सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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लवण समुद्र के भीतर दो महाद्वीप अलग अलग स्थित हैं । एकं ऊर्ध्व और
दूसरा निचे का महाद्वीप ।
अधःस्थस्योत्तरार्धेन सहोर्ध्वः कथितोबुधैः
जम्बूद्वीपा ख्ययाधः स्थ द्वीपस्यार्द्धन्तुदक्षिणम् । ४९ ।
नीचे स्थित महाद्वीप के उत्तरी अंश और ऊपरी महाद्वीप को विद्वानों ने जम्बू
द्वीप कहा है । नीचे वाले द्वीप का दक्षिणार्द्ध तथा
कथ्यते ह्यासुरो भूमि र्भागैः द्वादशभिर्युतम्
तत्रषट् सागरा द्वीपा हृद देशोपमाः स्थिताः । ५० ।
१/१२ वां भाग (उत्तरार्द्ध का) और मिलाकर असुर भूमि के नाम से विख्यात
है । इसमें हृद और जनपद के समान ६ समुद्र और द्वीप हैं ।
जम्बूद्वीप स्तु बहुधा विभक्तो वर्ष पर्वतैः
तत्तन्मानानि नोक्तानि ब्रह्म सूर्यांश भास्करैः । ५१ ।
जम्बू द्वीप भी पर्वतों द्वारा बहुत से वर्षों से विभक्त है । इनका मान ब्रह्म गुप्त,
सूर्यांश पुरुष या भास्कराचार्य किसी ने नहीं कहा है ।
यत्तु विस्तृत गोलादौ वर्णितं भूधरादिकम्
तत्तदृष्टि विरुद्धत्वात् नाम्नेव गदितं बुधैः । ५२ ।
विस्तार भाव से वर्णित भूगोल आदि में वर्णित पर्वतों का वर्णन वास्तविक
नहीं है (दृष्टि विरोध है) । अतः पण्डित लोग इनका केवल नाम से ही वर्णन
करते हैं ।
तत्तच्छास्त्रो दितो मेरु कृताष्टा (८४) योजनोच्छ्रितः
कलाकृति (२५६) मितो मूल ऊर्ध्वस्थल्यां न खाग्निभिः । (३२० ) । ५३ ।
सभी शास्त्रों ने मेरु पर्वत की ऊंचाई ८४ योजन कही है । मूल भाग में इसका
विस्तार २५६ योजन तथा पृथ्वी के ऊपर इसका विस्तार ३२० योजन है ।
वर्षाचला हिमाद्र्याद्याः पञ्चाशत् योजनोच्छ्रितः
तावत् प्रस्थाश्च तत्रायं क्रियते गणितं क्रमः । ५४ ।
हिमालय आदि वर्ष पर्वतों (देश विभाजन करने वाले सीमा स्थित) में प्रत्येक
की उच्चता ५० योजन मात्र हैं । इनका प्रस्थ मध्य ५० योजन है । अत इस विषय
में एक प्रकार का गणित समझाया जा रहा है ।
यस्माद् गोलस्य शैलादि शकुंनां दूर वर्ति नाम्
व्यवधा दृश्यता मानं दृष्टि सीमा च बोध्यते । ५५ ।
इस गणित द्वारा दूर की वस्तु ओं पर्वत, शंकु आदि की दूरी, दृश्य भाग तथा
दृष्टि सीमा (पृथ्वी की गोल सतह पर कितनी दूर देख सकते हैं । आदि ज्ञात हो