सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 609 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 366

भूगोलस्थिति वर्णनम् २६९
से चन्द्र क्रान्ति मार्ग नहीं छोड़ता, बिल्कुल शर नहीं रहने पर पृथ्वी कैसे क्रान्ति
मार्ग को छोड़ सकती है ? (अर्थात् विषुव तल में कैसे गति हो सकती है ?)
खे वाक्षितं व्रजतु कुशलै घूर्णमानं दधित्थं
चक्रं चक्राम्यतु भुविदिवि स्यन्दनस्थं करस्थम् ।
पृथ्वी पृष्ठे लुठतु कठीनीगोलकः खेलया वा-
देह भ्रान्तिर्न भवति विना स्व स्व मार्गा भिमुख्यात् । ६४ ।
घूमते हुए कैथ फल को आकाश में फेंकने से, रथ चक्र को आकाश में या
जमीन पर लुढ़काने से, या खेल में गेन्द लुढ़काने से उनका अपने अक्ष पर भ्रमण
अपनी गति की दिशा में ही होता है । किन्तु पृथ्वी विषुव कक्षा में अपने अक्ष
पर घूमती है । तो उसके बदले क्रान्ति मार्ग पर क्यों गति है ?
यदि भ्रामं भ्रामं भ्रमति धरणी क्रान्ति पथगा
तिरश्चिरा भानां पतिरि वतदा वासि पुरुषैः
स्व पूर्वाद्याशास्थ द्रुम धरणि भृत् क्रोश गमने
सुलक्ष्यो दिग् भेदः प्रतिदिन मुडुनां तदुदये । ६५ ।
चन्द्र विषुव पर तिरछे रह कर अपने अक्ष पर घूमते हुए विमण्डल में चलता
है, यदि पृथ्वी भी इसी प्रकार विषुवमार्ग पर घूमते हुए क्रान्ति मार्ग पर गति करती
है तो पृथ्वी के लोग पृथ्वी पर पूर्व आदि दिशा में स्थित वृक्ष और पर्वतों की
कोण गति देखते जिस प्रकार नक्षत्रों का उदय अलग अलग दिशा में देखते हैं ।
स्व कक्षा वृत्तत्वे भवति सवितुर्मूर भिमुखी
मयास्थीः क्रान्त्युद्भावप वलय दैर्घ्याद् गति पथः
दिशोर्याम्यो दीच्यो र्गुण वद् जुरिष्टो तियदिचेत्
इतिक्षमाया दृश्यस्त नु रयन सन्धौ दिनकरः । ६६ ।
अपनी कक्षा वृत्त (अक्ष पर विषुव वृत्त में गति) के साथ साथ पृथ्वी यदि
क्रान्ति वृत्त में सूर्याभिमुखी भी हो, तो क्रान्ति वृत्त के दैर्घ्य (दीर्घ वृत्त या वलय
के लम्बा होने) के कारण क्रान्ति गति पथ उत्तर और दक्षिणी दिशा में ज्या के
समान सरल होगा (चाप के समान गोला कार नहीं) यदि मेरे मत का तुम इस
प्रकार अर्थ लेते हो तो मेरा उत्तर है कि इस अवस्था में सायन सूर्य कर्क और
मकर आदि में दूरी के कारण (दीर्घ वलय का दूर का भाग में) छोटा और मेष,
तुला के आदि में निकटता के कारण छोटा दीखना चाहिये । (पर ऐसा नहीं
होता) ।
विदुरोऽनाथ स्येत्थं विषुवति भुवः सन्निधि वशा
न्निशानाथ स्येत्थं शरसु सरलेऽपक्रमपथे
क्वसाम्पूरूयात् लक्ष्यं रजनी लक्ष्मक्षितिगतै-
र्भिभिन्नाकारं यत्तदवनि गति र्नत्र घटते । ६७ ।