सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलस्थिति वर्णनम् २८७
वाराहेऽपि-पञ्चमहाभूतमयस्तारागण पञ्जरे महीगोलः
खेऽयस्कान्तान्तः स्थो लोह इवा वस्थितोवृत्तः । इति । १५४ ।
जिस प्रार लौह युक्त मणि के भीतर लोहा रहता है इसी प्रकार तारा मण्डल
के भीतर पांच महाभूतों से बनी पृथ्वी भी है ।
तस्मात्तिष्ठति भूः प्रयाति सविता मूर्त्या स्वमध्याख्यया
विभ्रत् खेचर चक्र मक्रम गती वैतत् क्षिता वीक्ष्यते
मत्सिद्धान्त मिमं विविच्य सकलं सन्त प्रशंसन्तुवा
निन्दन्तु श्रम वेदिनां ह्युभयथा मंस्ये कृतार्थं कृतिम् । १५५ ।
मेरी इन सभी युक्तियों के कारण मत है कि पृथ्वी स्थिर है । सूर्य अपनी
मध्यम मूर्ति द्वारा (मध्यम सूर्य) अन्य ग्रहों को साथ लेकर पृथ्वी की परिक्रमा
करता है । ग्रह समूह का कोई क्रम गमन नहीं हैं । (सभी अपने अपने रास्ते से
जाते हैं ।) परिश्रम का मूल्य जानने वाले सज्जन मेरे सिद्धान्त पर विचार करें ।
मैं इसी से कृतार्थ हो जाऊंगा । मुझे अपने मत के प्रशंसा अथवा निन्दा से मतलब
नहीं है ।
हे धीरा गणकाः समस्त सहृदो बद्धाञ्जलि र्वच्यहम्
यामेऽस्मिन्नजनिष्ट धार्ष्ट्य पटुता तां मार्हु मिच्छास्तुवः
बालानां प्रतिपत्तये किल मया सम्वाद दम्भादियम्
भूमिष्ठा गदिता यथामति भवत्तोषात् सदोषा न के । १५६ ।
हे पण्डित गणक, आप सभी के बन्धु हैं । भू स्थितरता सिद्ध करने में मेरी
विशेष धृष्टता को क्षमा करें । भू भ्रम के बदले भू स्थिरता बच्चों को समझाने के
लिए मुझे जो दीखा वहीं मैने कहा है । जगत में कौन दोष मुक्त है ? (अर्थात्
मेरी इस युक्ति में भी दोष सम्भव है ) ।
आत्मोत्कर्षः पुरुषैः सर्वथेष्यो
दिवाकरे केनचिद् घष्यमाने
तस्यास्याङ्गेन्मर्कटा कार सिद्धि
दैवाधीनो नास्ति दोष स्तदेषः । १५७ ।
मनुष्य केवल अपना उत्कर्ष चाहता है। देवता बनाते बनाते वह मूर्ति यदि
बन्दर की हो गयी तो क्या करें ? इसे विधि का विधान ही मानना पड़ेगा, मनुष्य
का क्या दोष है ?
ब्रह्माण्ड कारणाब्धौ चलतु जल बलाद् वा महावात् वेगात्
किंवा स्वामम्बरस्थं तदुपरि परित स्तात् पुराणादि सिद्धम्
सप्ताब्धिद्वीप भूमृद् प्रभृति सुविततम् नास्ति तत्रास्मदुक्ति
र्व्यक्ति भूते तदण्डोदर गत धरणी नाद्य मुद्िश्य दृश्यम् । १५८ ।