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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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भूगोलस्थिति वर्णनम् २७३
यदि सभी ग्रहों की कक्षा के केन्द्र में सूर्य मण्डल है तो पृथ्वी से देखने पर
वह स्फुट सूर्य (१) बुध, शुक्र तथा ( २) मंगल गुरु शनि का क्रमशः
मध्यता शीघ्रता पातः सोऽस्तीति त्वं ब्रवीषिचेत्
तदापरिधिभिः स्वीयैर्दृक् सिद्धेः शीघ्र मन्दजः । ८२ ।
(१) मध्यम मान तथा (२) शीघ्रोच्च होगा । उस अवस्था में प्रत्यक्ष देखे गये
शीघ्र और मन्दपरिधि से
सर्व संस्कार शालिन्यां विहितायां स्फुटी कृतौ ।
कन्या मीन स्थिते भानौ केन्द्र चक्रान्तिक स्थयोः । ८३ ।
सभी संस्कार कर ग्रह स्पष्ट करने पर स्पष्ट सूर्य जब कन्या या मीन राशि में
हो तो उच्च के निकट स्थित (सूर्य के दूसरी तरफ के कक्षा के भाग में )
भौम भार्गवयो दृश्यः प्रभेदाः स्वस्थितेः क्रमात्
कलाभि र्द्विशरै (मं-५२) रब्धि सायकैः (शु-५४) पुनरेतयोः । ८४ ।
मंगल और शुक्र के दृक् सिद्ध मान से गणितागत मान में क्रमशः ५२ तथा
५४ कला की अन्तर पड़ता है ।
चक्रार्द्ध स्थितयो द्व्यंग बाहुभि (म २६२) विशिखामरैः (शु ३३४)
प्रभेदश्चेत्यमन्येषां दृश्यते परिधिक्रमात् । ८५ ।
पुनः यह दोनों चक्रार्द्ध (पृथ्वी की तरफ का कक्षा भाग ) में रहने पर क्रमशः
२६२ (मंगल) तथा ३३४ (शुक्र) कला का अन्तर दीखता है । इसी प्रकार अन्य
ग्रहों का भी भेद दीखेगा ।
तत्कथं सूर्य बिम्बस्य सम्भवेद् मध्यशीघ्रता
तमूरी कुर्वतः सर्वमुदयस्तत्वेन यत्नतः । ८६ ।
अतः स्फुट सूर्य को बुध, शुक्र का मध्यम तथा मंगल गुरु, शनि का शीघ्रोच्च
कैसे माना जा सकता है सूर्य को सभी ग्रहों का कक्षा केन्द्र जो लोग यत्नपूर्वक
स्थिर करते हैं उनका यह मत है ।
काकतालीयवत् क्वापि दृक् सिद्धावपि ते मतम् ।
नास्माभिर्मन्यते साधु कदाचित् कं प्रमातृभिः । ८७ ।
काकतालीय न्याय (कौवा ताल वृक्ष पर बैठने के बाद उसका एक फल गिर
पड़ा अत यह माना गया कि कौवा के कारण फल टूटा) के समान इस विधि से
अभी दृक् सिद्ध होता है । अतः यही मत ठीक है-यह मत युक्ति युक्त और सब
समय ठीक नहीं होगा । अतः यह मत मैं नहीं मानता ।
सर्वग्रहाणां भ्रमिकृत् केन्द्रस्थो मध्यमोरविः
स्वीकार्यश्चेत् तदेव स्यात् दृक् सिद्धः सार्वकालिकी । ८८ ।