सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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ब्रह्माण्ड के मूल समुद्र में स्थित विश्व जल के कारण चलने लगा, वह कोई
महावात्या आदि के कारण विचलित न होकर आकाश में उसी प्रकार रहता है।
उसके चारों तरफ पुराण वर्णित सात समुद्र, द्वीप, पर्वत आदि फैले हुए हैं। यहां
मैने ब्रह्माण्ड की कथा नहीं कही। केवल उसके आधार गत पृथ्वी, सूर्य आदि
के विषय में ही कहा।
भूगोल भ्रान्ति वादी गतचिर समये न श्रुतोऽस्माद् युगांघ्रेः
साध्वीन्द्रांशे (१४४) व्यतीते सुविरल उदितः सौगतास्या- वटाद्यः
तस्याप्रत्युक्तिमार्याः प्रतनुविदधिरे युक्तिभि र्भास्कराद्याः
साम्प्रत्यस्य तनुत्वात् प्रचुरमकर वं वाच्यं तत् प्रशान्त्यै । १५९ ।
अतीत में पृथ्वी का चलना पहले कभी सुना नहीं गया। कलियुग के १४४
वें भाग (अर्थात् कलि ३००० संवत् में या ई.पू. १०२ में) बौद्धों के द्वारा भू चलन
की सामान्य रूप से चर्चा हुई। भास्कर आदि विशिष्ट पण्डितों ने उसका उत्तर
भी साधारण तौर पर दिया। अतः इस मत के निराकरण के लिये यहां बहुत
कहना पड़ा।
सूर्य स्थैर्योक्ति सूत्रैः क्षितिगति कृतिं व्याजराजत्व माप्तः
सिद्धान्त स्वर्णगोत्रः प्रकृति मुपगतो यत्कृपा स्पर्शनोत्थैः ।
अस्माद् जिहाग्रजाग्रज्जलनिधि वसनास्तेम सद् युक्ति वह्नि-
ज्वालै र्भूयोऽपि सोऽयं कलयतु कुशलं श्री नीलाचलेन्दुः । १६० ।
स्वर्ण से उत्पन्न (स्वर्णपदक या धन बल से) सूर्य की स्थिरता तथा उसके
सूत्र (आकर्षण) से पृथ्वी के चलने का सिद्धान्त बेकार ही श्रेष्ठ सिद्ध हो गया
है। जिसकी कृपा से मेरी जीभ से सागर से घिरी पृथ्वी की स्थिरता के बारे में
अनेक युक्ति निकली और अग्नि के समान प्रज्वलित युक्ति से पृथ्वी चलने का
स्वर्ण रूपी सिद्धान्त गल गया, वह नीलाचल वासी प्रभु जगन्नाथ हमारा कुशल
करें।
इत्युत्कलो ज्ज्वल नृपाल कुल प्रसूत-
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बालबोधे
क्ष्माप्रस्थिति र्व्यरचि सप्तदश प्रकाशः । १६१ ।
इस प्रकार उड़ीसा के विख्यात् राजकुल में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा
गणना एवं दर्शन में समानता तथा बाल बोध के लिये लिखे सिद्धान्त दर्पण में
आकाश में पृथ्वी की स्थिति से सम्बन्धित १७ वां प्रकाश समाप्त हुआ।