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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूगोलस्थिति वर्णनम् २८३
भूमेः कर्कट वद् गमात्व दुदिता सा प्राङ् मुखी चेत् भ्रम-
त्यत्रापि प्रभवत्य संगति रतः क्रान्त्यन्तयो स्तर्कतः । १३८ ।
शीघ्रफल निकालते समय सम और विषय पादान्त में शीघ्र परिधि का अन्तर
१ अंश दीखता है अतः मेरे मत के अनुसार दिया गया शीघ्र कर्ण ही ठीक है ।
केंकडे की तरह पृथ्वि की पूर्व दिशा में गति तर्क संगत नहीं है यह अन्त में क्रान्ति
की आलोचना से स्पष्ट होगा ।
भू बिम्बे धनुरन्तगे यदुद यद् यन्नर्क्षमा लक्ष्यते
तस्मात् सप्त चतुर्भवान्तर गते युग्मान्त गे ऽ स्मिन्निदम्
दृश्यताष्टकलान्तरे यमदिशि स्थानादि तत् स्थूल्यता
लोकादप्यवनिः स्थिरेति मयका निश्चीयते सर्वतः । १३९ ।
पृथ्‍वी सायन मकर आरम्भ में (धनु के अन्त में) रहने के समय एक नक्षत्र
उदय होकर भचक्र (नक्षत्र मण्डल) में जिस स्थान पर दीखता है पृथ्‍वी वहां से
४७° अंश क्रान्ति अन्तर पर मिथुन अन्त (या कर्क आंरम्भ) में रहने पर अपने पहले
उदय स्थान से ८' कला (४७° / ३६०°) दक्षिण की तरफ ही दीखना चाहिये ।
यह व्यवधान विल्कुल नहीं दीखने के कारण मैं पृथ्‍वी को ही स्थिर मानता हूँ ।
भानां चक्रं चलन रहितं चेत्तदा किं चलांशा
साक्षाद् मच्छ त्य नुभव मुदग् दक्षिण क्रान्त्य सा म्यात् ।
त्वं चेद् वृषे तदपि चलनं क्रान्ति वृत्तस्य सिद्धं
न त्वं ऋक्षाणां मिति शृणु तदा तस्य सिद्धान्त मस्मम् । १४० ।
भचक्र स्थिर है और चलता नहीं यह बात भी आप नहीं कह सकते हैं ।
इसका कारण अयन गति या अयनांश है । उत्तर और दक्षिण क्रान्ति में असमानता
के कारण भचक्र का चलना स्पष्ट दीखता है । इसकी व्याख्या यदि करेंगे कि यह
क्रान्ति वृत्त के चलन के कारण है । और उसके कारण नक्षत्रमण्डल का चलन
दीखता है । तो मेरा समाधान सुनिये ।
पूर्वाचार्यैर्ध्रुव शरलवा दृष्टिसिद्धा य उक्ता
स्तत्तत्साम्यत्वपचलनाद्व स्थिरत्वेन सिध्येत् ।
प्राकालोक्ता, य इह विशिखाः सम्प्रतीक्ष्यन्त एते
तस्माच्चक्रं प्रचल दभितो भाति संक्रान्ति वृत्तम् । १४१ ।
पूर्वाचार्यों ने दृक् सिद्ध कर नक्षत्रों का ध्रुवांश और शरांश जितना कहा था
अभी भी वह उतना ही है । क्रान्ति वृत्त का चलन और नक्षत्रों की स्थिरता मानने
से ऐसा नहीं होगा । अतः क्रान्ति सहित नक्षत्र समूह हम लोगों के सामने चलता
हुआ दीखता है ।
इत्थं भाना मयन चलने निश्चिते सिद्धमेव
प्रत्यग् यानं प्रतिदिन मतो निश्चलैषा धरित्री