सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
२८० सिद्धांत दर्पण
पर भ्रमण (या उसकी सतह के बिन्दु का भगण) काल २५ दिन हैं ।
तदन्तरं भास्कर मध्य केन्द्रस्तदीय बिम्बार्द्धमितं भवेद् यतः ।
ततोऽत्र केन्द्रं सवितेति कल्पितं स्वगोल पृष्ठं ग्रहकक्षित्येपि । १२३ ।
अतः ऐसे ग्रह की मध्यविन्दु की सूर्य से दूरी सूर्य के बिम्बार्द्ध (व्यासार्द्ध)
के बराबर होगी क्योंकि वह सूर्य पृष्ठ से सटा हुआ है ।
तदन्तरालस्य (२,२२,१६१।३०) घनाङ्क
(१०९६४९४३४७२९९०७८३ ।२२।३०।
भाजतात् बुधादि मार्गस्य घनाङ्कतः फलम्
यदेव तेन ज्ञसितादि कालज् कृति र्हता तत्फलतः पदंहि यत् । १२४ ।
इस दूरी (सूर्य का व्यासार्द्ध = २,२२,१६१।३०) कोस का घन
(१०,९६,४९,४३,४७,२९९०,७८३।२२।३०। का बुध कोस के घन से भाग देकर
बुध के भगण काल ८८ दिन से गुणा करने पर मात्र ६ । ५२ दण्ड आता है ।
भवेदखेः स्वभ्रमकालएव तत् सपक्ष नाराच फलाङ्क नाड़िकम् (६।२२)
तदेक घस्रे नव वार वेष्टनं विपाद यं दृष्ट विरुद्धमापतेत् । १२५ ।
यह मान (६।५२) दण्ड ही सूर्य का अपने अक्ष पर भ्रमण काल होना चाहिये ।
इसका अर्थ कि सूर्य एक दिन में अपने अक्ष पर ९ चक्र से एक पाद कम पूरा
करना चाहिये जो कि यन्त्र दृष्ट मान (२५ दिन में एक भगण) के विरुद्ध है ।
अथेषुपक्षा (२५) भ्रमणस्यवासराः समक्ष भावाद् यदि ते मताः स्थिराः
तदान्यखेट भ्रमिकाल वर्गंतो रवि भ्रमो वासर वर्ग भाजितात् । १२६ ।
पुनः यदि सूर्य का अपने अक्ष पर भ्रमण काल २५ दिन माना जाय तो मंगल
आदि ग्रह के भगण काल (६८७ दिन) वर्ग को रवि भगण काल (अपने अक्ष पर)
(२५ दिन) के वर्ग से भाग देकर
फलेन खेटान्तर दूरता घने हृते फलात् यद् घन मूल मागतम्
तदर्क बिम्बार्द्धयतोऽर्क विस्तृति, तत् स्पष्ट मानात् रस वहि गुणितः ।१२७।
फल से मंगल की दूरी के घन में भाग देने हैं तथा फल का घन मूल निकालते
हैं । इससे सूर्य के बिम्बार्द्ध का जो मान आता है । वह वास्तविक मान का ३६
गुणा है ।
स्वमान सिद्धौ भ्रमं विरुद्धयते भ्रमस्य सिद्धौ च विरुद्ध यते मितिः ।
स्वकारणः स्योभय मेत्यसिद्धतः किमन्यकार्यं प्रमाणानुपातः । १२८ ।
इस प्रकार यदि सूर्य बिम्ब का मान ठीक मानते हैं । भगण दूरी सम्बन्ध के
कारण उसका भगण काल गलत आता है और भगण काल ठीक मानने पर बिम्ब
मान गलता आता है । इस प्रकार सूर्य का अपना ही भ्रमण काल और बिम्बमान
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८१
ये दोनों अनुपात के विरुद्ध हैं फिर उसके कारण मंगल आदि ग्रहों का भ्रम उस
नियम से कैसे होगा ?
मध्यरविं पर्ययतां ग्रहाणां क्षमतः क्रमादन्तिक दूर वृत्तो
चक्रार्द्ध चक्रे चल केन्द्र भक्ते ते मन्द केन्द्रे रवितस्तथैव । १२९ ।
अपनी अपनी कक्षा में मध्यम सूर्य का परि भ्रमण करते हुए मंगल आदि ग्रहों
का निकट में चक्रार्द्ध में तथा दूर रहने पर चक्र पूर्ण होने पर शीघ्र केन्द्र होता है।
भूगर्भ. से जो रेखा तुलादि तथा मेष आदि में प्रति वृत्त को काटती है। वही दो
स्थान तुला आदि तथा मेष आदि का शीघ्र केन्द्र होता है।
स्वीयैरेक विधग्रहैः सदापरिधिभि भौमादिकानां फलं
शैघ्रं मन्दभवं सुसिद्ध मवनौ दृक् तुल्यतां यादि चेत्
तन्नो भानुमतां सह ग्रहगणाः पर्येतु सर्वं सहां
भू सूर्य द्वय दिग् विशेष वसते द्राक् केन्द्र त निश्चयात् । १३० ।
ठीक उसी प्रकार मध्यम सूर्य से मन्द प्रति वृत्त के सबसे निकट तथा सबसे
दूर स्थित तुलादि तथा मेषादि में मन्द केन्द्र होता है। मंगल आदि ग्रहों का शीघ्र
और मन्दफल एक प्रकार का होता है। पृथ्वी सूर्य से उल्टी दिशा में (पृथ्वी से
सूर्य की दिशा का उल्टा) होने से और उसी से शीघ्र केन्द्र स्थिर होने के कारण
यही मानना सुविधा जनक है कि सूर्य ग्रहों के साथ पृथ्वी की प्रदक्षिणा करे।
ओजार्ध्यन्त जुषः कुजस्य परिधि स्त्र्यंशाधिको दृश्यते
सूर्याद् भूदिशि तत्परोच्चत इदं मन्दः समाकृष्यते ।
तेनाकर्षित बिम्बतो मृदुफलं कौजं स्फुटं दृक् समं
शीघ्रोत्थेन फलेन किञ्चिदधिकं यन्मन्द केन्द्राच्च तत् । १३१ ।
विषम पादान्त में मंगल की मन्द परिधि तीन अंश अधिक होती है। यह
मन्द परिधि (मन्दोच्च) सूर्य से पृथ्वी की दिशा में स्थित परोच्च द्वारा आकृष्ट होता
है। अतः परोच्च तथा उससे आकृष्ट मन्दोच्च से आकृष्ट मंगल बिम्ब का जो दृक्
सिद्ध मन्दफल होता है, वह शीघ्रफल से थोड़ा अधिक होता है। मंगल के मन्द
केन्द्र के कारण ऐसा होता है।
ग्लौजन्मन श्लफलोपच यात् फलस्य
मान्द्यस्य चापतय निश्चयतः चलस्य
मन्दोत्थ केन्द्र वशतो बहुताल्पतायत्
तत्सर्वमर्क कु युगान्न तु केवलार्कात् । १३२ ।
बुध का शीघ्र फल में वृद्धि तथा मन्दफल का ह्रास और मन्द केन्द्र के कारण
शीघ्र फल बढ़ना और घटना आदि केवल सूर्य के कारण नहीं होता। (सूर्य और
बुध का मन्द केन्द्र दोनों कारण हैं।)
२८२ सिद्धान्त दर्पण
इति क्षितिज सौम्ययोः क्षिति रवि द्वयानुग्रमे
स्फुटेऽल्प फल भेदतोः भवति हि ध्रुवोऽन्यग्रमः
तथा रवि रतः परिभ्रमति सर्वत् इक्षु क्षिते
र्दधत् खेचर कक्षिकान घटतेऽन्यथा दृक् फलम् । १३३ ।
मंगल और बुध इस प्रकार रवि और पृथ्वी दोनों की परिक्रमा करते हैं । तथा
मन्द और शीघ्र दोनों दीखने के कारण यह सिद्ध है कि इन ग्रहों के अतिरिक्त
पृथ्वी और सूर्य में से कोई एक अवश्य घूमता है । यदि रवि को स्थिर माना
जाय तो इन ग्रहों का दृक् सिद्ध मान नहीं आ सकता है । अतः यह तय है कि
इन ग्रहों की कक्षाओं को साथ ले (ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं) सूर्य पृथ्वी के
चारों तरफ घूमता है ।
अति दूरग मृक्षमण्डलं तदवस्थाः खलु तारकाः स्थिराः
असमर्द्दन भस्य वस्थिता रवयश्चेति बुधैः सुनिश्चिताः । १३४ ।
पण्डितों (पाश्चात्य) का मत है कि तारा गण अत्यन्त दूर रहने के कारण उनकी
स्थिति स्थिर मालूम होती है । लेकिन सूर्य ग्रहण (सूर्य तथा सूर्य के समान अन्य
तारा गण) आकाश में अलग अलग धरातल में हैं ।
स्वगणैः परिवारितास्तः तलगन्यासम् दिनात्तदन्तरम्
क्षिति भास्कर मध्य मार्गतः ख ख खा भ्राष्ट (८,।००)गुणाधिकं भवेत् ।१३५ ।
अन्य सूर्य भी अपने परिवार (ग्रहों) के साथ हैं । सूर्य से सबसे निकट का
जो तारा (सूर्य के ही समान) है उसकी सूर्य से दूरी, पृथ्वी से सूर्य की दूरी का
(८,०००) गुणा है ।
रवितोऽपि वृहत्तनुधरा कथमेता मनुरुपिणी ध्रुवम्
उड़वः परियान्तु तत् क्ष्मा भ्रमतः तद् गति रीक्ष्यते जनैः । १३६ ।
कितने तारा सूर्य से भी बड़े हैं । वह सभी छोटे आकार की पृथ्वी का कैसे
परि भ्रमण कर सकते हैं ? अतः पृथ्वी के भ्रमण के कारण ही तारों की गति दीख
पड़ती है ।
इति चेच्छृणु मन्मते तु तास्तलग दस्त्रमुखाः कुमध्यतः
खरखाग्नि गुणार्क मध्यम श्रुति तुल्ये पथि यान्ति नित्यशः । १३७ ।
यदि इस प्रकार तर्क स्वीकार किया जाय तो मेरे मत के अनुसार मध्यम सूर्य
की दूरी से ३६० गुणा दूरी पर नक्षत्र मण्डल पृथ्वी की परिक्रमा प्रति दिन करते
हैं । (पृथ्वी से नक्षत्र मण्डल की दूरी = ३६० x रवि मध्यम कक्षा = ३६० x
७६,०८,२९४ = ६८,४७,४६,४६० योजन दूर )
यद् युग्मौंज पदान्त शीघ्र परिषे र्भागान्तरं दृश्यते
साक्षात् शीघ्र फले ततोऽस्मदुदिता सिद्धा भ चक्र श्रुतिः
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८३
भूमेः कर्कट वद् गमात्व दुदिता सा प्राङ् मुखी चेत् भ्रम-
त्यत्रापि प्रभवत्य संगति रतः क्रान्त्यन्तयो स्तर्कतः । १३८ ।
शीघ्रफल निकालते समय सम और विषय पादान्त में शीघ्र परिधि का अन्तर
१ अंश दीखता है अतः मेरे मत के अनुसार दिया गया शीघ्र कर्ण ही ठीक है ।
केंकडे की तरह पृथ्वि की पूर्व दिशा में गति तर्क संगत नहीं है यह अन्त में क्रान्ति
की आलोचना से स्पष्ट होगा ।
भू बिम्बे धनुरन्तगे यदुद यद् यन्नर्क्षमा लक्ष्यते
तस्मात् सप्त चतुर्भवान्तर गते युग्मान्त गे ऽ स्मिन्निदम्
दृश्यताष्टकलान्तरे यमदिशि स्थानादि तत् स्थूल्यता
लोकादप्यवनिः स्थिरेति मयका निश्चीयते सर्वतः । १३९ ।
पृथ्वी सायन मकर आरम्भ में (धनु के अन्त में) रहने के समय एक नक्षत्र
उदय होकर भचक्र (नक्षत्र मण्डल) में जिस स्थान पर दीखता है पृथ्वी वहां से
४७° अंश क्रान्ति अन्तर पर मिथुन अन्त (या कर्क आंरम्भ) में रहने पर अपने पहले
उदय स्थान से ८' कला (४७° / ३६०°) दक्षिण की तरफ ही दीखना चाहिये ।
यह व्यवधान विल्कुल नहीं दीखने के कारण मैं पृथ्वी को ही स्थिर मानता हूँ ।
भानां चक्रं चलन रहितं चेत्तदा किं चलांशा
साक्षाद् मच्छ त्य नुभव मुदग् दक्षिण क्रान्त्य सा म्यात् ।
त्वं चेद् वृषे तदपि चलनं क्रान्ति वृत्तस्य सिद्धं
न त्वं ऋक्षाणां मिति शृणु तदा तस्य सिद्धान्त मस्मम् । १४० ।
भचक्र स्थिर है और चलता नहीं यह बात भी आप नहीं कह सकते हैं ।
इसका कारण अयन गति या अयनांश है । उत्तर और दक्षिण क्रान्ति में असमानता
के कारण भचक्र का चलना स्पष्ट दीखता है । इसकी व्याख्या यदि करेंगे कि यह
क्रान्ति वृत्त के चलन के कारण है । और उसके कारण नक्षत्रमण्डल का चलन
दीखता है । तो मेरा समाधान सुनिये ।
पूर्वाचार्यैर्ध्रुव शरलवा दृष्टिसिद्धा य उक्ता
स्तत्तत्साम्यत्वपचलनाद्व स्थिरत्वेन सिध्येत् ।
प्राकालोक्ता, य इह विशिखाः सम्प्रतीक्ष्यन्त एते
तस्माच्चक्रं प्रचल दभितो भाति संक्रान्ति वृत्तम् । १४१ ।
पूर्वाचार्यों ने दृक् सिद्ध कर नक्षत्रों का ध्रुवांश और शरांश जितना कहा था
अभी भी वह उतना ही है । क्रान्ति वृत्त का चलन और नक्षत्रों की स्थिरता मानने
से ऐसा नहीं होगा । अतः क्रान्ति सहित नक्षत्र समूह हम लोगों के सामने चलता
हुआ दीखता है ।
इत्थं भाना मयन चलने निश्चिते सिद्धमेव
प्रत्यग् यानं प्रतिदिन मतो निश्चलैषा धरित्री
२८४ सिद्धान्त दर्पण ·
दिव्य ज्योतिर्यदिभव लयेत्सूर्यवद् द्योतमानम्
तत् किं ध्वान्ति निशि न विलयं यात्य संरूयाहु सत्वे । १४२ ।
नक्षत्रों का अयन चलन, उनकी पूर्व से पश्चिम की दैनिक गति से प्रतीत होता
है, कि पृथ्वी स्थिर है । भूगोल (आकाश) में यदि सूर्य के समान अन्य दिव्य
ज्योति होते तो रात्रि का अन्धकार निश्चय नष्ट हो जाता (रात्रि' में अन्धकार होने से
प्रतीत होता है कि तारागण सूर्य के समान प्रकाश मान नहीं हैं ।)
यन्त्रे यस्मिन् शत गुण वृहद् दृश्यते बिम्बमारात्
तस्मिन् दृष्टाद वसु (८) कलामिते लुब्धकां तैक्ष्म्यमाजः
दुष्टदृष्टि प्रति हति रपि स्यादिव सां घ्रिमानाद्
भानो र्यन्त्रान्तर गततनो र्यद्वयोः साम्य लाभः । १४३ ।
जिस दूरवीक्षण यन्त्र से १०० गुणा बड़ा बिम्ब दीखता है उससे लुब्धक तारा
सूर्य से मात्र ८ कला दूर रहने पर भी दीखता है । सूर्य का बिम्बमान तो दोनों की
दृष्टि समान दिशा से होने के कारण अत्यन्त भयंकर तेज उत्पन्न होगा । ( अतः
हमारे सूर्य के समान आकाश में असंख्य सूर्य नहीं हैं )
दूराधिक्याद् यदि हिमरजो वाष्प संघात जाता
तादृग् ज्योतिः क्षति रिति मतिर्भाति भानां तते स्ते
तत्खेटीनां विविध सरणीभ्राजतां बिम्ब तुल्यां-
स्ताराराः किं तत्सम रुचि भृतो भ्रान्ति कृप्तं हिमाद्यम् । १४४ ।
इसके बाद यदि आपका तर्क है कि तारागण अत्यन्त दूर होने के कारण
उनका तेज हिमकणों और वाष्प आदि द्वार शोषित हो जाता है । अतः उनका
प्रकाश सूर्य की तरह तेज नहीं होता है । तो मेरा उत्तर है- नाना प्रकार की गति
करने वाले ग्रहों की तरह तारा गण कैसे उज्ज्वल हो सकते हैं । भ्रम के कारण
क्या तुषार आदि की कल्पना नहीं है ?
नेदीयस्त्वाद् यदि कुजमुखाः सुस्थिरालोकवन्त
स्ताररा दूराश्वल हिममुखैरावृताः कम्पवत्यः
दृश्यन्ते तत् क्वचिदपि घनै श्चादिताः सन्ति लुप्ताः
स्व ज्वालानां स्फुरण करणं सिद्धमग्ने रिवातः । १४५ ।
निकट में होने के कारण मंगल आदि ग्रहों का प्रकाश स्थिर है । किन्तु
तारागण दूर में हैं और हिम आदि से आवृत होने के कारण उनका प्रकाश कम्पन
करता है । (टिमटिमाता है) । आग की लपट की तरह इनका कम्पन होना
स्वाभाविक है । लेकिन आग की तरह घने तुषार आदि के कारण उनका भी
प्रकाश लुप्त हो सकता है । क्या ऐसा देखा गया है ?
व्यखेस्फीत श्रिपिट उभयो केन्द्रये भ्रान्त भूम्ना
गोलश्चित्ते स्फुरति तवचेदार्द्र मृत्पिण्ड तुल्यः ।
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८५
तद् येनाग्रं सद्गति मतस्तत् फलंकिं तथा भूत् ।
(येनानकदम्बु विशेष फलेन)
स्रष्टुः सृष्टि र्विसदृश गुणा किं मृषा भ्रान्ति कृतिः । १४६ ।
कच्चे मिट्टी के गोल पिण्ड को उसके व्यास के दो छोरों से पकड़कर घुमाने
से दोनों व्यासाग्र बिन्दु दब जाते हैं तथा उनके मध्यवर्ती स्थान फैल जाता हैं ।
इसी प्रकार पृथ्वी में भी मेरु स्थल चिपटा तथा उनके बीच विषुव वृत्त स्थल
फैला हुआ है । इससे पृथ्वी का अपने अक्ष (व्यास के चारों तरफ) घूमना सिद्ध
है । आपकी इस युक्ति का उत्तर है कि विधाता की सृष्टि में भी इसके समान कई
घटनायें हैं । इन दोनों फलों की समानता के कारण पृथ्वी के अक्ष भ्रमण की
कल्पना जरूरी नहीं है ।
भू भ्रान्त्यै भ चक्र पश्चिम गमे सिद्धे किमायास्तो
भ भ्रान्त्यै प्रवहाक्ष मारुत कृति र्विष्णोरिदं वक्ष चेत्
ईशः सर्षप पर्वतौ स्थिर चलौ कर्तुं समर्थो निजां
शक्ति व्यक्तु मिमां क्षमा मचलयत्यत्रास्ति किं दूषणम् । १४७ ।
पृथ्वी के पूर्व गति भ्रमण से नक्षत्र चक्र का पश्चिम की तरफ घूमना सिद्ध
है । यदि ऐसा था तो भगवान ने अत्यन्त परिश्रम से प्रवाह वायु द्वारा नक्षत्र मण्डल
की पश्चिम गति क्यों आरम्भ की ? इसका उत्तर है कि भगवान सरसों को स्थिर
और पर्वत को चलकर सकते हैं । अपना सामर्थ्य दिखाने के लिये उन्होंने पृथ्वी
को भी अचल कर दिया है ।
धर्माधर्म फलं प्रदान विषये नृणां त्रिलोकेशितु
र्निन्द्या दुर्घटना नतूपकरणैः खेलासु लीलाम्वुधेः
लोकस्य क्षणभंगुराल्प तनवे पाषाण रत्नादिभिः
प्राज्याया सकृतालये ष्षपि यतोदृष्टा प्रवृत्तिर्मुहुः । १४८ ।
लीलाप्रिय भगवान ने लोगों को धर्म-अधर्म का फल देने के लिए कई बार
निन्दनीय अघटनायें की हैं । लेकिन पार्थिव उपकरण में उनकी कोई निन्दनीय
घटना नहीं है । लोगों का शरीर क्षण भंगुर है लेकिन पाषाण, रत्न द्वारा अत्यन्त
परिश्रम से लोगों के निवास के लिये जो पृथ्वी बनी है, उसको भगवान स्थिर
ही रखेंगे । जिस प्रकार मनुष्य अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, भगवान भी पृथ्वी
को स्थिर रख नक्षत्रों को घुमाने में सदा प्रवृत्त है ।
अज्ञानान्मनुजास्तथा विदधतु ज्ञानी तु सर्वेश्वरो
युक्त्या क्रीड़तु मर्हतीति तव चेदुक्तिर्मया त्रोच्यते
द्राङ् मर्त्याश्वगजादि नश्वर तया स्रष्टुः किमास्ते फलं
तेभ्यः काक शृगाल कादि सुचिर स्थित्यास्थ कार्यञ्च किम् । १४९ ।
जिस प्रकार अज्ञानी लोग घर द्वार करने आदि की चेष्टा में रहते हैं, उस
२८६ सिद्धान्त दर्पण
प्रकार ज्ञानी नहीं करते । भगवान केवल न्याय के लिये क्रीड़ा करते हैं । यदि
तुम्हारी यह युक्ति है तो मेरा तर्क है कि उन्होंने मनुष्य, हाथी और घोड़ा को कम
आयु तथा कौवा, सियार आदि को अधिक आयु देकर कौन सा फल पाया अर्थात्
ये सब किसी उद्देश्य या परिणाम के लिये नहीं होते, भगवान् की इच्छा ही
एकमात्र कारण है ।
यास्ते धरेश बहिरंग तटस्थ शक्ति
युग्माद् वरा निखिल सद्गुण जीव सदम ।
सच्छक्ति रान्तर तनुः परमेश्वरस्यः
सांशैर्ग्रहैः परिभितास्ति किमत्र चित्रम् । १५० ।
भगवान् के अन्तरंग (तटस्थ) और बहिरंग दो प्रकार शक्तियों से निर्मित उनका
अभ्यन्तर शरीर पृथ्वी ही सर्व गुणी तथा सभी जीवों का स्थान है । अतः भगवान
के अंश रूप ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, इसमें विचित्र क्या है ?
दिनाब्द क्रान्त्युत्था त्रिविधि गतिरित्यादि रवने
रसिद्धा सिद्धान्त द्रुमफल निभाभि र्भणितिभिः ।
रसास्वादादासां भवतु भवतं तुष्ट मनसां
रसाभ्रान्तित् क्रान्ति क्षितिरितरमा रतगिराम् । १५१ ।
सिद्धान्त वृक्ष के फल की तरह अनेक युक्ति द्वारा पृथ्वी की दैनिक, वार्षिक
तथा क्रान्ति-तीन प्रकार की गति खण्डित (असिद्ध हुयी) । इन युक्तियों का
रसास्वादन करने से लोगों की धराभ्रम में से उत्पन्न भ्रान्ति दूर हो ।
तुल्यक्षोदय दर्शनाज् ज्ञ कुज मान्द्य द्राक् फल प्रेक्षणा
इन्द्रांक स्थिति दर्शनाद् गुरु लघु द्रव्य स्वभावे क्षणात्
आकृष्टस्य च कर्षकाभिमुखता सिद्धैः शरा दर्शना
दुष्णांशोरिति साधितां बहु विधै र्लिङ्गै स्थिरत्वं क्षितौ । १५२ ।
पृथ्वी की स्थिरता इन चीजों से स्थिर हुयी- (१) नक्षत्र गोल में एक ही
स्थान पर उसी नक्षत्र का बराबर उदय होगा, (२२) बुध और मंगल के मन्द तथा
शीघ्र फल में मन्दकेन्द्र के कारण ह्रास और वृद्धि, (३) पृथ्वी से चन्द्र कलंक
सदा एक समान ही दीखना, (४) गुरु लघु (हल्के भारी) पदार्थ का स्वभाव देखने
से (५) आकृष्ट वस्तु आकर्षण की दिशा में जाने से (६) सूर्य का शर नहीं रहने
से आदि ।
सिद्धान्तशेखरे - नभस्य यस्कान्त महामणीनं मध्यस्थितो लोहगुड़ी यथास्ते ।
आधारशून्योऽपि तथैव सर्वाधरोधरित्र्या ध्रुवएष गोलः । इति । १५३ ।
लोहा युक्त मणि के भीतर लोहा जिस प्रकार गोल रहता है उसी प्रकार बिना
किसी आधार के सभी का आश्रय स्थल यह पृथ्वी निश्चित रूप से गोल है ।
भूगोलस्थिति वर्णनम् २८७
वाराहेऽपि-पञ्चमहाभूतमयस्तारागण पञ्जरे महीगोलः
खेऽयस्कान्तान्तः स्थो लोह इवा वस्थितोवृत्तः । इति । १५४ ।
जिस प्रार लौह युक्त मणि के भीतर लोहा रहता है इसी प्रकार तारा मण्डल
के भीतर पांच महाभूतों से बनी पृथ्वी भी है ।
तस्मात्तिष्ठति भूः प्रयाति सविता मूर्त्या स्वमध्याख्यया
विभ्रत् खेचर चक्र मक्रम गती वैतत् क्षिता वीक्ष्यते
मत्सिद्धान्त मिमं विविच्य सकलं सन्त प्रशंसन्तुवा
निन्दन्तु श्रम वेदिनां ह्युभयथा मंस्ये कृतार्थं कृतिम् । १५५ ।
मेरी इन सभी युक्तियों के कारण मत है कि पृथ्वी स्थिर है । सूर्य अपनी
मध्यम मूर्ति द्वारा (मध्यम सूर्य) अन्य ग्रहों को साथ लेकर पृथ्वी की परिक्रमा
करता है । ग्रह समूह का कोई क्रम गमन नहीं हैं । (सभी अपने अपने रास्ते से
जाते हैं ।) परिश्रम का मूल्य जानने वाले सज्जन मेरे सिद्धान्त पर विचार करें ।
मैं इसी से कृतार्थ हो जाऊंगा । मुझे अपने मत के प्रशंसा अथवा निन्दा से मतलब
नहीं है ।
हे धीरा गणकाः समस्त सहृदो बद्धाञ्जलि र्वच्यहम्
यामेऽस्मिन्नजनिष्ट धार्ष्ट्य पटुता तां मार्हु मिच्छास्तुवः
बालानां प्रतिपत्तये किल मया सम्वाद दम्भादियम्
भूमिष्ठा गदिता यथामति भवत्तोषात् सदोषा न के । १५६ ।
हे पण्डित गणक, आप सभी के बन्धु हैं । भू स्थितरता सिद्ध करने में मेरी
विशेष धृष्टता को क्षमा करें । भू भ्रम के बदले भू स्थिरता बच्चों को समझाने के
लिए मुझे जो दीखा वहीं मैने कहा है । जगत में कौन दोष मुक्त है ? (अर्थात्
मेरी इस युक्ति में भी दोष सम्भव है ) ।
आत्मोत्कर्षः पुरुषैः सर्वथेष्यो
दिवाकरे केनचिद् घष्यमाने
तस्यास्याङ्गेन्मर्कटा कार सिद्धि
दैवाधीनो नास्ति दोष स्तदेषः । १५७ ।
मनुष्य केवल अपना उत्कर्ष चाहता है। देवता बनाते बनाते वह मूर्ति यदि
बन्दर की हो गयी तो क्या करें ? इसे विधि का विधान ही मानना पड़ेगा, मनुष्य
का क्या दोष है ?
ब्रह्माण्ड कारणाब्धौ चलतु जल बलाद् वा महावात् वेगात्
किंवा स्वामम्बरस्थं तदुपरि परित स्तात् पुराणादि सिद्धम्
सप्ताब्धिद्वीप भूमृद् प्रभृति सुविततम् नास्ति तत्रास्मदुक्ति
र्व्यक्ति भूते तदण्डोदर गत धरणी नाद्य मुद्िश्य दृश्यम् । १५८ ।
३८८ सिद्धान्त दर्पण
ब्रह्माण्ड के मूल समुद्र में स्थित विश्व जल के कारण चलने लगा, वह कोई
महावात्या आदि के कारण विचलित न होकर आकाश में उसी प्रकार रहता है।
उसके चारों तरफ पुराण वर्णित सात समुद्र, द्वीप, पर्वत आदि फैले हुए हैं। यहां
मैने ब्रह्माण्ड की कथा नहीं कही। केवल उसके आधार गत पृथ्वी, सूर्य आदि
के विषय में ही कहा।
भूगोल भ्रान्ति वादी गतचिर समये न श्रुतोऽस्माद् युगांघ्रेः
साध्वीन्द्रांशे (१४४) व्यतीते सुविरल उदितः सौगतास्या- वटाद्यः
तस्याप्रत्युक्तिमार्याः प्रतनुविदधिरे युक्तिभि र्भास्कराद्याः
साम्प्रत्यस्य तनुत्वात् प्रचुरमकर वं वाच्यं तत् प्रशान्त्यै । १५९ ।
अतीत में पृथ्वी का चलना पहले कभी सुना नहीं गया। कलियुग के १४४
वें भाग (अर्थात् कलि ३००० संवत् में या ई.पू. १०२ में) बौद्धों के द्वारा भू चलन
की सामान्य रूप से चर्चा हुई। भास्कर आदि विशिष्ट पण्डितों ने उसका उत्तर
भी साधारण तौर पर दिया। अतः इस मत के निराकरण के लिये यहां बहुत
कहना पड़ा।
सूर्य स्थैर्योक्ति सूत्रैः क्षितिगति कृतिं व्याजराजत्व माप्तः
सिद्धान्त स्वर्णगोत्रः प्रकृति मुपगतो यत्कृपा स्पर्शनोत्थैः ।
अस्माद् जिहाग्रजाग्रज्जलनिधि वसनास्तेम सद् युक्ति वह्नि-
ज्वालै र्भूयोऽपि सोऽयं कलयतु कुशलं श्री नीलाचलेन्दुः । १६० ।
स्वर्ण से उत्पन्न (स्वर्णपदक या धन बल से) सूर्य की स्थिरता तथा उसके
सूत्र (आकर्षण) से पृथ्वी के चलने का सिद्धान्त बेकार ही श्रेष्ठ सिद्ध हो गया
है। जिसकी कृपा से मेरी जीभ से सागर से घिरी पृथ्वी की स्थिरता के बारे में
अनेक युक्ति निकली और अग्नि के समान प्रज्वलित युक्ति से पृथ्वी चलने का
स्वर्ण रूपी सिद्धान्त गल गया, वह नीलाचल वासी प्रभु जगन्नाथ हमारा कुशल
करें।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत-
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
क्ष्माप्रस्थिति र्व्यरचि सप्तदश प्रकाशः । १६१ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात् राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना एवं दर्शन में समानता तथा बाल बोध के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
आकाश में पृथ्वी की स्थिति से सम्बन्धित १७ वां प्रकाश समाप्त हुआ।
अष्टादश प्रकाश
भूगोल विवरणम्
यत्प्रोचुर्भगवानिति श्रितजनाः सांख्याश्च पातञ्जला-
निर्लेपः पुरुषः परः शिव इति ब्रह्म मेति वेदान्तिनः
न्यायज्ञाः परमात्मशब्द ममृतं कर्मेति मीमांसकाः
सौराद्याः कुलदैवतं किमपि तत् कृष्णारूपं तत्वं भजे । १ ।
आश्रित लोग जिसको ऐश्वर्य शाली (भग-ऐश्वर्य) कहते हैं । सांख्य और
योग में जिसका नाम निर्लिप्त पुरुष और परम शिव, वेदान्त में जिसे ब्रह्म कहा
गया है, न्याय शास्त्र जिसे परमात्मा (अमर) कहता है, मीमांसक जिसे कर्म कहते
हैं तथा सूर्योपासक जिसे कुल देवता कहते हैं, उसी श्रीकृष्ण रूपी तत्व को में
नमस्कार करता हूँ ।
सृष्टिः प्राग् बहुधोदितामुनिवरैः तत् सार भूतां तदा
वक्ष्येऽन्यत्र कृतौ भविष्यदि यदा सृष्टिः तदीया दया
सिद्धान्त प्रथनोचिता मिह पुनः सौरोक्तरीत्या ब्रुवे
पूर्व प्रश्न गणानुवाद विहिता संस्थान मानादि च । २ ।
महर्षियों ने सृष्टि के विषय में बहुत कुछ कहा है यदि भगवान की दया हुयी
तो इस विषय पर विस्तार से एक अन्य ग्रन्थ में कहूँगा । यहां पुनः सूर्य सिद्धान्त
की रीति से इस ग्रन्थ के लिये उपयोगी बातें सृष्टि के बारे में कह रहा हूँ । पहले
कहे हुए प्रश्नों के उत्तर रूप में सृष्टि की स्थिति और परिमाण के विषय में भी
कहूंगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-श्रृणुष्वैक मनास्तत्वं गुह्य मध्यात्म संगितम्
प्रवक्ष्याम्येव भक्तानां नादेयं विद्यते मम । ३ ।
एक मन होकर सुनो क्योंकि अध्यात्म से सम्बन्धित होने के कारण यह तत्व
अति गोपनीय है । मेरे पार ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे भक्तों को न देकर अपने
पास रख लूं ।
वासुदेवः परं ब्रह्म तन्मूर्तिः पुरुषः परः
अव्यक्तो निर्गुणः शान्ति पञ्चविंशा त्परोऽव्ययः । ४ ।
परम ब्रह्म की मूर्ति ही परम पुरुष वासुदेव हैं । वह निर्गुण, शान्त, अव्यय
और २५ तत्वों से अतिरिक्त हैं ।
प्रकृत्यन्तर्गतो देहो बोध्यमानस्तु सर्वगः
संकर्षणोऽपः सृष्ट्यादौ वासुबीजमथा सृजत् । ५ ।
परम ब्रह्म के अंश रूप संकर्षण ने देहधारी होकर प्रकृति में प्रवेश किया ।
२९० सिद्धान्त दर्पण
वह सर्वगामी और बोध्य है । इससे सर्व प्रथम जल की सृष्टि हुयी और उसमें
संकर्षण ने बीज डाला ।
तदण्डम भवंद् हैमं सर्वमन्तस्तमो वृतम्
तत्रानिरुद्ध प्रथमं व्यक्तीभूत सनातनः । ६ ।
वह बीज सुवर्ण अण्ड में परिणत हुआ जिसके भीतर सिर्फ अन्धकार था ।
उस अन्धकार के भीतर चिरस्थायी अनिरुद्ध प्रकाशित हुये ।
हिरण्यगर्भो भगवाने ष छन्दसि पश्यते
आदित्यो ह्यादि भूतत्वात् प्रसृत्य सूर्य उच्यते । ७ ।
वेद में इस अनिरुद्ध को भगवान हिरण्य गर्भ कहा गया है । यह प्रथम उत्पत्ति
होने के कारण आदित्य सूर्य भी कहा गया ।
परं ज्योतिस्तमः पारे सूर्येऽयं सवितेति च
पर्येति भुवनान्येष भावयन् भूत भावनः । ८ ।
अन्धकार का अन्त करने के कारण इसे परम ज्योति कहा गया तथा सृष्टि
रचने के कारण सविता । वह प्राणियों का निर्माण करने के साथ साथ सभी
भुवनों (३ या १४ भुवन) का परिभ्रमण करते हैं ।
प्रकाशात्मा तमो हन्ता महानित्येष विश्रुतः
ऋचेऽस्य मण्डलं सामान्युस्रा मूर्तिर्यजूंषि च । ९ ।
अन्धकार को नष्ट करने का कारण सूर्य महान् के रूप में विख्यात् हैं । ऋक्
वेद का मन्त्र इनका मण्डल, सामवेद मन्त्र इनका किरण तथा यजुर्वेद मन्त्र इनका
शरीर के रूप में प्रतिपादित किया जाता है ।
त्रयीमयोऽयं भगवान् कालात्म काल कृद् विभुः
सर्वात्मा सर्वगः सूक्ष्मः सर्वस्मिन् सः प्रतिष्ठितम् । १० ।
अतः सूर्य तीन वेदमय और ऐश्वर्य्यशाली है । वह काल की आत्मा हैं ।
अर्थात् समय का मान उन्हीं से निर्धारित हुआ है । वह काल के कर्ता और
सर्वव्यापी वह समस्तों की आत्मारूपी हैं । अतः हर स्थान के भीतर सूक्ष्मरूप से
हैं । (वृहद् रूप में ) सभी उनके भीतर हैं ।
रथे विश्वमये चक्रं कृत्वा संवत्सरात्मकम्
छन्दां स्यश्वाः सूत्रयुताः पर्येत्येषवसीसदा । ११ ।
चर अचर सहित पूरा विश्व उनका रथ है, छन्द उनका घोड़ा, ये किरणों से
युक्त होकर सूर्य के समान परिक्रमा करते हैं । सभी सूर्य के वश में हैं ।
त्रिपादममृतं गुह्यं पादोऽयं प्रकटोऽभवत्
सोऽहंकारं जगत्स्रष्टुंब्रह्माणमसृजत् प्रभुः । १२ ।
भूगोल विवरणम् २९१
सूर्य के तेज का एक पाद हो प्रकाशित है तथा तीन पाद अमृत के रूप में
गोपन है । उन्होंने अहंकार की सृष्टि कर जगत् बनाने के लिये ब्रह्मा की सृष्टि
की ।
तस्मै वेदान् वरान् दत्वा सर्व लोक पितामहम्
प्रतिष्ठाव्याण्ड मध्येऽथ स्वयं पर्यतिभासयन् । १३ ।
सूर्य ने ब्रह्मा को वेदरूपक वर देकर उनको अण्ड के भीतर स्थापित किया
तथा स्वयं प्रकाशित होकर भ्रमण करते हैं ।
अथ सृष्ट्यै मनश्चक्रे ब्रह्माहंकार मूर्त्तिमान्
मनश्चन्द्रमा जज्ञे सूर्योऽग्नेस्ते जसां निधिः । १४ ।
ब्रह्मा ने अहंकार रूप में आकर सृष्टि करने में ध्यान दिया । उनके मन से
चन्द्र, कान ने अग्नि तथा आंख से सूर्य उत्पन्न हुए जो सभी तेजों के भण्डार हैं ।
मनसः खं ततो वायुरग्नि रापो धराक्रमात्
गुणैक वृद्धया पञ्चैव महाभूतानि जज्ञिरे । १५ ।
मन से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, से जल, जल से पृथ्वी-इस
प्रकार एक एक गुण बढ़ने के क्रमशः पञ्चमहाभूतों का जन्म हुआ ।
अग्निरापो भानुचन्द्रौ ततश्चाङ्गिरकादयः
तेजो भूखाम्बु वातेभ्यः क्रमशः पञ्च जज्ञिरे । १६ ।
अग्नि, जल, सूर्य चन्द्र और तब मंगल आदि उत्पन्न हुये । तेज पृथ्वी,
आकाश, जल और पवन से इनकी (पांच तारा ग्रहों) भौम आदि) उत्पत्ति हुयी ।
पुनर्द्द्वादशधात्मानं विदधे राशि संज्ञकम्
नक्षत्र रूपिणं भूयः सप्त विंशात्मकं वशी । १७ ।
पुनः ब्रह्मा ने अपने को १२ भागों में बांट कर १२ राशियों का रूप ग्रहण
किया । इन्हीं १२ राशियों को २७ नक्षत्रों मे विभाजित किया ।
ततश्चरा परं विश्वं निर्ममे देवपूर्वकम्
ऊर्ध्वमध्या परेभ्यश्च स्रोतोभ्यः प्रकृतिं सृजन् । १८ ।
उसके बाद देवता तथा तब ऊपर, मध्य तथा नीचे क्रम से प्रकृति की सृष्टि
तथा चर अचर सहित पूरा विश्व बनाया ।
गुणकर्म विभागेन सृष्ट्या प्राग्वदनुक्रमात्
विभागं कल्पयामास यथास्वं वेद दर्शनात् । १९ ।
अपने वेद ज्ञान के द्वारा उन्होंने अपने अपने गुण और कर्म के अनुसार विभागों
[L32
२९२ सिद्धान्त दर्पण
ग्रह नक्षत्रताराणां भूमेर्विश्वस्य वा विभुः
देवासुर मनुष्याणां सिद्धानाञ्च यथा क्रमम् । २० ।
इन विभागों में क्रमशः ग्रह, नक्षत्र, तारागण, पृथ्वी, बिम्ब, ब्रह्माण्ड, देव,
असुर, मानव और सिद्ध उत्पन्न हुए ।
ब्रह्माण्ड मंत्रः सुषिरं यत्रेवं भू र्भुवादिकम्
कटाहद्वितयस्येव सम्पुटं गोलकाकृति । २१ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर खाली स्थान है जिसमें भू भुव, स्व आदि लोक है । दो
कड़ाहों को परस्पर किरानों से मिलाने पर जैसी गोल आकृति होती है, ब्रह्माण्ड
वैसा ही है ।
ब्रह्माण्ड मध्ये परिधि व्योमकक्षा भिधीयते ।
तन्मध्ये भ्रमणाद् भानां क्रमशोधः क्रमादधः । इति । २२ ।
ब्रह्माण्ड के भीतर की परिधि को व्योम कक्षा कहते हैं । उसमें ऊपर से नीचे
की तरफ क्रमशः नक्षत्रों आदि का भ्रमण्ड होता है । (सूर्य सिद्धान्त का उद्धरण
समाप्त) ।
नारदीये-इति सौररोक्त पद्यानां विंशत्या सूचितं क्रमः
अथैतदुक्त सूर्यादि स्वरूप प्रविविच्यते । २३ ।
सूर्य सिद्धान्त के इन २० पद्यों में सृष्टि की उत्पत्ति का क्रम दिखाया गया
है । अब उसमें कहे गये सूर्य आदि के स्वरूप का विशेष विचार किया जा रहा
है ।
चतुर्व्यूह प्रकारेण कृतिः सर्वत्र सर्वदा । इति ।
इति श्री नारदीयोक्तः प्रद्युम्नोऽत्रैव पद्मभू . २४ ।
हर जगह सदा चार स्तर से कार्य होता है- इस प्रकार श्री नारदीय पुराण में
कहा गया है । यहां प्रद्युम्न ही पद्मभू ब्रह्मा हैं । (उदाहरण सूर्य से ब्रह्मा, ब्रह्मा से
सूर्य । वासुदेव (सूर्य) से संकर्षण प्रद्युम्न, उससे अनिरुद्ध, अनिरुद्ध (विष्णु) से
ब्रह्मा ।
तत्कारणं महत्तत्त्व रूपीयः सूर्य उच्यते ।
ततोऽन्यः कथ्यते भूयः कार्यरूपी स्वयम्भुवः । २५ ।
ब्रह्मा का कारण महत्तत्व रूपी सूर्य है, ब्रह्म का कार्य रूपी एक और सूर्य
भी कहा जाता है ।
अतीत्वे रूप्यमर्कस्य ब्रह्माण्डान्तः प्रतीयते
तत्राद्यस्यात्म भूघस्र कर्तृत्वं सम्भवेत्यतः । २६ ।
अतः दो सूर्य हैं । प्रथम सूर्य आदि देव (ब्रह्मा ) की आत्मा भूमि का मालिक
भूगोल विवरणम् २९३
तथा इनका कर्ता है ।
तैजसं भास्वतो बिम्ब मुद् भूतं स्पर्श रूपकम्
पाञ्चभौतिक मप्येतद् भास्वत्वात् प्रदीपवत् । २८ ।
सूर्य का बिम्ब पञ्च भूतों से बना होने पर ही अत्यन्त तेजपूर्ण होने के कारण
दीपक की तरह उससे प्रकाश निकलता है । उसका तेज स्पर्श द्वारा अनुभव किया
जा सकता है । (छूने से गर्म मालूम होगा)
अस्याष्टौ भानु बिम्बस्यारम्भ का भूत भागकाः
चत्वारस्तेज सैन्येषा मे कैकोऽशः प्रकीर्तितः । २९ ।
सूर्य बिम्ब के आठ भूत विभाग हैं । इसमें ४ तेज से उत्पन्न हैं तथा अन्य
४ विभाग बाकी ४ महाभूतों के अधिनायक (प्रत्येक भाग एक महाभूत का स्वामी
हैं) ।
तेजः प्राधान्यतः सूर्य स्तै जसः प्रोच्यतेऽखिलैः
किन्तु दिव्यं रवेस्तेजो भौमाच्छत गुणाधिकम् । ३० ।
तेज तत्व प्रधान होने के कारण सूर्य को सभी तैजस कहते हैं । किन्तु दिव्य
रवि का तेज भौम, अग्नि आदि के तेज से १०० गुणा अधिक है ।
शीतस्पर्शाधिकरणं बिम्बमाप्यं हिमद्युतेः
करका वक्तदारब्धं चतुर्भिजर्ल भागकैः । ३१ ।
इसी प्रकार चन्द्र बिम्ब जल मय होने पर भी उसमें ८ में ४ भाज जल होने
के कारण उसमें शीतलता है । ओले की तरह
एकैक भागैरन्येषां भूतानां तत्र यत्पुनः
पर प्रकाशकत्वं तद् भानूमद् भानु संक्रमात् । ३२ ।
बाकी चार भागों में प्रत्येक १-१ महाभूत से सम्बन्धित है । सूर्य के प्रकाश
के कारण इसमें भी प्रकाश होता है ।
प्रथमां पिवते वह्निः कलामित्यादि यत् स्मृतेः
वाक्यं सौक्त्या पचयतो नैवेदं पारमार्थिकम् । ३३ ।
स्मृति वाक्य (शान्ति पाठ) में कहा गया है । कि चन्द्र प्रथम कला या किरण
से आग को पीता है वह यथार्थ नहीं (लाक्ष णिक) है । चन्द्र की शुक्लता कम
होने के कारण इस प्रकार कहा जाता है । तब वह शुक्ल अंश अग्नि के समान
लाल दीखता है)
तेजसः स्यात्कथं पानं दृष्टि भोगोऽत्र केवलः
देवदत्तेन भुज्यन्ते ग्रामा स इति वन्मतः । ३४ ।
तेज का पान नहीं हो सकता अतः इसका अर्थ यहां दृष्टि भोग, (आंख से
२९४ सिद्धान्त दर्पण
देखना ही है) । जैसे देवदत्त ने ग्राम का भोग किया-इसका अर्थ यह नहीं है कि
वह गांव को खा गया । भोग का अर्थ अपने सुविधा के लिये व्यवहार ही है ।
कला शब्देन तद् वृद्धि क्षयाभ्यामनुलक्षितः
काल एवोच्यते नो चेत् पदे दर्शेऽखिल क्षति । ३५ ।
कला शब्द का प्रयोग चन्द्र के प्रकाश में कमी या बढ़ने के समय के बारे
में किया गया है । नहीं तो अमावास्या में सभी किरणों का क्षय हो जाता है ।
उस समय कला वृद्धि की बात क्यों होगी ?
भूयसाल्पस्य बोधः स्यादिति न्यायेन शीतगोः
शैत्य नास्तोष्णतानुष्णा शीतस्पर्शाऽन्यथे भवेत् । ३६ ।
बड़े वस्तु से छोटा छिप जाता है यह न्याय (तर्क संगत) है । इसी कारण
चन्द्र में शीतलता की प्रधानता होने कारण उसकी थोड़ी सी उष्णता का बोध नहीं
होता है । किन्तु चन्द्रमा में बिल्कुल ही उष्णता नहीं है, ऐसी बात नहीं है ।
उष्णता नहीं होने पर उसका शीत स्पर्श अन्य प्रकार का होगा । (और ठण्डा
होगा- बर्फ के समान)
जलप्राये विधोः पृष्ठे निष्ठा वृक्षादयो जनैः
कलंकत्वेन वर्ण्यन्ते नाना प्राचीन वाङ्मयैः । ३७ ।
चन्द्रबिम्ब जलमय है । उसमें वृक्ष पर्वत आदि हैं । उन्हीं का कलंक के रूप
में वर्णन हुआ है । इस प्रसंग में अनेक प्रकार की प्राचीन कथायें भी हैं ।
चन्द्रवन्मंगलाद्यास्ते प्रागुक्ता भानि तु स्वतः
तैजसानित्यहं वच्मि जगुरात्यानि के चन । ३८ ।
चन्द्र के समान मंगल आदि है तारा स्वतः तैजस (प्रकाशित हैं ) ऐसा मेरा
मत है । कोई कोई इन्हें जल बिम्ब भी कहते हैं । बहुत दिनों से ऐसा मतभेद है ।
आप्यत्वेतु भकक्षायां दृश्यतेऽर्कस्य विस्तृतिः
विकला पञ्चकं यस्मात् ततः तत् कर संक्रमात् । ३९ ।
नक्षत्र गोल में रवि का व्यास ५ विकला मात्र है । अतः तारा गण विशुद्ध
फल बिम्ब होते तो रवि की किरण द्वारा उनकी-
तादृगुज्ज्वलता वानां न सम्भवति तान्यथ
यद्यर्क समते जांसि तदान स्यात्त मोनिशि । ४० ।
इतनी अधिक उज्ज्वलता नहीं होती । दूसरी तरफ वह सूर्य के समान तैजस
होने पर रात्रि में इतना अन्धकार नहीं होता । अर्थात् तारागण न सूर्य के समान
तैजस् हैं न चन्द्र के समान जलमय ।
भूगोल विवरणम् २९५
ततेङ्गीकृतं भौमज्योति रौपाधिकोपमम्
सूर्या शुपाधिकं तेजो यद् ग्रहेषु तथेष्यते । ४१ ।
अतः उनकी ज्योति पृथ्वी की ज्योति के समान औपाधिक है (उसी प्रकार
की है । सूर्य का औपाधिक तेज जिस ग्रह के ऊपर पड़ता है वही दीखता है ।
वर्णभेदो यथा वन्हेः स्यादाधारविशेषतः
तथाभेषु ग्रहेषु स्याद् भिन्ना सौपाधिको द्युतिः । ४२ ।
आधार के कारण जिस प्रकार अग्नि के वर्ण में भिन्नता आती है उसी प्रकार
सूर्य की किरण एक ही वर्ण की होती है, पर भिन्न भिन्न ग्रहों पर उसका अलग
अलग रंग होता है ।
पितरश्चन्द्र बिम्बस्य श्रूयन्ते पृष्ठवासिनः
यथा तथान्य ग्रह भेष्वपि स्थानं प्रतीयते । ४३ ।
(शास्त्र के अनुसार) चन्द्र के पृष्ठ प्रदेश में पितृ लोक रहते हैं । ठीक इसी
प्रकार अन्य ग्रहों पर भी भिन्न भिन्न प्राणी रहते हैं ।
यद्यद् भूतमया लोका स्तत्र तन्मय देहिनः
वर्तन्ते पार्थिवांशस्य सम्पर्काद् व्यवहारितः । ४४ ।
जिस महाभूत से जो लोक बना है वहां उसी महा भूत के शरीर वाले प्राणी
रहते हैं । पृथ्वी के जिस अंश के सम्पर्क में वे अधिक आते हैं । उसी का व्यवहार
करते हैं ।
ब्रह्माण्ड मध्य संस्थानो भूगोलः पाञ्चभौतिक
तदा रम्भकतामाप्तं भूमिभाग चतुष्टयम् । ४५ ।
ब्रह्माण्ड के मध्य में स्थित पृथ्वी पांच भूतों से बनी है । आरम्भ में इसमें ४
भाग (८ भाग में) भूमि का भाग था ।
जलादि भूत भागानां चतुष्कं पूर्ववत् मतम् ।
पृष्ठमस्याब्धि भागं सजल भागत्रयान्वितम् । ४६ ।
पहले लिखे गये मत के अनुसार जल आदि चार भूत प्रत्येक का एक एक
भाग था । पृथ्वी की सतह पर ३ भाग जल का है-
एकेनस्थल भागेन लक्ष्यते प्रायशो जनैः
गोल पृष्ठ चतुर्थांश स्थलेऽखिल जन स्थितः । ४७ ।
तथा एक भाग स्थल लोगों को दीखता है । इस प्रकार गोल सतह के एक
चतुर्थांश भाग स्थल में ही सभी मनुष्य स्थित है ।
लवणोदधिमध्यस्थं महाद्वीप द्वयं पृथक्
ऊर्ध्वा धराभिधं तत्र महानुद्धवोऽधरंस्तनुः । ४८ ।
२९६ सिद्धान्त दर्पण
लवण समुद्र के भीतर दो महाद्वीप अलग अलग स्थित हैं । एकं ऊर्ध्व और
दूसरा निचे का महाद्वीप ।
अधःस्थस्योत्तरार्धेन सहोर्ध्वः कथितोबुधैः
जम्बूद्वीपा ख्ययाधः स्थ द्वीपस्यार्द्धन्तुदक्षिणम् । ४९ ।
नीचे स्थित महाद्वीप के उत्तरी अंश और ऊपरी महाद्वीप को विद्वानों ने जम्बू
द्वीप कहा है । नीचे वाले द्वीप का दक्षिणार्द्ध तथा
कथ्यते ह्यासुरो भूमि र्भागैः द्वादशभिर्युतम्
तत्रषट् सागरा द्वीपा हृद देशोपमाः स्थिताः । ५० ।
१/१२ वां भाग (उत्तरार्द्ध का) और मिलाकर असुर भूमि के नाम से विख्यात
है । इसमें हृद और जनपद के समान ६ समुद्र और द्वीप हैं ।
जम्बूद्वीप स्तु बहुधा विभक्तो वर्ष पर्वतैः
तत्तन्मानानि नोक्तानि ब्रह्म सूर्यांश भास्करैः । ५१ ।
जम्बू द्वीप भी पर्वतों द्वारा बहुत से वर्षों से विभक्त है । इनका मान ब्रह्म गुप्त,
सूर्यांश पुरुष या भास्कराचार्य किसी ने नहीं कहा है ।
यत्तु विस्तृत गोलादौ वर्णितं भूधरादिकम्
तत्तदृष्टि विरुद्धत्वात् नाम्नेव गदितं बुधैः । ५२ ।
विस्तार भाव से वर्णित भूगोल आदि में वर्णित पर्वतों का वर्णन वास्तविक
नहीं है (दृष्टि विरोध है) । अतः पण्डित लोग इनका केवल नाम से ही वर्णन
करते हैं ।
तत्तच्छास्त्रो दितो मेरु कृताष्टा (८४) योजनोच्छ्रितः
कलाकृति (२५६) मितो मूल ऊर्ध्वस्थल्यां न खाग्निभिः । (३२० ) । ५३ ।
सभी शास्त्रों ने मेरु पर्वत की ऊंचाई ८४ योजन कही है । मूल भाग में इसका
विस्तार २५६ योजन तथा पृथ्वी के ऊपर इसका विस्तार ३२० योजन है ।
वर्षाचला हिमाद्र्याद्याः पञ्चाशत् योजनोच्छ्रितः
तावत् प्रस्थाश्च तत्रायं क्रियते गणितं क्रमः । ५४ ।
हिमालय आदि वर्ष पर्वतों (देश विभाजन करने वाले सीमा स्थित) में प्रत्येक
की उच्चता ५० योजन मात्र हैं । इनका प्रस्थ मध्य ५० योजन है । अत इस विषय
में एक प्रकार का गणित समझाया जा रहा है ।
यस्माद् गोलस्य शैलादि शकुंनां दूर वर्ति नाम्
व्यवधा दृश्यता मानं दृष्टि सीमा च बोध्यते । ५५ ।
इस गणित द्वारा दूर की वस्तु ओं पर्वत, शंकु आदि की दूरी, दृश्य भाग तथा
दृष्टि सीमा (पृथ्वी की गोल सतह पर कितनी दूर देख सकते हैं । आदि ज्ञात हो
"ता गोल परिधिक्षुण्णं भचक्र कलिको द् धृताः । ५८ ।"
Wait:
"ता" - 'त' with 'ा'.
"गोल" - 'ग' with 'ो', 'ल'.
"परिधिक्षुण्णं" - 'प', 'र' with 'ि', 'ध' with 'ि', 'क्ष' with 'ु', 'ण्' with 'ण' and anusvara = परिधिक्षुण्णं.
"भचक्र" - 'भ', 'च', 'क' with '्' and 'र' = भचक्र.
"कलिको द् धृताः" - 'क', 'ल' with 'ि', 'क' with 'ो', space, 'द्', space, 'ध' with 'ृ', 'त' with 'ा' and visarga (ः) = धृताः.
Wait, is it "धृताः" or "धृता"? Look at the end: there is a visarga: "धृताः । ५८ ।".
Wait, look at "द् धृताः":
'द्' has a virama: "द् धृताः".
Line 16:
"फल उत्क्रम ज्या होगी । उसका चाप करने पर वह दृष्टि मार्ग लिप्ता में"
Line 17:
"होगा । उसको भूगोल की परिधि से गुणा कर भचक्र की कला (२१,६००) से भाग"
Line 18:
"दे
२९८ सिद्धान्त दर्पण
इस ५० योजन शंकु को ५०२६ योजन की भूगोल परिधि के ऊपर स्थित
मानेंगे । पूर्व रीति के अनुसार इसके संस्कृत शंकु का मान २२५ कला होगा ।
द्विः स्थाद स्यादुत्क्रमज्या दृङ्नखा (२०२) स्तद्धनुः कलाः
दृङ् नागेशो (११८२) दृष्टि सीमा शरभै (२७५) योजनैर्मता । ६३ ।
दो स्थानों पर रखकर क्रिया करने पर इसकी उत्क्रमज्या २०२ होगी । इसकी
चापकला ११८२ ही दृष्टि सीमा का मान कला में हुआ दृष्टि सीमा का योजन
मान २७५ है (अर्थात् ५० योजन हिमालय से २७५ योजन तक की दूरी से दीख
सकता है) ।
द्रष्टृ शंक्वन्तर धरामानं चक्रकला हतम्
हृतं परिधिमानेन लब्धा भुजकला स्ततः । ६४ ।
द्रष्टा और दृश्य वस्तु (शंकु) के बीच की दूरी को चक्र कला (२१, ६००) से
गुणा भू परिधि (५०२६) से भाग देने पर भुज कला होगी ।
द्रष्टृ दृश्यान्तरे राशि त्रयोने दृष्टि सम्भवः ।
भुंज लिप्ता ज्यका वर्ग हीन त्रिज्याकृतेः पदम् । ६५ ।
इस भुजकला का परिमाण ३ राशि से कम होने पर द्रष्टा दृश्य वस्तु को देख
सकता है । भुजलिप्ता के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर उसका वर्गमूल
निकालने से
को टीज्या त्रिगुणा (३४३८) च्छोध्याशेषः स्यादुत्क्रमज्यका
अथ कोटिज्य याभ्यस्ता त्रिज्याप्तः संस्कृतो नरः । ६६ ।
कोटिज्या होगी । इस कोटिज्या को त्रिज्या (३४३८) से घटाने पर उत्क्रमज्या
होगी । इसके बाद संस्कृत शंकु को कोटिज्या से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने
पर-
स्फुट शंकु स चेदल्प उत्क्रमज्या प्रमाणतः
तदा न दृश्यते भूयान् दृश्यते व्यवधान भित् । ६७ ।
स्फुट शंकु आता है । यह उत्क्रमज्या से कम होने पर नहीं दीखता है । यह
उत्क्रमज्या से जितना अधिक होता है उतना भाग अवरोध के ऊपर दीखता है ।
उत्क्रमज्योत्झितः स्पष्टा शंकुर्दृश्य ज्यका भवेत्,
सात्रिज्याघ्नान्तरक्ष्मात्थ भुजज्याप्तोन्नतज्यका । ६८ ।
स्फुट शंकु से उत्क्रमज्या घटाने पर दृश्य ज्या होती है । इस दृश्यज्या को
त्रिज्या से गुणा कर द्रष्टा और दृश्य के अन्तर की ज्या से भाग देने पर उन्नत ज्या
होती है ।
भूगोल विवरणम् २९९
तद् धनुर्दृश्यलिमाः स्युस्तच्छंकौः क्षितिज्या परि ।
दृश्य ज्या परिधिक्षुण्णा चक्रलिमोद्धृता फलम् । ६९ ।
इस उन्नत ज्या का चाप क्षितिज के ऊपर उस संस्कृत शंकु की दृश्यकला
(२१,०००) से भाग देने पर फल-
शंको दृश्ये नतिः साथ त्रिज्याघ्नी कोटि भाजिता
दृश्य भागः स्फुटः शंको स्याद् योजन करादिकः ।
शंकु का योजन में दृश्य भाग होता है । शंकु की दृश्योन्नति होती है । इस
दृश्योन्नति को त्रिज्या से गुणा कोटिज्या से भाग देने पर फल शंकु का योजनात्मक
दृश्य भाग होता है ।
परिधिघ्नोत्क्रमज्याथ भचक्र कलिकोद्धृता
त्रिज्याघ्नी कोटि जीवाप्तां लुप्तांश प्रमिति र्भवेत् । ७१ ।
पुनः उत्क्रमज्या को भू परिधि से गुणा कर भचक्र कला से भाग दें । और
फल को त्रिज्या से गुणा कर कोटिज्या से भाग दें । फल शंकु के अदृश्य भाग
का परिमाण होता है ।
हिमाद्रीशृंग तलतः कुनृपै (१६१) योजनैः स्थिते
दक्षिणे नीलशैलेऽत्र द्रष्टुः स्थानं प्रकल्प्यते । ७२ ।
हिमाचल के शृंग तल से दक्षिण की तरफ १६१ योजन पर नीलाचल (पुरी
में श्री जगन्नाथ मन्दिर) को द्रष्टा का स्थान मानें ।
तदन्तरोत्थदे र्लिप्ताद् व्यं कांग (६९२) न्युत्क्रमज्यका
सप्ततिः (७०) कोटि जीवाष्ट रसाग्न्यग्निमिता (३३६८) भवेत् । ७३ ।
उसकी (१६१) योजना की भुजकला ६९२, उत्क्रमज्या ७० तथा कोटिज्या
३३६८ हुयी ।
पूर्वोक्तः संस्कृत शंकुः (२१५) स्फुटो रुद्राक्षिः (२११) सम्मितः
दृश्यज्याधरणी शक्र (१४१) उन्नतज्येषु खाद्रयः (७०५) । ७४ ।
संस्कृत शंकु २१५, स्फुट शंकु २११, दृश्यज्या १४१ तथा उन्नतज्या (७०५) ।
दिगाद्रयो (७१०) नतकलादेव ३३ दृश्योन्नतिस्तथा
स्फुट दृश्योन्नति वेदगुण (३४) योजन सम्मिता । ७५ ।
उन्नतज्या का चाप (७१०) उन्नतकला, दृश्य की उन्नति ३३ स्फुट दृश्योन्नति
३४ तथा
षोडशा दृश्यमानानि योजनानि गिरेर्यतः
क्षितिज्या द्वादशांशोन्नस्तत्र दृश्यो हिमालयः । ७६ ।
दृश्यमान १६ योजन हुआ । अतः क्षितिज से १२ अंश (१६ योजन का चाप)