सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 381

२८४ सिद्धान्त दर्पण ·
दिव्य ज्योतिर्यदिभव लयेत्सूर्यवद् द्योतमानम्
तत् किं ध्वान्ति निशि न विलयं यात्य संरूयाहु सत्वे । १४२ ।
नक्षत्रों का अयन चलन, उनकी पूर्व से पश्चिम की दैनिक गति से प्रतीत होता
है, कि पृथ्वी स्थिर है । भूगोल (आकाश) में यदि सूर्य के समान अन्य दिव्य
ज्योति होते तो रात्रि का अन्धकार निश्चय नष्ट हो जाता (रात्रि' में अन्धकार होने से
प्रतीत होता है कि तारागण सूर्य के समान प्रकाश मान नहीं हैं ।)
यन्त्रे यस्मिन् शत गुण वृहद् दृश्यते बिम्बमारात्
तस्मिन् दृष्टाद वसु (८) कलामिते लुब्धकां तैक्ष्म्यमाजः
दुष्टदृष्टि प्रति हति रपि स्यादिव सां घ्रिमानाद्
भानो र्यन्त्रान्तर गततनो र्यद्वयोः साम्य लाभः । १४३ ।
जिस दूरवीक्षण यन्त्र से १०० गुणा बड़ा बिम्ब दीखता है उससे लुब्धक तारा
सूर्य से मात्र ८ कला दूर रहने पर भी दीखता है । सूर्य का बिम्बमान तो दोनों की
दृष्टि समान दिशा से होने के कारण अत्यन्त भयंकर तेज उत्पन्न होगा । ( अतः
हमारे सूर्य के समान आकाश में असंख्य सूर्य नहीं हैं )
दूराधिक्याद् यदि हिमरजो वाष्प संघात जाता
तादृग् ज्योतिः क्षति रिति मतिर्भाति भानां तते स्ते
तत्खेटीनां विविध सरणीभ्राजतां बिम्ब तुल्यां-
स्ताराराः किं तत्सम रुचि भृतो भ्रान्ति कृप्तं हिमाद्यम् । १४४ ।
इसके बाद यदि आपका तर्क है कि तारागण अत्यन्त दूर होने के कारण
उनका तेज हिमकणों और वाष्प आदि द्वार शोषित हो जाता है । अतः उनका
प्रकाश सूर्य की तरह तेज नहीं होता है । तो मेरा उत्तर है- नाना प्रकार की गति
करने वाले ग्रहों की तरह तारा गण कैसे उज्ज्वल हो सकते हैं । भ्रम के कारण
क्या तुषार आदि की कल्पना नहीं है ?
नेदीयस्त्वाद् यदि कुजमुखाः सुस्थिरालोकवन्त
स्ताररा दूराश्वल हिममुखैरावृताः कम्पवत्यः
दृश्यन्ते तत् क्वचिदपि घनै श्चादिताः सन्ति लुप्ताः
स्व ज्वालानां स्फुरण करणं सिद्धमग्ने रिवातः । १४५ ।
निकट में होने के कारण मंगल आदि ग्रहों का प्रकाश स्थिर है । किन्तु
तारागण दूर में हैं और हिम आदि से आवृत होने के कारण उनका प्रकाश कम्पन
करता है । (टिमटिमाता है) । आग की लपट की तरह इनका कम्पन होना
स्वाभाविक है । लेकिन आग की तरह घने तुषार आदि के कारण उनका भी
प्रकाश लुप्त हो सकता है । क्या ऐसा देखा गया है ?
व्यखेस्फीत श्रिपिट उभयो केन्द्रये भ्रान्त भूम्ना
गोलश्चित्ते स्फुरति तवचेदार्द्र मृत्पिण्ड तुल्यः ।