००,०००)
क्रोश क्षौणी पद्धते र्मध्यमायाः
खाप्र व्योमाकाश तत्वाक्षिशैल (७,२२,५०,०००)
क्रोश क्षौणीपुत्र मार्गस्यचापि । ११९ ।
सूर्य से पृथ्वी की दूरी (४,७५,००,०००) कोस तथा मंगल की दूरी
(७,२२,५०,०००) कोस है ।
सम्बन्धः (३।३१) स्याकेन्द्र सूर्यदे घनाङ्क द्वन्द्व स्वेत्थं तथ्यवद्य त्वामात्थ
व्यर्थो कर्तुं कम्पते तन्मनीषा दोषा भासादुच्यतेकोऽ पि भाषा । १२० ।
(मंगल दूरी)³ (७,२२,५०,०००)³
─────────── = ──────────────── = ३.५१९ = ३/३१
(पृथ्वी दूरी)³ (४,७५,००,०००)³
भगण के वर्गों इस प्रकार भगण काल के वर्ग का अनुपात तथा दूरी के घन
का अनुपात पृथ्वी और मंगल के लिये समान है । इस नियम की सत्यता के
आधार पर यदि आप पृथ्वी का भ्रमण होना प्रमाणित करते हैं तो मेरी बुद्धि
विचलित हो जाती है । और बहुत सी बातें कहनी पडेंगी ।
न कार्य मुन्मीलति कारणादृते रवि भ्रमादेव खगाभ्रमन्तिते
अतोऽनुपातः किल काल मार्ग योग्रहैः समं कर्तुमिनस्ययुज्यते । १२१ ।
बिना कारण के कार्य नहीं होता । यदि सूर्य के अपने अक्ष पर भ्रमण के
कारण उसके चारों तरफ पृथ्वी आदि ग्रह घूमते हैं । तभी ग्रहों की दूरी तथा काल
का आनुपातिक सम्बन्ध करना उचित है ।
यदोबिम्बाति समीपगो ग्रहः प्रकल्प्यते कश्चिदसौ ध्रुवो ऽ भवत् ।
सयन्त्र दृक् सिद्ध ख रांशु मण्डल भ्रमक्रमात्तत्व (२५)
दिनै भ्रमेद् ध्रुवम् । १२२ ।
यदि यह अनुपातिक सम्बन्ध ठीक है तो सूर्य के अति निकट (पृथ्वी के
निकट मेष के समान) यदि कोई ग्रह हो तो उसका सूर्य के चारों ओर का भगण
काल २५ दिनों होना चाहिये । क्योंकि यन्त्र द्वारा दृक् सिद्ध सूर्य का अपने अक्ष
२८० सिद्धांत दर्पण
पर भ्रमण (या उसकी सतह के बिन्दु का भगण) काल २५ दिन हैं ।
तदन्तरं भास्कर मध्य केन्द्रस्तदीय बिम्बार्द्धमितं भवेद् यतः ।
ततोऽत्र केन्द्रं सवितेति कल्पितं स्वगोल पृष्ठं ग्रहकक्षित्येपि । १२३ ।
अतः ऐसे ग्रह की मध्यविन्दु की सूर्य से दूरी सूर्य के बिम्बार्द्ध (व्यासार्द्ध)
के बराबर होगी क्योंकि वह सूर्य पृष्ठ से सटा हुआ है ।
तदन्तरालस्य (२,२२,१६१।३०) घनाङ्क
(१०९६४९४३४७२९९०७८३ ।२२।३०।
भाजतात् बुधादि मार्गस्य घनाङ्कतः फलम्
यदेव तेन ज्ञसितादि कालज् कृति र्हता तत्फलतः पदंहि यत् । १२४ ।
इस दूरी (सूर्य का व्यासार्द्ध = २,२२,१६१।३०) कोस का घन
(१०,९६,४९,४३,४७,२९९०,७८३।२२।३०। का बुध कोस के घन से भाग देकर
बुध के भगण काल ८८ दिन से गुणा करने पर मात्र ६ । ५२ दण्ड आता है ।
भवेदखेः स्वभ्रमकालएव तत् सपक्ष नाराच फलाङ्क नाड़िकम् (६।२२)
तदेक घस्रे नव वार वेष्टनं विपाद यं दृष्ट विरुद्धमापतेत् । १२५ ।
यह मान (६।५२) दण्ड ही सूर्य का अपने अक्ष पर भ्रमण काल होना चाहिये ।
इसका अर्थ कि सूर्य एक दिन में अपने अक्ष पर ९ चक्र से एक पाद कम पूरा
करना चाहिये जो कि यन्त्र दृष्ट मान (२५ दिन में एक भगण) के विरुद्ध है ।
अथेषुपक्षा (२५) भ्रमणस्यवासराः समक्ष भावाद् यदि ते मताः स्थिराः
तदान्यखेट भ्रमिकाल वर्गंतो रवि भ्रमो वासर वर्ग भाजितात् । १२६ ।
पुनः यदि सूर्य का अपने अक्ष पर भ्रमण काल २५ दिन माना जाय तो मंगल
आदि ग्रह के भगण काल (६८७ दिन) वर्ग को रवि भगण काल (अपने अक्ष पर)
(२५ दिन) के वर्ग से भाग देकर
फलेन खेटान्तर दूरता घने हृते फलात् यद् घन मूल मागतम्
तदर्क बिम्बार्द्धयतोऽर्क विस्तृति, तत् स्पष्ट मानात् रस वहि गुणितः ।१२७।
फल से मंगल की दूरी के घन में भाग देने हैं तथा फल का घन मूल निकालते
हैं । इससे सूर्य के बिम्बार्द्ध का जो मान आता है । वह वास्तविक मान का ३६
गुणा है ।
स्वमान सिद्धौ भ्रमं विरुद्धयते भ्रमस्य सिद्धौ च विरुद्ध यते मितिः ।
स्वकारणः स्योभय मेत्यसिद्धतः किमन्यकार्यं प्रमाणानुपातः । १२८ ।
इस प्रकार यदि सूर्य बिम्ब का मान ठीक मानते हैं । भगण दूरी सम्बन्ध के
कारण उसका भगण काल गलत आता है और भगण काल ठीक मानने पर बिम्ब
मान गलता आता है । इस प्रकार सूर्य का अपना ही भ्रमण काल और बिम्बमान
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८१
ये दोनों अनुपात के विरुद्ध हैं फिर उसके कारण मंगल आदि ग्रहों का भ्रम उस
नियम से कैसे होगा ?
मध्यरविं पर्ययतां ग्रहाणां क्षमतः क्रमादन्तिक दूर वृत्तो
चक्रार्द्ध चक्रे चल केन्द्र भक्ते ते मन्द केन्द्रे रवितस्तथैव । १२९ ।
अपनी अपनी कक्षा में मध्यम सूर्य का परि भ्रमण करते हुए मंगल आदि ग्रहों
का निकट में चक्रार्द्ध में तथा दूर रहने पर चक्र पूर्ण होने पर शीघ्र केन्द्र होता है।
भूगर्भ. से जो रेखा तुलादि तथा मेष आदि में प्रति वृत्त को काटती है। वही दो
स्थान तुला आदि तथा मेष आदि का शीघ्र केन्द्र होता है।
स्वीयैरेक विधग्रहैः सदापरिधिभि भौमादिकानां फलं
शैघ्रं मन्दभवं सुसिद्ध मवनौ दृक् तुल्यतां यादि चेत्
तन्नो भानुमतां सह ग्रहगणाः पर्येतु सर्वं सहां
भू सूर्य द्वय दिग् विशेष वसते द्राक् केन्द्र त निश्चयात् । १३० ।
ठीक उसी प्रकार मध्यम सूर्य से मन्द प्रति वृत्त के सबसे निकट तथा सबसे
दूर स्थित तुलादि तथा मेषादि में मन्द केन्द्र होता है। मंगल आदि ग्रहों का शीघ्र
और मन्दफल एक प्रकार का होता है। पृथ्वी सूर्य से उल्टी दिशा में (पृथ्वी से
सूर्य की दिशा का उल्टा) होने से और उसी से शीघ्र केन्द्र स्थिर होने के कारण
यही मानना सुविधा जनक है कि सूर्य ग्रहों के साथ पृथ्वी की प्रदक्षिणा करे।
ओजार्ध्यन्त जुषः कुजस्य परिधि स्त्र्यंशाधिको दृश्यते
सूर्याद् भूदिशि तत्परोच्चत इदं मन्दः समाकृष्यते ।
तेनाकर्षित बिम्बतो मृदुफलं कौजं स्फुटं दृक् समं
शीघ्रोत्थेन फलेन किञ्चिदधिकं यन्मन्द केन्द्राच्च तत् । १३१ ।
विषम पादान्त में मंगल की मन्द परिधि तीन अंश अधिक होती है। यह
मन्द परिधि (मन्दोच्च) सूर्य से पृथ्वी की दिशा में स्थित परोच्च द्वारा आकृष्ट होता
है। अतः परोच्च तथा उससे आकृष्ट मन्दोच्च से आकृष्ट मंगल बिम्ब का जो दृक्
सिद्ध मन्दफल होता है, वह शीघ्रफल से थोड़ा अधिक होता है। मंगल के मन्द
केन्द्र के कारण ऐसा होता है।
ग्लौजन्मन श्लफलोपच यात् फलस्य
मान्द्यस्य चापतय निश्चयतः चलस्य
मन्दोत्थ केन्द्र वशतो बहुताल्पतायत्
तत्सर्वमर्क कु युगान्न तु केवलार्कात् । १३२ ।
बुध का शीघ्र फल में वृद्धि तथा मन्दफल का ह्रास और मन्द केन्द्र के कारण
शीघ्र फल बढ़ना और घटना आदि केवल सूर्य के कारण नहीं होता। (सूर्य और
बुध का मन्द केन्द्र दोनों कारण हैं।)
२८२ सिद्धान्त दर्पण
इति क्षितिज सौम्ययोः क्षिति रवि द्वयानुग्रमे
स्फुटेऽल्प फल भेदतोः भवति हि ध्रुवोऽन्यग्रमः
तथा रवि रतः परिभ्रमति सर्वत् इक्षु क्षिते
र्दधत् खेचर कक्षिकान घटतेऽन्यथा दृक् फलम् । १३३ ।
मंगल और बुध इस प्रकार रवि और पृथ्वी दोनों की परिक्रमा करते हैं । तथा
मन्द और शीघ्र दोनों दीखने के कारण यह सिद्ध है कि इन ग्रहों के अतिरिक्त
पृथ्वी और सूर्य में से कोई एक अवश्य घूमता है । यदि रवि को स्थिर माना
जाय तो इन ग्रहों का दृक् सिद्ध मान नहीं आ सकता है । अतः यह तय है कि
इन ग्रहों की कक्षाओं को साथ ले (ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं) सूर्य पृथ्वी के
चारों तरफ घूमता है ।
अति दूरग मृक्षमण्डलं तदवस्थाः खलु तारकाः स्थिराः
असमर्द्दन भस्य वस्थिता रवयश्चेति बुधैः सुनिश्चिताः । १३४ ।
पण्डितों (पाश्चात्य) का मत है कि तारा गण अत्यन्त दूर रहने के कारण उनकी
स्थिति स्थिर मालूम होती है । लेकिन सूर्य ग्रहण (सूर्य तथा सूर्य के समान अन्य
तारा गण) आकाश में अलग अलग धरातल में हैं ।
स्वगणैः परिवारितास्तः तलगन्यासम् दिनात्तदन्तरम्
क्षिति भास्कर मध्य मार्गतः ख ख खा भ्राष्ट (८,।००)गुणाधिकं भवेत् ।१३५ ।
अन्य सूर्य भी अपने परिवार (ग्रहों) के साथ हैं । सूर्य से सबसे निकट का
जो तारा (सूर्य के ही समान) है उसकी सूर्य से दूरी, पृथ्वी से सूर्य की दूरी का
(८,०००) गुणा है ।
रवितोऽपि वृहत्तनुधरा कथमेता मनुरुपिणी ध्रुवम्
उड़वः परियान्तु तत् क्ष्मा भ्रमतः तद् गति रीक्ष्यते जनैः । १३६ ।
कितने तारा सूर्य से भी बड़े हैं । वह सभी छोटे आकार की पृथ्वी का कैसे
परि भ्रमण कर सकते हैं ? अतः पृथ्वी के भ्रमण के कारण ही तारों की गति दीख
पड़ती है ।
इति चेच्छृणु मन्मते तु तास्तलग दस्त्रमुखाः कुमध्यतः
खरखाग्नि गुणार्क मध्यम श्रुति तुल्ये पथि यान्ति नित्यशः । १३७ ।
यदि इस प्रकार तर्क स्वीकार किया जाय तो मेरे मत के अनुसार मध्यम सूर्य
की दूरी से ३६० गुणा दूरी पर नक्षत्र मण्डल पृथ्वी की परिक्रमा प्रति दिन करते
हैं । (पृथ्वी से नक्षत्र मण्डल की दूरी = ३६० x रवि मध्यम कक्षा = ३६० x
७६,०८,२९४ = ६८,४७,४६,४६० योजन दूर )
यद् युग्मौंज पदान्त शीघ्र परिषे र्भागान्तरं दृश्यते
साक्षात् शीघ्र फले ततोऽस्मदुदिता सिद्धा भ चक्र श्रुतिः
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८३
भूमेः कर्कट वद् गमात्व दुदिता सा प्राङ् मुखी चेत् भ्रम-
त्यत्रापि प्रभवत्य संगति रतः क्रान्त्यन्तयो स्तर्कतः । १३८ ।
शीघ्रफल निकालते समय सम और विषय पादान्त में शीघ्र परिधि का अन्तर
१ अंश दीखता है अतः मेरे मत के अनुसार दिया गया शीघ्र कर्ण ही ठीक है ।
केंकडे की तरह पृथ्वि की पूर्व दिशा में गति तर्क संगत नहीं है यह अन्त में क्रान्ति
की आलोचना से स्पष्ट होगा ।
भू बिम्बे धनुरन्तगे यदुद यद् यन्नर्क्षमा लक्ष्यते
तस्मात् सप्त चतुर्भवान्तर गते युग्मान्त गे ऽ स्मिन्निदम्
दृश्यताष्टकलान्तरे यमदिशि स्थानादि तत् स्थूल्यता
लोकादप्यवनिः स्थिरेति मयका निश्चीयते सर्वतः । १३९ ।
पृथ्वी सायन मकर आरम्भ में (धनु के अन्त में) रहने के समय एक नक्षत्र
उदय होकर भचक्र (नक्षत्र मण्डल) में जिस स्थान पर दीखता है पृथ्वी वहां से
४७° अंश क्रान्ति अन्तर पर मिथुन अन्त (या कर्क आंरम्भ) में रहने पर अपने पहले
उदय स्थान से ८' कला (४७° / ३६०°) दक्षिण की तरफ ही दीखना चाहिये ।
यह व्यवधान विल्कुल नहीं दीखने के कारण मैं पृथ्वी को ही स्थिर मानता हूँ ।
भानां चक्रं चलन रहितं चेत्तदा किं चलांशा
साक्षाद् मच्छ त्य नुभव मुदग् दक्षिण क्रान्त्य सा म्यात् ।
त्वं चेद् वृषे तदपि चलनं क्रान्ति वृत्तस्य सिद्धं
न त्वं ऋक्षाणां मिति शृणु तदा तस्य सिद्धान्त मस्मम् । १४० ।
भचक्र स्थिर है और चलता नहीं यह बात भी आप नहीं कह सकते हैं ।
इसका कारण अयन गति या अयनांश है । उत्तर और दक्षिण क्रान्ति में असमानता
के कारण भचक्र का चलना स्पष्ट दीखता है । इसकी व्याख्या यदि करेंगे कि यह
क्रान्ति वृत्त के चलन के कारण है । और उसके कारण नक्षत्रमण्डल का चलन
दीखता है । तो मेरा समाधान सुनिये ।
पूर्वाचार्यैर्ध्रुव शरलवा दृष्टिसिद्धा य उक्ता
स्तत्तत्साम्यत्वपचलनाद्व स्थिरत्वेन सिध्येत् ।
प्राकालोक्ता, य इह विशिखाः सम्प्रतीक्ष्यन्त एते
तस्माच्चक्रं प्रचल दभितो भाति संक्रान्ति वृत्तम् । १४१ ।
पूर्वाचार्यों ने दृक् सिद्ध कर नक्षत्रों का ध्रुवांश और शरांश जितना कहा था
अभी भी वह उतना ही है । क्रान्ति वृत्त का चलन और नक्षत्रों की स्थिरता मानने
से ऐसा नहीं होगा । अतः क्रान्ति सहित नक्षत्र समूह हम लोगों के सामने चलता
हुआ दीखता है ।
इत्थं भाना मयन चलने निश्चिते सिद्धमेव
प्रत्यग् यानं प्रतिदिन मतो निश्चलैषा धरित्री
२८४ सिद्धान्त दर्पण ·
दिव्य ज्योतिर्यदिभव लयेत्सूर्यवद् द्योतमानम्
तत् किं ध्वान्ति निशि न विलयं यात्य संरूयाहु सत्वे । १४२ ।
नक्षत्रों का अयन चलन, उनकी पूर्व से पश्चिम की दैनिक गति से प्रतीत होता
है, कि पृथ्वी स्थिर है । भूगोल (आकाश) में यदि सूर्य के समान अन्य दिव्य
ज्योति होते तो रात्रि का अन्धकार निश्चय नष्ट हो जाता (रात्रि' में अन्धकार होने से
प्रतीत होता है कि तारागण सूर्य के समान प्रकाश मान नहीं हैं ।)
यन्त्रे यस्मिन् शत गुण वृहद् दृश्यते बिम्बमारात्
तस्मिन् दृष्टाद वसु (८) कलामिते लुब्धकां तैक्ष्म्यमाजः
दुष्टदृष्टि प्रति हति रपि स्यादिव सां घ्रिमानाद्
भानो र्यन्त्रान्तर गततनो र्यद्वयोः साम्य लाभः । १४३ ।
जिस दूरवीक्षण यन्त्र से १०० गुणा बड़ा बिम्ब दीखता है उससे लुब्धक तारा
सूर्य से मात्र ८ कला दूर रहने पर भी दीखता है । सूर्य का बिम्बमान तो दोनों की
दृष्टि समान दिशा से होने के कारण अत्यन्त भयंकर तेज उत्पन्न होगा । ( अतः
हमारे सूर्य के समान आकाश में असंख्य सूर्य नहीं हैं )
दूराधिक्याद् यदि हिमरजो वाष्प संघात जाता
तादृग् ज्योतिः क्षति रिति मतिर्भाति भानां तते स्ते
तत्खेटीनां विविध सरणीभ्राजतां बिम्ब तुल्यां-
स्ताराराः किं तत्सम रुचि भृतो भ्रान्ति कृप्तं हिमाद्यम् । १४४ ।
इसके बाद यदि आपका तर्क है कि तारागण अत्यन्त दूर होने के कारण
उनका तेज हिमकणों और वाष्प आदि द्वार शोषित हो जाता है । अतः उनका
प्रकाश सूर्य की तरह तेज नहीं होता है । तो मेरा उत्तर है- नाना प्रकार की गति
करने वाले ग्रहों की तरह तारा गण कैसे उज्ज्वल हो सकते हैं । भ्रम के कारण
क्या तुषार आदि की कल्पना नहीं है ?
नेदीयस्त्वाद् यदि कुजमुखाः सुस्थिरालोकवन्त
स्ताररा दूराश्वल हिममुखैरावृताः कम्पवत्यः
दृश्यन्ते तत् क्वचिदपि घनै श्चादिताः सन्ति लुप्ताः
स्व ज्वालानां स्फुरण करणं सिद्धमग्ने रिवातः । १४५ ।
निकट में होने के कारण मंगल आदि ग्रहों का प्रकाश स्थिर है । किन्तु
तारागण दूर में हैं और हिम आदि से आवृत होने के कारण उनका प्रकाश कम्पन
करता है । (टिमटिमाता है) । आग की लपट की तरह इनका कम्पन होना
स्वाभाविक है । लेकिन आग की तरह घने तुषार आदि के कारण उनका भी
प्रकाश लुप्त हो सकता है । क्या ऐसा देखा गया है ?
व्यखेस्फीत श्रिपिट उभयो केन्द्रये भ्रान्त भूम्ना
गोलश्चित्ते स्फुरति तवचेदार्द्र मृत्पिण्ड तुल्यः ।
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८५
तद् येनाग्रं सद्गति मतस्तत् फलंकिं तथा भूत् ।
(येनानकदम्बु विशेष फलेन)
स्रष्टुः सृष्टि र्विसदृश गुणा किं मृषा भ्रान्ति कृतिः । १४६ ।
कच्चे मिट्टी के गोल पिण्ड को उसके व्यास के दो छोरों से पकड़कर घुमाने
से दोनों व्यासाग्र बिन्दु दब जाते हैं तथा उनके मध्यवर्ती स्थान फैल जाता हैं ।
इसी प्रकार पृथ्वी में भी मेरु स्थल चिपटा तथा उनके बीच विषुव वृत्त स्थल
फैला हुआ है । इससे पृथ्वी का अपने अक्ष (व्यास के चारों तरफ) घूमना सिद्ध
है । आपकी इस युक्ति का उत्तर है कि विधाता की सृष्टि में भी इसके समान कई
घटनायें हैं । इन दोनों फलों की समानता के कारण पृथ्वी के अक्ष भ्रमण की
कल्पना जरूरी नहीं है ।
भू भ्रान्त्यै भ चक्र पश्चिम गमे सिद्धे किमायास्तो
भ भ्रान्त्यै प्रवहाक्ष मारुत कृति र्विष्णोरिदं वक्ष चेत्
ईशः सर्षप पर्वतौ स्थिर चलौ कर्तुं समर्थो निजां
शक्ति व्यक्तु मिमां क्षमा मचलयत्यत्रास्ति किं दूषणम् । १४७ ।
पृथ्वी के पूर्व गति भ्रमण से नक्षत्र चक्र का पश्चिम की तरफ घूमना सिद्ध
है । यदि ऐसा था तो भगवान ने अत्यन्त परिश्रम से प्रवाह वायु द्वारा नक्षत्र मण्डल
की पश्चिम गति क्यों आरम्भ की ? इसका उत्तर है कि भगवान सरसों को स्थिर
और पर्वत को चलकर सकते हैं । अपना सामर्थ्य दिखाने के लिये उन्होंने पृथ्वी
को भी अचल कर दिया है ।
धर्माधर्म फलं प्रदान विषये नृणां त्रिलोकेशितु
र्निन्द्या दुर्घटना नतूपकरणैः खेलासु लीलाम्वुधेः
लोकस्य क्षणभंगुराल्प तनवे पाषाण रत्नादिभिः
प्राज्याया सकृतालये ष्षपि यतोदृष्टा प्रवृत्तिर्मुहुः । १४८ ।
लीलाप्रिय भगवान ने लोगों को धर्म-अधर्म का फल देने के लिए कई बार
निन्दनीय अघटनायें की हैं । लेकिन पार्थिव उपकरण में उनकी कोई निन्दनीय
घटना नहीं है । लोगों का शरीर क्षण भंगुर है लेकिन पाषाण, रत्न द्वारा अत्यन्त
परिश्रम से लोगों के निवास के लिये जो पृथ्वी बनी है, उसको भगवान स्थिर
ही रखेंगे । जिस प्रकार मनुष्य अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, भगवान भी पृथ्वी
को स्थिर रख नक्षत्रों को घुमाने में सदा प्रवृत्त है ।
अज्ञानान्मनुजास्तथा विदधतु ज्ञानी तु सर्वेश्वरो
युक्त्या क्रीड़तु मर्हतीति तव चेदुक्तिर्मया त्रोच्यते
द्राङ् मर्त्याश्वगजादि नश्वर तया स्रष्टुः किमास्ते फलं
तेभ्यः काक शृगाल कादि सुचिर स्थित्यास्थ कार्यञ्च किम् । १४९ ।
जिस प्रकार अज्ञानी लोग घर द्वार करने आदि की चेष्टा में रहते हैं, उस
२८६ सिद्धान्त दर्पण
प्रकार ज्ञानी नहीं करते । भगवान केवल न्याय के लिये क्रीड़ा करते हैं । यदि
तुम्हारी यह युक्ति है तो मेरा तर्क है कि उन्होंने मनुष्य, हाथी और घोड़ा को कम
आयु तथा कौवा, सियार आदि को अधिक आयु देकर कौन सा फल पाया अर्थात्
ये सब किसी उद्देश्य या परिणाम के लिये नहीं होते, भगवान् की इच्छा ही
एकमात्र कारण है ।
यास्ते धरेश बहिरंग तटस्थ शक्ति
युग्माद् वरा निखिल सद्गुण जीव सदम ।
सच्छक्ति रान्तर तनुः परमेश्वरस्यः
सांशैर्ग्रहैः परिभितास्ति किमत्र चित्रम् । १५० ।
भगवान् के अन्तरंग (तटस्थ) और बहिरंग दो प्रकार शक्तियों से निर्मित उनका
अभ्यन्तर शरीर पृथ्वी ही सर्व गुणी तथा सभी जीवों का स्थान है । अतः भगवान
के अंश रूप ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, इसमें विचित्र क्या है ?
दिनाब्द क्रान्त्युत्था त्रिविधि गतिरित्यादि रवने
रसिद्धा सिद्धान्त द्रुमफल निभाभि र्भणितिभिः ।
रसास्वादादासां भवतु भवतं तुष्ट मनसां
रसाभ्रान्तित् क्रान्ति क्षितिरितरमा रतगिराम् । १५१ ।
सिद्धान्त वृक्ष के फल की तरह अनेक युक्ति द्वारा पृथ्वी की दैनिक, वार्षिक
तथा क्रान्ति-तीन प्रकार की गति खण्डित (असिद्ध हुयी) । इन युक्तियों का
रसास्वादन करने से लोगों की धराभ्रम में से उत्पन्न भ्रान्ति दूर हो ।
तुल्यक्षोदय दर्शनाज् ज्ञ कुज मान्द्य द्राक् फल प्रेक्षणा
इन्द्रांक स्थिति दर्शनाद् गुरु लघु द्रव्य स्वभावे क्षणात्
आकृष्टस्य च कर्षकाभिमुखता सिद्धैः शरा दर्शना
दुष्णांशोरिति साधितां बहु विधै र्लिङ्गै स्थिरत्वं क्षितौ । १५२ ।
पृथ्वी की स्थिरता इन चीजों से स्थिर हुयी- (१) नक्षत्र गोल में एक ही
स्थान पर उसी नक्षत्र का बराबर उदय होगा, (२२) बुध और मंगल के मन्द तथा
शीघ्र फल में मन्दकेन्द्र के कारण ह्रास और वृद्धि, (३) पृथ्वी से चन्द्र कलंक
सदा एक समान ही दीखना, (४) गुरु लघु (हल्के भारी) पदार्थ का स्वभाव देखने
से (५) आकृष्ट वस्तु आकर्षण की दिशा में जाने से (६) सूर्य का शर नहीं रहने
से आदि ।
सिद्धान्तशेखरे - नभस्य यस्कान्त महामणीनं मध्यस्थितो लोहगुड़ी यथास्ते ।
आधारशून्योऽपि तथैव सर्वाधरोधरित्र्या ध्रुवएष गोलः । इति । १५३ ।
लोहा युक्त मणि के भीतर लोहा जिस प्रकार गोल रहता है उसी प्रकार बिना
किसी आधार के सभी का आश्रय स्थल यह पृथ्वी निश्चित रूप से गोल है ।
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८७
वाराहेऽपि-पञ्चमहाभूतमयस्तारागण पञ्जरे महीगोलः
खेऽयस्कान्तान्तः स्थो लोह इवा वस्थितोवृत्तः । इति । १५४ ।
जिस प्रार लौह युक्त मणि के भीतर लोहा रहता है इसी प्रकार तारा मण्डल
के भीतर पांच महाभूतों से बनी पृथ्वी भी है ।
तस्मात्तिष्ठति भूः प्रयाति सविता मूर्त्या स्वमध्याख्यया
विभ्रत् खेचर चक्र मक्रम गती वैतत् क्षिता वीक्ष्यते
मत्सिद्धान्त मिमं विविच्य सकलं सन्त प्रशंसन्तुवा
निन्दन्तु श्रम वेदिनां ह्युभयथा मंस्ये कृतार्थं कृतिम् । १५५ ।
मेरी इन सभी युक्तियों के कारण मत है कि पृथ्वी स्थिर है । सूर्य अपनी
मध्यम मूर्ति द्वारा (मध्यम सूर्य) अन्य ग्रहों को साथ लेकर पृथ्वी की परिक्रमा
करता है । ग्रह समूह का कोई क्रम गमन नहीं हैं । (सभी अपने अपने रास्ते से
जाते हैं ।) परिश्रम का मूल्य जानने वाले सज्जन मेरे सिद्धान्त पर विचार करें ।
मैं इसी से कृतार्थ हो जाऊंगा । मुझे अपने मत के प्रशंसा अथवा निन्दा से मतलब
नहीं है ।
हे धीरा गणकाः समस्त सहृदो बद्धाञ्जलि र्वच्यहम्
यामेऽस्मिन्नजनिष्ट धार्ष्ट्य पटुता तां मार्हु मिच्छास्तुवः
बालानां प्रतिपत्तये किल मया सम्वाद दम्भादियम्
भूमिष्ठा गदिता यथामति भवत्तोषात् सदोषा न के । १५६ ।
हे पण्डित गणक, आप सभी के बन्धु हैं । भू स्थितरता सिद्ध करने में मेरी
विशेष धृष्टता को क्षमा करें । भू भ्रम के बदले भू स्थिरता बच्चों को समझाने के
लिए मुझे जो दीखा वहीं मैने कहा है । जगत में कौन दोष मुक्त है ? (अर्थात्
मेरी इस युक्ति में भी दोष सम्भव है ) ।
आत्मोत्कर्षः पुरुषैः सर्वथेष्यो
दिवाकरे केनचिद् घष्यमाने
तस्यास्याङ्गेन्मर्कटा कार सिद्धि
दैवाधीनो नास्ति दोष स्तदेषः । १५७ ।
मनुष्य केवल अपना उत्कर्ष चाहता है। देवता बनाते बनाते वह मूर्ति यदि
बन्दर की हो गयी तो क्या करें ? इसे विधि का विधान ही मानना पड़ेगा, मनुष्य
का क्या दोष है ?
ब्रह्माण्ड कारणाब्धौ चलतु जल बलाद् वा महावात् वेगात्
किंवा स्वामम्बरस्थं तदुपरि परित स्तात् पुराणादि सिद्धम्
सप्ताब्धिद्वीप भूमृद् प्रभृति सुविततम् नास्ति तत्रास्मदुक्ति
र्व्यक्ति भूते तदण्डोदर गत धरणी नाद्य मुद्िश्य दृश्यम् । १५८ ।
३८८ सिद्धान्त दर्पण
ब्रह्माण्ड के मूल समुद्र में स्थित विश्व जल के कारण चलने लगा, वह कोई
महावात्या आदि के कारण विचलित न होकर आकाश में उसी प्रकार रहता है।
उसके चारों तरफ पुराण वर्णित सात समुद्र, द्वीप, पर्वत आदि फैले हुए हैं। यहां
मैने ब्रह्माण्ड की कथा नहीं कही। केवल उसके आधार गत पृथ्वी, सूर्य आदि
के विषय में ही कहा।
भूगोल भ्रान्ति वादी गतचिर समये न श्रुतोऽस्माद् युगांघ्रेः
साध्वीन्द्रांशे (१४४) व्यतीते सुविरल उदितः सौगतास्या- वटाद्यः
तस्याप्रत्युक्तिमार्याः प्रतनुविदधिरे युक्तिभि र्भास्कराद्याः
साम्प्रत्यस्य तनुत्वात् प्रचुरमकर वं वाच्यं तत् प्रशान्त्यै । १५९ ।
अतीत में पृथ्वी का चलना पहले कभी सुना नहीं गया। कलियुग के १४४
वें भाग (अर्थात् कलि ३००० संवत् में या ई.पू. १०२ में) बौद्धों के द्वारा भू चलन
की सामान्य रूप से चर्चा हुई। भास्कर आदि विशिष्ट पण्डितों ने उसका उत्तर
भी साधारण तौर पर दिया। अतः इस मत के निराकरण के लिये यहां बहुत
कहना पड़ा।
सूर्य स्थैर्योक्ति सूत्रैः क्षितिगति कृतिं व्याजराजत्व माप्तः
सिद्धान्त स्वर्णगोत्रः प्रकृति मुपगतो यत्कृपा स्पर्शनोत्थैः ।
अस्माद् जिहाग्रजाग्रज्जलनिधि वसनास्तेम सद् युक्ति वह्नि-
ज्वालै र्भूयोऽपि सोऽयं कलयतु कुशलं श्री नीलाचलेन्दुः । १६० ।
स्वर्ण से उत्पन्न (स्वर्णपदक या धन बल से) सूर्य की स्थिरता तथा उसके
सूत्र (आकर्षण) से पृथ्वी के चलने का सिद्धान्त बेकार ही श्रेष्ठ सिद्ध हो गया
है। जिसकी कृपा से मेरी जीभ से सागर से घिरी पृथ्वी की स्थिरता के बारे में
अनेक युक्ति निकली और अग्नि के समान प्रज्वलित युक्ति से पृथ्वी चलने का
स्वर्ण रूपी सिद्धान्त गल गया, वह नीलाचल वासी प्रभु जगन्नाथ हमारा कुशल
करें।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत-
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
क्ष्माप्रस्थिति र्व्यरचि सप्तदश प्रकाशः । १६१ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात् राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना एवं दर्शन में समानता तथा बाल बोध के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
आकाश में पृथ्वी की स्थिति से सम्बन्धित १७ वां प्रकाश समाप्त हुआ।