सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९२ सिद्धान्त दर्पण
ग्रह नक्षत्रताराणां भूमेर्विश्वस्य वा विभुः
देवासुर मनुष्याणां सिद्धानाञ्च यथा क्रमम् । २० ।
इन विभागों में क्रमशः ग्रह, नक्षत्र, तारागण, पृथ्वी, बिम्ब, ब्रह्माण्ड, देव,
असुर, मानव और सिद्ध उत्पन्न हुए ।
ब्रह्माण्ड मंत्रः सुषिरं यत्रेवं भू र्भुवादिकम्
कटाहद्वितयस्येव सम्पुटं गोलकाकृति । २१ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर खाली स्थान है जिसमें भू भुव, स्व आदि लोक है । दो
कड़ाहों को परस्पर किरानों से मिलाने पर जैसी गोल आकृति होती है, ब्रह्माण्ड
वैसा ही है ।
ब्रह्माण्ड मध्ये परिधि व्योमकक्षा भिधीयते ।
तन्मध्ये भ्रमणाद् भानां क्रमशोधः क्रमादधः । इति । २२ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर की परिधि को व्योम कक्षा कहते हैं । उसमें ऊपर से नीचे
की तरफ क्रमशः नक्षत्रों आदि का भ्रमण्ड होता है । (सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण
समाप्त) ।
नारदीये-इति सौररोक्त पद्यानां विंशत्या सूचितं क्रमः
अथैतदुक्त सूर्यादि स्वरूप प्रविविच्यते । २३ ।
सूर्य सिद्धान्त के इन २० पद्यों में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम दिखाया गया
है । अब उसमें कहे गये सूर्य आदि के स्वरूप का विशेष विचार किया जा रहा
है ।
चतुर्व्यूह प्रकारेण कृतिः सर्वत्र सर्वदा । इति ।
इति श्री नारदीयोक्तः प्रद्युम्नोऽत्रैव पद्मभू . २४ ।
हर जगह सदा चार स्तर से कार्य होता है- इस प्रकार श्री नारदीय पुराण में
कहा गया है । यहां प्रद्युम्न ही पद्मभू ब्रह्मा हैं । (उदाहरण सूर्य से ब्रह्मा, ब्रह्मा से
सूर्य । वासुदेव (सूर्य) से संकर्षण प्रद्युम्न, उससे अनिरुद्ध, अनिरुद्ध (विष्णु) से
ब्रह्मा ।
तत्कारणं महत्तत्त्व रूपीयः सूर्य उच्यते ।
ततोऽन्यः कथ्यते भूयः कार्यरूपी स्वयम्भुवः । २५ ।
ब्रह्मा का कारण महत्तत्व रूपी सूर्य है, ब्रह्म का कार्य रूपी एक और सूर्य
भी कहा जाता है ।
अतीत्वे रूप्यमर्कस्य ब्रह्माण्डान्तः प्रतीयते
तत्राद्यस्यात्म भूघस्र कर्तृत्वं सम्भवेत्यतः । २६ ।
अतः दो सूर्य हैं । प्रथम सूर्य आदि देव (ब्रह्मा ) की आत्मा भूमि का मालिक