सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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इति क्षितिज सौम्ययोः क्षिति रवि द्वयानुग्रमे
स्फुटेऽल्प फल भेदतोः भवति हि ध्रुवोऽन्यग्रमः
तथा रवि रतः परिभ्रमति सर्वत् इक्षु क्षिते
र्दधत् खेचर कक्षिकान घटतेऽन्यथा दृक् फलम् । १३३ ।
मंगल और बुध इस प्रकार रवि और पृथ्वी दोनों की परिक्रमा करते हैं । तथा
मन्द और शीघ्र दोनों दीखने के कारण यह सिद्ध है कि इन ग्रहों के अतिरिक्त
पृथ्वी और सूर्य में से कोई एक अवश्य घूमता है । यदि रवि को स्थिर माना
जाय तो इन ग्रहों का दृक् सिद्ध मान नहीं आ सकता है । अतः यह तय है कि
इन ग्रहों की कक्षाओं को साथ ले (ग्रह सूर्य का चक्कर लगाते हैं) सूर्य पृथ्वी के
चारों तरफ घूमता है ।
अति दूरग मृक्षमण्डलं तदवस्थाः खलु तारकाः स्थिराः
असमर्द्दन भस्य वस्थिता रवयश्चेति बुधैः सुनिश्चिताः । १३४ ।
पण्डितों (पाश्चात्य) का मत है कि तारा गण अत्यन्त दूर रहने के कारण उनकी
स्थिति स्थिर मालूम होती है । लेकिन सूर्य ग्रहण (सूर्य तथा सूर्य के समान अन्य
तारा गण) आकाश में अलग अलग धरातल में हैं ।
स्वगणैः परिवारितास्तः तलगन्यासम् दिनात्तदन्तरम्
क्षिति भास्कर मध्य मार्गतः ख ख खा भ्राष्ट (८,।००)गुणाधिकं भवेत् ।१३५ ।
अन्य सूर्य भी अपने परिवार (ग्रहों) के साथ हैं । सूर्य से सबसे निकट का
जो तारा (सूर्य के ही समान) है उसकी सूर्य से दूरी, पृथ्वी से सूर्य की दूरी का
(८,०००) गुणा है ।
रवितोऽपि वृहत्तनुधरा कथमेता मनुरुपिणी ध्रुवम्
उड़वः परियान्तु तत् क्ष्मा भ्रमतः तद् गति रीक्ष्यते जनैः । १३६ ।
कितने तारा सूर्य से भी बड़े हैं । वह सभी छोटे आकार की पृथ्वी का कैसे
परि भ्रमण कर सकते हैं ? अतः पृथ्वी के भ्रमण के कारण ही तारों की गति दीख
पड़ती है ।
इति चेच्छृणु मन्मते तु तास्तलग दस्त्रमुखाः कुमध्यतः
खरखाग्नि गुणार्क मध्यम श्रुति तुल्ये पथि यान्ति नित्यशः । १३७ ।
यदि इस प्रकार तर्क स्वीकार किया जाय तो मेरे मत के अनुसार मध्यम सूर्य
की दूरी से ३६० गुणा दूरी पर नक्षत्र मण्डल पृथ्वी की परिक्रमा प्रति दिन करते
हैं । (पृथ्वी से नक्षत्र मण्डल की दूरी = ३६० x रवि मध्यम कक्षा = ३६० x
७६,०८,२९४ = ६८,४७,४६,४६० योजन दूर )
यद् युग्मौंज पदान्त शीघ्र परिषे र्भागान्तरं दृश्यते
साक्षात् शीघ्र फले ततोऽस्मदुदिता सिद्धा भ चक्र श्रुतिः