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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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पृष्ठ 375

२७८ सिद्धान्त दर्पण
न वास्तवो तद् घटना ग्रहेषु भवेद् गुरुत्वं यद मीषु नास्ते
केन्द्राभिकृष्टे गुरुतैव वस्तु न्युक्तं प्रसंगात्पठतां हिताय । १११ ।
ग्रहों का भार नापा नहीं जा सकता अतः उनके भार केन्द्र की व्याख्या निरर्थक
है । छात्रों और शिक्षकों के हित के लिए भार केन्द्र के प्रसंग में इसकी चर्चा की
गयी ।
भ्राम्यद्धरा पृष्ठग तुंग वेष्म शृंगस्य रेखा प्रभिमण्डलोत्था
महत्यतस्तत् पत दश्म खण्ड भू संगतिः स्यात् परत श्व किञ्चित् । ११२ ।
पृथ्वी घूमने के कारण उसकी सतह पर ऊंचे घर या पर्वत के शिखर बड़े
वृत्त में घूमते हैं । अतः उनकी गति (सतह की गति से अधिक होती है । यदि
उसके शिखर से पत्थर गिराया जाय तो वह अपने ठीक नीचे के बिन्दु से कुछ
पूर्व की तरफ गिरेगा । (पृथ्वी की गति पूर्व दिशा में है ) ।
भू भ्रान्त्य भावे पतनं महीत्थं स्यादित्यवादी यदिदन्मयुक्तम् ।
भूवायु रत्नावह नामधेयं प्रत्यग् दिशो वाति सदैव धीरः । ११३ ।
पृथ्वी नहीं घूमने से ऐसा नहीं होता यह आपका निष्कर्ष है । मेरे मत से
इसका कारण है कि आवह नामक भूवायु सदा धीर भाव से पश्चिम से पूर्व की
तरफ गति करती है ।
तत्प्रेर्यमाणा स्तृणराजवृक्षा प्रायेण पूर्वांतत भाव लक्ष्याः
पुनर्मही मध्यग रेखाकायाः प्रायोनतः प्राग् गतभूमिभागः । ११४ ।
इस वायु से प्रभावित होकर घास वृक्ष आदि प्रायः पूर्व को ओर भी थोड़ा
पूर्व की तरफ झुक जाने के कारण पत्थर थोड़ा पूर्व की तरफ गिरता है ।
अतः क्वचित् प्राचि पतेत्कदाचि दशादिकं नत्ववनि भ्रमेण
समे स्थले सावरणेतु सर्व स्याधो गति स्यादृजु रेखयैव । ११५ ।
अतः इसकी व्याख्या के लिये पृथ्वी का भ्रमण मानने की जरूरत नहीं है ।
समान स्थल में और ऊपर में आवरण रहने पर जिससे हवा का प्रवेश नहीं हो,
सभी द्रव्य ठीक नीचे की तरफ ही गिरते दिखायी देते हैं ।
यावद्दूरे यस्य यस्य ग्रहस्य ब्रध्ना मध्य स्थान मास्ते तथैव
कालेनस्याद् यावता यस्य पूर्णो भास्वद् बिम्बाभि प्रमः पर्ययाख्यः । ११६ ।
सूर्य बिम्ब केन्द्र से ग्रह केन्द्र तक दूरी को ग्रह की दूरी कहते हैं । तथा ग्रह
को सूर्य का एक चक्कर लगाने में जितना समय लगता है उसे भगण काल कहते
हैं ।
तत्खेटाक्रान्तः स्फुरद् योजनानां ये स्युर्धात द्वन्द्वजाता घनांकाः
तत्तत्कालस्यापि वर्गाङ्का ये वर्गास्याद् यो घनेनानुपातः । ११७ ।