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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

भूगोलस्थिति वर्णनम् २८५
तद् येनाग्रं सद्गति मतस्तत् फलंकिं तथा भूत् ।
(येनानकदम्बु विशेष फलेन)
स्रष्टुः सृष्टि र्विसदृश गुणा किं मृषा भ्रान्ति कृतिः । १४६ ।
कच्चे मिट्टी के गोल पिण्ड को उसके व्यास के दो छोरों से पकड़कर घुमाने
से दोनों व्यासाग्र बिन्दु दब जाते हैं तथा उनके मध्यवर्ती स्थान फैल जाता हैं ।
इसी प्रकार पृथ्वी में भी मेरु स्थल चिपटा तथा उनके बीच विषुव वृत्त स्थल
फैला हुआ है । इससे पृथ्वी का अपने अक्ष (व्यास के चारों तरफ) घूमना सिद्ध
है । आपकी इस युक्ति का उत्तर है कि विधाता की सृष्टि में भी इसके समान कई
घटनायें हैं । इन दोनों फलों की समानता के कारण पृथ्वी के अक्ष भ्रमण की
कल्पना जरूरी नहीं है ।
भू भ्रान्त्यै भ चक्र पश्चिम गमे सिद्धे किमायास्तो
भ भ्रान्त्यै प्रवहाक्ष मारुत कृति र्विष्णोरिदं वक्ष चेत्
ईशः सर्षप पर्वतौ स्थिर चलौ कर्तुं समर्थो निजां
शक्ति व्यक्तु मिमां क्षमा मचलयत्यत्रास्ति किं दूषणम् । १४७ ।
पृथ्वी के पूर्व गति भ्रमण से नक्षत्र चक्र का पश्चिम की तरफ घूमना सिद्ध
है । यदि ऐसा था तो भगवान ने अत्यन्त परिश्रम से प्रवाह वायु द्वारा नक्षत्र मण्डल
की पश्चिम गति क्यों आरम्भ की ? इसका उत्तर है कि भगवान सरसों को स्थिर
और पर्वत को चलकर सकते हैं । अपना सामर्थ्य दिखाने के लिये उन्होंने पृथ्वी
को भी अचल कर दिया है ।
धर्माधर्म फलं प्रदान विषये नृणां त्रिलोकेशितु
र्निन्द्या दुर्घटना नतूपकरणैः खेलासु लीलाम्वुधेः
लोकस्य क्षणभंगुराल्प तनवे पाषाण रत्नादिभिः
प्राज्याया सकृतालये ष्षपि यतोदृष्टा प्रवृत्तिर्मुहुः । १४८ ।
लीलाप्रिय भगवान ने लोगों को धर्म-अधर्म का फल देने के लिए कई बार
निन्दनीय अघटनायें की हैं । लेकिन पार्थिव उपकरण में उनकी कोई निन्दनीय
घटना नहीं है । लोगों का शरीर क्षण भंगुर है लेकिन पाषाण, रत्न द्वारा अत्यन्त
परिश्रम से लोगों के निवास के लिये जो पृथ्वी बनी है, उसको भगवान स्थिर
ही रखेंगे । जिस प्रकार मनुष्य अपना स्वभाव नहीं छोड़ता, भगवान भी पृथ्वी
को स्थिर रख नक्षत्रों को घुमाने में सदा प्रवृत्त है ।
अज्ञानान्मनुजास्तथा विदधतु ज्ञानी तु सर्वेश्वरो
युक्त्या क्रीड़तु मर्हतीति तव चेदुक्तिर्मया त्रोच्यते
द्राङ् मर्त्याश्वगजादि नश्वर तया स्रष्टुः किमास्ते फलं
तेभ्यः काक शृगाल कादि सुचिर स्थित्यास्थ कार्यञ्च किम् । १४९ ।
जिस प्रकार अज्ञानी लोग घर द्वार करने आदि की चेष्टा में रहते हैं, उस