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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२९४ सिद्धान्त दर्पण
देखना ही है) । जैसे देवदत्त ने ग्राम का भोग किया-इसका अर्थ यह नहीं है कि
वह गांव को खा गया । भोग का अर्थ अपने सुविधा के लिये व्यवहार ही है ।
कला शब्देन तद् वृद्धि क्षयाभ्यामनुलक्षितः
काल एवोच्यते नो चेत् पदे दर्शेऽखिल क्षति । ३५ ।
कला शब्द का प्रयोग चन्द्र के प्रकाश में कमी या बढ़ने के समय के बारे
में किया गया है । नहीं तो अमावास्या में सभी किरणों का क्षय हो जाता है ।
उस समय कला वृद्धि की बात क्यों होगी ?
भूयसाल्पस्य बोधः स्यादिति न्यायेन शीतगोः
शैत्य नास्तोष्णतानुष्णा शीतस्पर्शाऽन्यथे भवेत् । ३६ ।
बड़े वस्तु से छोटा छिप जाता है यह न्याय (तर्क संगत) है । इसी कारण
चन्द्र में शीतलता की प्रधानता होने कारण उसकी थोड़ी सी उष्णता का बोध नहीं
होता है । किन्तु चन्द्रमा में बिल्कुल ही उष्णता नहीं है, ऐसी बात नहीं है ।
उष्णता नहीं होने पर उसका शीत स्पर्श अन्य प्रकार का होगा । (और ठण्डा
होगा- बर्फ के समान)
जलप्राये विधोः पृष्ठे निष्ठा वृक्षादयो जनैः
कलंकत्वेन वर्ण्यन्ते नाना प्राचीन वाङ्मयैः । ३७ ।
चन्द्रबिम्ब जलमय है । उसमें वृक्ष पर्वत आदि हैं । उन्हीं का कलंक के रूप
में वर्णन हुआ है । इस प्रसंग में अनेक प्रकार की प्राचीन कथायें भी हैं ।
चन्द्रवन्मंगलाद्यास्ते प्रागुक्ता भानि तु स्वतः
तैजसानित्यहं वच्मि जगुरात्यानि के चन । ३८ ।
चन्द्र के समान मंगल आदि है तारा स्वतः तैजस (प्रकाशित हैं ) ऐसा मेरा
मत है । कोई कोई इन्हें जल बिम्ब भी कहते हैं । बहुत दिनों से ऐसा मतभेद है ।
आप्यत्वेतु भकक्षायां दृश्यतेऽर्कस्य विस्तृतिः
विकला पञ्चकं यस्मात् ततः तत् कर संक्रमात् । ३९ ।
नक्षत्र गोल में रवि का व्यास ५ विकला मात्र है । अतः तारा गण विशुद्ध
फल बिम्ब होते तो रवि की किरण द्वारा उनकी-
तादृगुज्ज्वलता वानां न सम्भवति तान्यथ
यद्यर्क समते जांसि तदान स्यात्त मोनिशि । ४० ।
इतनी अधिक उज्ज्वलता नहीं होती । दूसरी तरफ वह सूर्य के समान तैजस
होने पर रात्रि में इतना अन्धकार नहीं होता । अर्थात् तारागण न सूर्य के समान
तैजस् हैं न चन्द्र के समान जलमय ।