सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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इस ५० योजन शंकु को ५०२६ योजन की भूगोल परिधि के ऊपर स्थित
मानेंगे । पूर्व रीति के अनुसार इसके संस्कृत शंकु का मान २२५ कला होगा ।
द्विः स्थाद स्यादुत्क्रमज्या दृङ्नखा (२०२) स्तद्धनुः कलाः
दृङ् नागेशो (११८२) दृष्टि सीमा शरभै (२७५) योजनैर्मता । ६३ ।
दो स्थानों पर रखकर क्रिया करने पर इसकी उत्क्रमज्या २०२ होगी । इसकी
चापकला ११८२ ही दृष्टि सीमा का मान कला में हुआ दृष्टि सीमा का योजन
मान २७५ है (अर्थात् ५० योजन हिमालय से २७५ योजन तक की दूरी से दीख
सकता है) ।
द्रष्टृ शंक्वन्तर धरामानं चक्रकला हतम्
हृतं परिधिमानेन लब्धा भुजकला स्ततः । ६४ ।
द्रष्टा और दृश्य वस्तु (शंकु) के बीच की दूरी को चक्र कला (२१, ६००) से
गुणा भू परिधि (५०२६) से भाग देने पर भुज कला होगी ।
द्रष्टृ दृश्यान्तरे राशि त्रयोने दृष्टि सम्भवः ।
भुंज लिप्ता ज्यका वर्ग हीन त्रिज्याकृतेः पदम् । ६५ ।
इस भुजकला का परिमाण ३ राशि से कम होने पर द्रष्टा दृश्य वस्तु को देख
सकता है । भुजलिप्ता के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर उसका वर्गमूल
निकालने से
को टीज्या त्रिगुणा (३४३८) च्छोध्याशेषः स्यादुत्क्रमज्यका
अथ कोटिज्य याभ्यस्ता त्रिज्याप्तः संस्कृतो नरः । ६६ ।
कोटिज्या होगी । इस कोटिज्या को त्रिज्या (३४३८) से घटाने पर उत्क्रमज्या
होगी । इसके बाद संस्कृत शंकु को कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने
पर-
स्फुट शंकु स चेदल्प उत्क्रमज्या प्रमाणतः
तदा न दृश्यते भूयान् दृश्यते व्यवधान भित् । ६७ ।
स्फुट शंकु आता है । यह उत्क्रमज्या से कम होने पर नहीं दीखता है । यह
उत्क्रमज्या से जितना अधिक होता है उतना भाग अवरोध के ऊपर दीखता है ।
उत्क्रमज्योत्झितः स्पष्टा शंकुर्दृश्य ज्यका भवेत्,
सात्रिज्याघ्नान्तरक्ष्मात्थ भुजज्याप्तोन्नतज्यका । ६८ ।
स्फुट शंकु से उत्क्रमज्या घटाने पर दृश्य ज्या होती है । इस दृश्यज्या को
त्रिज्या से गुणा कर द्रष्टा और दृश्य के अन्तर की ज्या से भाग देने पर उन्नत ज्या
होती है ।