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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२८६ सिद्धान्त दर्पण
प्रकार ज्ञानी नहीं करते । भगवान केवल न्याय के लिये क्रीड़ा करते हैं । यदि
तुम्हारी यह युक्ति है तो मेरा तर्क है कि उन्होंने मनुष्य, हाथी और घोड़ा को कम
आयु तथा कौवा, सियार आदि को अधिक आयु देकर कौन सा फल पाया अर्थात्
ये सब किसी उद्देश्य या परिणाम के लिये नहीं होते, भगवान् की इच्छा ही
एकमात्र कारण है ।
यास्ते धरेश बहिरंग तटस्थ शक्ति
युग्माद् वरा निखिल सद्गुण जीव सदम ।
सच्छक्ति रान्तर तनुः परमेश्वरस्यः
सांशैर्ग्रहैः परिभितास्ति किमत्र चित्रम् । १५० ।
भगवान् के अन्तरंग (तटस्थ) और बहिरंग दो प्रकार शक्तियों से निर्मित उनका
अभ्यन्तर शरीर पृथ्वी ही सर्व गुणी तथा सभी जीवों का स्थान है । अतः भगवान
के अंश रूप ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं, इसमें विचित्र क्या है ?
दिनाब्द क्रान्त्युत्था त्रिविधि गतिरित्यादि रवने
रसिद्धा सिद्धान्त द्रुमफल निभाभि र्भणितिभिः ।
रसास्वादादासां भवतु भवतं तुष्ट मनसां
रसाभ्रान्तित् क्रान्ति क्षितिरितरमा रतगिराम् । १५१ ।
सिद्धान्त वृक्ष के फल की तरह अनेक युक्ति द्वारा पृथ्वी की दैनिक, वार्षिक
तथा क्रान्ति-तीन प्रकार की गति खण्डित (असिद्ध हुयी) । इन युक्तियों का
रसास्वादन करने से लोगों की धराभ्रम में से उत्पन्न भ्रान्ति दूर हो ।
तुल्यक्षोदय दर्शनाज् ज्ञ कुज मान्द्य द्राक् फल प्रेक्षणा
इन्द्रांक स्थिति दर्शनाद् गुरु लघु द्रव्य स्वभावे क्षणात्
आकृष्टस्य च कर्षकाभिमुखता सिद्धैः शरा दर्शना
दुष्णांशोरिति साधितां बहु विधै र्लिङ्गै स्थिरत्वं क्षितौ । १५२ ।
पृथ्वी की स्थिरता इन चीजों से स्थिर हुयी- (१) नक्षत्र गोल में एक ही
स्थान पर उसी नक्षत्र का बराबर उदय होगा, (२२) बुध और मंगल के मन्द तथा
शीघ्र फल में मन्दकेन्द्र के कारण ह्रास और वृद्धि, (३) पृथ्वी से चन्द्र कलंक
सदा एक समान ही दीखना, (४) गुरु लघु (हल्के भारी) पदार्थ का स्वभाव देखने
से (५) आकृष्ट वस्तु आकर्षण की दिशा में जाने से (६) सूर्य का शर नहीं रहने
से आदि ।
सिद्धान्तशेखरे - नभस्य यस्कान्त महामणीनं मध्यस्थितो लोहगुड़ी यथास्ते ।
आधारशून्योऽपि तथैव सर्वाधरोधरित्र्या ध्रुवएष गोलः । इति । १५३ ।
लोहा युक्त मणि के भीतर लोहा जिस प्रकार गोल रहता है उसी प्रकार बिना
किसी आधार के सभी का आश्रय स्थल यह पृथ्वी निश्चित रूप से गोल है ।