सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल विवरणम् ३०३
तथापि वृत्ततो भूमेर्मृद् भिस्तो यैर्न भिद्यते ।
मृदा पमाञ्च संस्थानान्याप्नुवन्ति सदा भिदाम् । ९७ ।
तथापि मिट्टी और पानी के इस परिवर्तन से पृथ्वी का गोलकार नहीं बदलता
है । सिर्फ मिट्टी और पानी का स्थान परिवर्तन होता है ।
लवणोदेन सम्पृक्ताः क्षीरोदाद्याक्वचित्क्वचित्
दघतिक्षीर दध्यादि न स्वरूपन्तु कात्स्न्यर्तः । ९८ ।
क्षीर और दधि मिला हुआ लवण समुद्र कहीं कहीं पर है । पुराणों में वर्णित
शुद्ध क्षीर या दधि समुद्र कहीं नहीं है ।
तत्प्राक् सिद्धान्त सम्प्रोक्त सृष्टिकाल कुसंस्थिते-
र्वर्तते वर्तमानक्ष्मा संस्थिते श्चान्तरं महत् । ९९ ।
अवश्य पहले के सिद्धान्त ग्रन्थों में वर्णित सृष्टिकाल तथा पृथ्वी की स्थिति
से अभी की पृथ्वी की स्थिति में बहुत अन्तर है ।
आदियामले-यस्य शृंगैक देशस्था देवास्त्रींशं त्रिकोटयः
समेरु पृथिवीमध्ये श्रूयते न च दृश्यते । इति । १०० ।
आदि यामल ग्रन्थ के अनुसार जिसके श्रृंग के एक स्थान पर ३३ कोटि
देवता रहते हैं । वही मेरु पर्वत पृथ्वी के मध्य भाग में है वह मेरु सिर्फ सुनने
में आता है किन्तु दीखता नहीं है ।
सूर्य सिद्धान्ते-अनेक रत्न निचयो जाम्बू नद मयो गिरिः
भूगोल मध्य गो मेरू रुभयत्र विनिर्गतः । १०१ ।
सूर्य सिद्धान्त के अनुसार -भूमि के मध्य भाग में दोनों दिशाओं में निकले
हुये दो मेरू हैं । यह सुवर्णमय तथा इनमें अनेक मणि माणिक्य हैं ।
उपरिष्टात् स्थितास्तस्य सेन्द्रा देवा महर्षयः
अधस्तादसुरास्त द्व वद्विषन्तोऽन्योऽन्य माश्रितः । १०२ ।
उनके ऊपर इन्द्र सहित देवता गण और महर्षि निवास करते हैं । नीचे स्थित
मेरु (कुमेरू) पर देवताओं के द्वेषी असुरों का आश्रय स्थान है ।
ततः समन्ता परिधि क्रमेणायं महार्णवः
मेखलेव स्थितो धात्रा देवासुर विभागकृत् । इति । १०३ ।
यह दोनों मेरु के चारों तरफ पृथ्वी की परिधि के रूप में महा समुद्र घेरे हुए
हैं और इसके द्वारा देव तथा असुरों का विभाग स्पष्ट दिखाई देता है (उद्धरण
समाप्त)
देवावासः सुमेर्वाख्यः कुमेरु रसुरश्रयः
तत्सामान्तरगा रेखा व्यक्षरूपा परिधिर्महान् । १०४ ।