सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोलस्थिति वर्णनम् २७५
वृत्त नहीं है । वरन्
तया तदेवो दिन मत्र वृत्त भासो ग्रहाणां सरणिर्यदेतत्
युक्तञ्च पातोच्च गतीक्षणार्तं क्षेपाभिरक्षात् मसुराः प्रदिष्टाः । ९५ ।
ये सिर्फ वृत्त का आभास (या उसकी अदृश्य दिशा या रेखा) हैं। इसी कक्षा
में ग्रह का शर (बिम्ब से कदम्ब प्रोत वृत्त कक्षा को जिस बिन्दु पर काटता है)
होता है । पाश्चात्य लोग जिस प्रकार ग्रह गति का कारण (सूर्य) का आकर्षण
और विक्षेप मानते हैं, उसी प्रकार हम उन्हें आकर्षण और विक्षेप शक्ति वाला
देवता मानते हैं ।
भवन्मते भूमिरियं ग्रहेभ्यो न भिद्यते तुल्यगुणा स्थितत्वात्
तथा सति स्थूलतराः पृथिव्या जीवाद्याः पातवशाद् विदूरम् । ९६ ।
यदि पृथ्वी भी अन्य ग्रहों के समान मानी जाय तो पृथ्वी से आकार में बहुत
बड़ा वृहस्पति पात के कारण बहुत दूर (उत्तर या दक्षिण दिशा में) क्यों चला
जाता है ?
विक्षेप मृच्छन्ति कथं क्ष्मा किं नक्षिप्यते शुक्र समात्व दुक्त्या ।
बिम्बानपेक्षा यदिष स्तदस्या गुरोरपि क्षुद्र इतीर्यते चेत् । ९७ ।
शुक्र के समान पृथ्वी भी सूर्य के निकट है, पर पृथ्वी का शुक्र की तरह
विक्षेप क्यों नहीं होता ? शर या पात गी गति बिम्ब मानकर निर्भर नहीं है अतः
गुरु से पृथ्वी कर शर कम होना सम्भव है ।
क्षित्यां तदापि त्रिकलेषु मर्त्यां क्रान्ति प्रभेदात् विषुवायनेषु
दृक् सिद्धभावात्तरणेर्न हि स्यात् ग्रह प्रभाकाल विलग्न सिद्धिः । ९८ ।
यदि तुम्हारे मत के अनुसार पृथ्वी का विक्षेप तीन कला माना जाय तो विषुव
और आयन स्थिति में भेद के कारण सूर्य दृक् सिद्ध नहीं होगा । फलतः ग्रहण,
छाया, समय और लग्न आदि नहीं सिद्ध हो पायेगा ।
अतः शराभावत एव साक्षान्निश्चीयते निश्चलता चलायाः
यद् गोलयोः सायन भाग यानो र्न क्रान्ति भेदोऽ पतनर्भुजैक्य । ९९ ।
पृथ्वी का शर नहीं मानने यह सब सिद्ध हो जायेगा । अतः पृथ्वी को स्थिर
मानना ही सिद्धान्त है । दोनों गोलों में सायन सूर्य का भुज समान होने पर जरा
भी क्रान्ति भेद नहीं होता । इससे भी पृथ्वी स्थिर मालूम होती है ।
यथा रवे नास्ति शरो मंते ते तथा भुवो सम्मत एव मात्थ
चेत् खेट कक्षादर पार्श्व केन्द्र स्थिते महत्वा दति भास्वर त्वात् । १०० ।
पृथ्वी की गति मानने से उसका शर मानना पड़ता है । जिससे यह गड़बड़ी
हो रही है । जिस प्रकार तुम्हारे मत से सूर्य का शर नहीं है । उसी प्रकार हमारे