सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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मत से पृथ्वी का शर नहीं है । सूर्य बिम्ब भी मध्यम सूर्य से अलग रहता है,
इस कारण तुम सूर्य का शर क्यों नहीं मानते हो ?
भानोग्रहेभ्यो बहु भेद लाभात् प्रत्यक्षतेऽमानि मयेह भाव ।
बुधा दि साधर्म्यजषः पृथिव्याः सचेन्निसर्गादचलैव सा स्ताम् । १०१ ।
तुम्हारा मत है कि सूर्य के बाकी ग्रहों के समान पृथ्वी भी है, केवल एक
अन्तर है कि और ग्रहों की तरह पृथ्वी का शर नहीं है । इसी तर्क से मेरा मानना
है कि बाकी सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा करते हैं, पर पृथ्वी स्थिर है । स्वभाव
से ही पृथ्वी अचल है, इसमें आपको आपत्ति क्यों ?
भू धर्मिणो भौम मुखा यदि स्युः सर्वर्तुमन्तस्तदिमान् किमन्तः
स्ववारि वाष्पोद् भव मेघ संघा नाच्छादयन्त्यर्क मया शशीव । १०२ ।
यदि मंगल आदि ग्रहों का गुण पृथ्वी के समान ही है और इनमें भी पृथ्वी
की तरह ६ ऋतुएं हैं तो अमावस्या में जिस प्रकार चन्द्र सूर्य को ढंक लेता है और
उसी प्रकार उन ग्रहों के पिण्ड से निकले वाष्प के मेघ पृथ्वी और ग्रह के बीच
आवरण का कार्य करते । वह क्यों नहीं होता ?
मृण्मयसौ भूर्महती ग्रहास्ते तोयात्मकाः क्षुद्र निजप्रमाणाः
विरुद्ध धर्मावत एव पृथ्वी तारा ग्रहों स्तास्तु चलौ क्रमात् स्तः । १०३ ।
बुध शुक्र का बिम्ब जलीय है, पृथ्वी का बिम्ब मिट्टी का और उन से बड़ा
है । इससे स्पष्ट है कि ग्रह समान धर्मी नहीं है । अतः पृथ्वी को स्थिर और बुध
आदि को चल मानने में कोई असंगति नहीं है ।
भास्वत् करोत्तप्त मृदन्ति कस्सा दुद् गत्य वाष्पाणि जलाद् घनाः स्युः
न केवलात्तोयमय ग्रहेषु तत्सम्भवो वस्तुत एव नास्ते । १०४ ।
मिट्टी के निकट का जल सूर्य की गर्मी से वाष्प बन जाता है । जिससे मेघ
होता है । अन्य ग्रहों का केवल जलीय बिम्ब होने से उन परं वाष्प नहीं बनता
अतः मेघ नहीं दीखता । (यह सभी बातें पूर्णतः गलत हैं)
यष्ट्य ग्र युग्म प्रथिताल्प भूरि मृत्पिण्डयो र्यंत्रधृतौ तुलास्यात्
तद् भार केन्द्राख्य मदोर्यतेऽस्यां स्थान भ्रमेतद् ग्रहणात् वृत्ते । १०५ ।
एक डण्डे के दो छोरों पर क्रमशः बड़ा और छोटा पिण्ड लटकाने से जिस
स्थान पर डण्डा पकड़ने से डण्डा समतल रहता है, उस स्थान को भार केन्द्र
कहते हैं । उस भार केन्द्र को सूत्र से लटका कर घुमाने से
क्षुद्रस्य पिण्डस्य वृहत्प्रमाणं स्यान्मण्डलं भ्रान्ति भवं गुरोस्तु
अल्पायतं तद्धरणी तरण्यो रस्यां क्रियायां परिकल्पितायां । १०६ ।
छोटा पिण्ड बड़े वृत्त में तथा बड़ा पिण्ड छोटे वृत्त में भ्रमण करेगा । पृथ्वी