सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
२३६ सिद्धान्त दर्पण
कालेन यावता यावल्लभ्यतेऽप्यक्रमान्तरम्
तत्षष्टि गुणितं तत्तकाल नाड़ी हतं गतिः । ३२ ।
संस्कृत काल के क्रान्ति अन्तर को इष्ट नाड़ी से गुणा कर द्वितीय क्रान्ति गति
से भाग देने पर घटिका फल से संस्कृत समीकरण काल का पुनः संस्कार करेंगे ।
इष्ट काल के क्रान्त्यन्तर को ६० से गुणा कर इष्ट काल से भाग देने पर क्रान्ति
गति होगा ।
असकृत् कर्म संसिद्ध काल भुक्त्यपमान्तरैः ।
क्रान्त्योः साम्यं यदा स स्यात् मध्यः कालोऽन्तिमा गतिः । ३३ ।
इस प्रकार बार बार करने से इष्ट काल के क्रान्ति की अन्तर गति जो होगी,
उससे उस समय के रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति में समानता आयेगी । वही
पात मध्य काल होगा । अन्तिम गति पात मध्यकाल की क्रान्ति अन्तर गति होगी ।
पूर्णो योगस्तदैव स्याद् बिम्बयोर्मध्य विन्दुजः
स्थिति काला वगतये स्पर्शमोक्षौ ब्रुवेऽधुना । ३४ ।
पात के आदि से अन्त तक पूरा समय जानने के लिए पात के स्पर्श और
मोक्ष के बारे में मैं अब कहता हूँ ।
पूर्व वद् बिम्ब योर्मान योगार्द्ध रवि चन्द्रयोः ।
आनीयाभ्ररसा (६०) भ्यस्तं क्रान्ति गत्यन्त्ययो भजेत् । ३५ ।
चन्द्र ग्रहण की विधि से पात मध्य कालीन रवि और चन्द्र का बिम्ब निकाल
कर उनका मानैक्यार्द्ध (बिम्ब मान के योग का आधा) निकालेंगे । उसे (मानैक्यार्द्ध
को ६०) से गुणा कर अन्तिम क्रान्ति गति से भाग देंगे ।
लब्धा भवन्ति पातस्य मध्य स्थित्यर्द्ध नाड़िकाः ।
मध्य कालस्तदु नाड्य स्पर्शो मोक्षस्य मध्यमः । ३६ ।
फल पात की मध्यम स्थिति अर्द्ध नाड़ी होगी । पातमध्य काल से इसे घटाने
पर मध्यम स्पर्श काल तथा पात काल में मध्यम स्थिति अर्ध जोड़ने पर मध्यम
मोक्ष काल होगा ।
तत्काल प्रभवाकेंन्दु स्फुट क्रान्त्यो यदन्तरम्
तन्मान योगदलतो न्यूनं चेत् स्पर्शको गतः । ३७ ।
पुनः तत्कालीन रवि और चन्द्र की स्फुट क्रान्ति का अन्तर करेंगे । यह
मानैक्यार्द्ध से कम होने का अर्थ है कि स्पर्श समय बीत गया है (या मोक्ष होने
वाला है ।
मोक्षो भावो यदा तस्मात् बहुक्रान्ति द्वयान्तरम् ।
स्पर्शो भावो गतो मोक्षस्तत् क्रान्त्यन्तर लिप्तिकाः । ३८ ।
महापात वर्णन २३७
मानैक्यार्द्ध से क्रान्ति अन्तर अधिक होने पर स्पर्श होने वाला है ऐसा समझेंगे।
(या मोक्ष बीत चुका है)
खरसे (६०) गुणिता मध्य स्थित्यर्द्ध घटिका हताः
लब्धा भुक्ति कलाः स्पर्श मोक्षोत्थ प्रथमा मताः । ३९ ।
मध्यम स्पर्श और मोक्ष कालिक क्रान्ति अन्तर कला आदि को ६० से गुणा
कर मध्यम स्थिति अर्द्ध घटिका से भाग देने पर प्रथम स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति कला आयेगी ।
मान योगार्द्ध विकलास्तद् भक्ताः स्पर्श मोक्षजा
स्थित्यर्द्ध नाड़िका मध्ये हीनाढ्या समये पुनः । ४० ।
स्पार्शिक या मौक्षिक मानैक्यार्द्ध विकला को क्रमशः स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति गति कला से भाग देने पर स्पर्श और मोक्ष की स्थिति अर्ध नाड़ी आयेगी ।
इसको पात मध्य काल में घटाने और जोड़ने से क्रमशः स्पर्श और मोक्ष काल
आयेगा ।
तत्काल क्रान्ति विवर लिप्तिकाः षष्ठि ताड़िताः
द्वितीय स्थिति खण्डाप्ताः लब्धा भुक्तिरिति क्रमात् । ४१ ।
पुनः इस स्पर्श और मोक्ष काल के क्रान्ति अन्तर कला को ६० से गुणा कर
क्रमानुसार द्वितीय स्पार्शिक तथा मौक्षिक स्थितिअर्द्ध घटी से भाग देने पर द्वितीय
स्पार्शिक तथा मौक्षिक क्रान्ति गति (अन्तर) होगा ।
तत्क्रान्त्यन्तर योगार्द्ध साम्ये स्पर्श विनिर्गमौ
भवेतां सुस्थिरौ स्पष्टौ दण्डाश्च स्थिति खण्डजाः । ४२ ।
इस प्रकार बार बार करने से स्पार्शिक और मौक्षिक क्रान्तिअन्तर तथा स्पार्शिक
और मौक्षिक मानैक्यार्द्ध समान होने पर स्पर्श और मोक्ष काल स्थिर होगा । उससे
स्थित्यर्द्ध नाडिका आदि भी स्थिर होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालोज्ञेयोऽति दारुणः ।
प्रज्वल ज्वलनाकारः सर्व कर्मेषु गर्हितः । ४३ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) पात के आरम्भ से अन्त तक का समय प्रज्वलित अग्नि
के समान अत्यन्त उग्र है तथा इस अवधि में (विवाह, उपनयन आदि) सभी शुभ
कार्य निन्दनीय हैं ।
एक काष्ठा गतं यावदर्केन्दो मण्डलान्तरम्
सम्भवस्ताव देवास्य सर्व कर्म विनाश कृत् । ४४ ।
रवि और चन्द्र की एक ही क्रान्ति होने पर पात की उत्पत्ति होती है । पात
होने से सभी शुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं ।
२३८ सिद्धान्त दर्पण
स्नान दान जप श्राद्ध व्रत होमादि कर्मभिः
प्राप्यते सुमहत् श्रेयः तत् कालज्ञानतः तथा । इति । ४५ ।
पात का समय जान कर उस समय ग्रहण काल के समान स्नान, दान, जप,
श्राद्ध, व्रत और होम आदि करने से अनेक प्रकार का मंगल होता है । (उद्धरण
समाप्त)
मध्यमः स्थिति कालोऽस्य प्रहर द्वितीयं भवेत्
नव दण्डात्मकोन्यूनः सत्र्यंशाहर्द्वयं (२।२०) महान् । ४६ ।
पात का मध्यम स्थिति काल दो प्रहर अर्थात् १५ दण्ड होता है । न्यूनतम
स्थिति काल ९ दण्ड तथा अधिकतम स्थिति काल (२।२० ) दिन होता है ।
चक्रान्ते चन्द्र पातोच्चौ रविश्चक्रान्त सन्निधौ
चन्द्रश्चेद् भार्द्धगस्तत्र पातस्याल्पस्थिति र्भवेत् । ४७ ।
१२ राशि के अन्तिम भाग में चन्द्र का उच्च तथा पात रहे, १२ राशि के निकट
सायन रवि तथा ६ राशि के निकट सायन चन्द्र होने पर पात का स्थिति काल
अत्यन्त कम होता है ।
चन्द्रोच्च पात शशिनो यदिस्सुः कर्कटादिगाः
धनुरन्त्यां श्रितो भानु स्तदा स्यात् सुचिर स्थितिः । ४८ ।
चन्द्र का उच्च, पात और स्वयं चन्द्र (सायन) यदि कर्क राशि के आरम्भ में
हों, (सायन) सूर्य धनुराशि के अन्तिम पाद में हो तो पात का स्थिति काल दीर्घ
होता है ।
पातोऽत्र द्वित्रिभागोनः स्यात् चेत् द्विः सन्निधौ भवेत ।
अयनान्ते विधोर्न स्याद् गजाक्षं (२८) शाधिकेऽपमे । ४९ ।
चन्द्र का पात यदि कर्क के आरम्भ में रहने के बदले मिथुन राशि के २८
अंश से कर्क के १ अंश के बीच में रहे तो अति कम समय में २ बार क्रान्ति
साम्य होता है । अयन समाप्ति के समय यदि चन्द्र की स्पष्ट क्रान्ति २८ अंश से
अधिक हो तो उसका क्रान्ति साम्य बिल्कुल नहीं होता है ।
अत्र विक्षेप जो ग्राह्यो गोल भेदः सितद्युतेः
महापात वर्णन २३९
स्फुट क्रान्ति के लिये यह (अयन, भेद) लिया जाता है । गोल सन्धि में स्फुट
क्रान्ति का शर के कारण अयन भेद नहीं होता । किन्तु अयन सन्धि में क्रान्ति
गति का शर गति के कारण अन्तर पड़ता है । इसका कारण है गोल सन्धि में
क्रान्ति गति अधिक और अयन सन्धि में कम होती है ।
याम्य सौम्येऽयने चन्द्र सौम्य याम्य गतिः शरात्
दृष्टाप्ययन साम्मुख्या भावान्नायन भिन्नता । ५२ ।
दक्षिण और उत्तर गोल में शर के कारण चन्द्र की क्रमशः उत्तर और दक्षिण
गति (स्फुट क्रान्ति की उत्तर और दक्षिण गति) दीखने पर भी आयन के अनुसार
दिशा का अन्तर नहीं होता है ।
पातेन दूरतः खेटो विक्षिप्तोऽपि स्वपार्श्वयोः
न त्यजेत्क्रान्ति वृत्तस्य साम्मुख्यं हि कदाचन । ५३ ।
पात द्वारा ग्रह (चन्द्र) क्रान्ति वृत्त के दक्षिण और उत्तर की तरफ विशेष
विक्षिप्त होने (फेंके जाने) पर भी वह क्रान्ति की दिशा में ही चलता रहता है ।
क्रान्ति वृत्त की दिशा में गति नहीं बन्द होती, कितना भी अधिक शर क्यों न
हो ।
वराह मिहिराचार्ये वृहद् यात्रा ह्वये श्रुते
व्यवस्था विहिता सैव बहु युक्त पुरः सरम् । ५४ ।
वृहद्यात्रा नामक ग्रन्थ में वराह मिहिराचार्य ने महापात (वैधृति तथा
व्यतीपात) की गोल और अयन व्यवस्था का बहुत युक्ति युक्त वर्णन किया है ।
रवीन्दु योगतो योगो ये सप्त विंशतिः पुरा
साधिता स्तत्र यो सप्त विंश सप्तदशा विमौ । ५५ ।
पहले ग्रह स्फुट अध्याय में रवि और चन्द्र की राशि आदि योग के अनुसार
२७ योगो का वर्णन किया गया है । इन २७ योगों में २७ वां तथा १७ वां योग-
वैधृति व्यतीपाताख्यौ योगावत्यन्त दारुणौ
तौ हि खार्जुर चक्रैकार्गलगार्केन्दु दृग् भवौ । ५६ ।
क्रमशः वैधृति तथा व्यतीपात कहे जाते हैं । जो कि अत्यन्त दारुण योग हैं ।
सूर्य और चन्द्र क्रान्ति होने से) खार्जुर चक्र में एक लकड़ी से बंधे (तेल पेरने की
घानी या अन्न का दाना अलग करने की लिए बैलों की जोड़ी) रहने से दोनों
अत्यन्त क्रुद्ध होते है और उनकी दृष्टि से यह दो योग उत्पन्न होते हैं ।
सूर्य सिद्धान्ते- सार्पे (९) न्द्र (१८) पौष्ण (२७)
धिष्ण्या नामन्त्याः पादाभ स्कन्धयः
तदग्रभा (१०।१९।१) द्यपादाद्धं गण्डान्तं
नाम कीर्त्यते । इति । ५७ ।
२४० सिद्धान्त दर्पण
अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र के अन्तिम पाद में राशि और नक्षत्र की
सन्धि होने के कारण इनके अन्तिम पाद को गण्ड कहा जाता है। इनके अगले
नक्षत्रों (मघा, मूल तथा अश्विनी) के प्रथम पाद अर्द्ध को गण्डान्त कहा जाता
है।
दृष्टा लग्न नवांशक इह मयो च्यते कुलीरे झषे
कीटेन्त्या हरिचाप मेष मुखगा मीनाज सम्बन्धिनः
तेखण्डान्त भ सन्धि पात सदृशाः सर्वेषु कर्मस्वपि
त्याज्या विष्टि मुखास्त्वनिष्ट निकरा होरागमोक्ताः पुनः । ५८ ।
राशि संधि के दोष में शुभ कर्म सब प्रकार से त्याज्य हैं। कर्क, वृश्चिक और
मीन राशि का अन्तिम (९ वां) नवांश मीन राशि में होता है। सिंह, धनु और
मीन का प्रथम नवांश मेष आदि में पड़ता है। अतः ये सभी भी नवांश दोष युक्त
हैं। ये नवांश गण्डान्त की तरह राशि और नक्षत्र की सन्धि में पड़ने के कारण
इनमें सभी शुभ कर्म त्याज्य हैं। विष्टि आदि अनिष्ट कारक करण भी त्याज्य हैं।
होरा शास्त्र में इनको अनिष्ट कर कहा जाता है।
प्राक् कल्पे भूग्रहादि स्थिर चर सृजतः खाभ्र वेदाद्रि वेदा (४७,४००)
दिव्याब्दा ये व्यतीय सरसिज जनुषः प्रत्यहं पर्ययाणाम् ।
तावत् कालात् प्रवृत्ते रितर दिने मुखाद्यात् सौराब्द संघा
सृष्ट्याब्दाः सृष्टि कालव्यवकलन वशादूक्त पूर्वा ममोति । ५९ ।
चराचर सृष्टि करने में ब्रह्मा को ४७,४०० दिव्य वर्ष लगे, जिस समय को
सृष्टि काल या सृष्टि वर्ष कहते हैं। सृष्टि वर्ष समाप्त होने के अगले दिन से ही
ग्रह, उच्च और पात आदि का भगण आरम्भ हुआ। अतः मैंने पहले ही लिखा है
कि ग्रह साधन करने के लिए कल्पवर्ष से इतना सृष्टि वर्ष घटाया जायेगा।
सृष्ट्यन्ते चैत्र शुक्ल प्रतिपदि यम को ट्युद् गमे तिग्मभानो-
स्तद् वारे सोच्च पाता खिल गगन चराश्चक्रवक्त्रे नियुक्ताः
तस्मादस्राब्द मासापम भगण मुखा यौग पद्यात् प्रवृत्ताः
किञ्च ब्रह्महरादेर्युग मनु घटिका मात्र मन्यत्र किञ्चित् । ६० ।
सृष्टि वर्ष की समाप्ति पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि आरम्भ हुयी। यमकोटि
पत्तन नगर में सूर्य का उदय (लंका में मध्य रात्रि) थी। यह दिन रविवार माना
गया है। इस समय ब्रह्म ने ग्रह, उच्च, पात आदि को अपनी अपनी कक्षा में गति
आरम्भ करने के लिए अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु (मेष आदि विन्दु) से छोड़
दिया। ठीक इसी समय से दिन, मास, वर्ष, क्रान्ति और भगण आदि की प्रवृत्ति
आरम्भ हुई। ब्रह्मा के दिन से इन सबका आरम्भ नहीं हुआ। उस समय से केवल
घटी, युग और मनु आदि की उत्पत्ति हुयी।
महापात वर्णन २४१
ये प्रोक्ताः सदसत्फलाय जगतः श्री व्यास पित्रादि भो
राजाद्या जलदाः सदादिपतयो भागाः सुयोगादयः
भावाभाव जुषा नदृष्टवशतः तत् तत् फलानां मया
कादीचित्कतया नतेत्र गदिता स्त्यक्ताश्च सिद्धान्तिभिः । ६१ ।
पराशर आदि ऋषियों ने जगत के शुभ अशुभ फल के लिये राजा, मन्त्री और
पालक, द्रोण और पुष्कर आदि मेघ, आटका धिपति, अग्नि, वर्षा और व्याधि
आदि का भाग, राज योग और अधिराज योग आदि का वर्णन किया है । ये सब
कभी कभी वर्णित फल देते हैं । कभी नहीं भी देते हैं । यह सोचकर मैने इनके
विषय में नहीं लिखा है । अन्य सिद्धान्त ग्रन्थों में भी इनके बारे में नहीं लिखा
है ।
यत्सूर्येन्दो र्भगण विरतिः स्याद् युगे तत् कृतां (४) शे
निःशेषत्वं क्षिति दिनततो द्वापरान्त प्रसिद्धाः
सृष्टे रब्दायुगकृत (४) लवे (१०,८०,०००) नोद्धताः शेष शून्याः
स्तस्मात् नोक्त स्तपन शशिनो द्वापरान्त ध्रुवोऽत्र । ६२ ।
प्रति महायुग के अन्त में सूर्य और चन्द्र का भगण पूर्ण होता है । इस महायुग
के १/४ अंश (१०,८०,०००) वर्ष में भी सावन अहर्गण पूर्ण होता है । महायुग के
एक पाद में) इनकी ( सावन अहर्गण की) संख्या (३९,४४,७९,४५७) है । द्वापर
अन्त तक बीते सृष्ट्यब्द (१,९५,५८,८०,०००) को (१०,८०,०००) से भाग देने पर
लब्धि (१८११) तथा शेष शून्य होता है । इस कारण द्वापर अन्त में रवि और चन्द्र
का ध्रुव कहने की आवश्यकता नहीं है ।
सृष्ट्यब्दानां कलि गत समानां दिनौघ सुमेलः
स्यान्मध्यार्क क्रिय मुख गतावत्र तत् पूर्वघस्रे,
चैत्राद्युक्ता दिनगतियुता स्वे ध्रुवाः पञ्जिकादौ
सौरे तुल्याः करण शरदां तद्दिनां गार (३) वारात् । ६३ ।
मध्य सूर्य मेष आदि में प्रवेश करने के समय (उस दिन का) सृष्टि आरम्भ
से द्वापर अन्त तक गत वर्ष (१,९५,५८,८०,०००) एवं कलि गत वर्ष (४९७०)
(१८६८ ई. करणाब्द) का अहर्गण क्रमशः (७,१४,४०,२२,९६,६२७) तथा
(१८,१५,३३४) है । दोनों की वार शुद्धि ठीक है ।
करणाब्द के आरम्भ में मध्यम रवि मेष मे प्रवेश करने के पहले दिन मध्यम
मान से चैत्र शुक्ल प्रति पदा था । उस दिन का जो ध्रुव आदि कहा गया है ।
उसमें (ग्रह की दैनिक गति) जोड़ने से पञ्जिका में वह सूर्य सिद्धान्त के अनुसार
मध्यम ग्रह का ध्रुव होगा । करणाब्द अहर्गण का वार आदि मंगल वार से आरम्भ
होगा ।
२४२ सिद्धान्त दर्पण
चान्द्रे वारे व्यरचि करणाब्दादि राद्या (१) तिथियाँ
सावैशाखे यदपि मलिने स्पष्ट सूर्येन्दु जेऽभूत्
मध्यार्केन्दूद् भव मलिन मासस्य पूर्ण गतत्वा
तस्याः खेट ध्रुव समुचितः शुद्ध चैत्रादि भावः । ६४ ।
करणाब्द का पूर्व दिन मैंने सोमवार माना है । यह दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
था । स्पष्ट मान से यह वैशाख अधिमास की प्रतिपदा थी । इस करणाब्द आरम्भ
दिन के पहले मध्यम मान का वैशाख अधिमास पूर्ण हो जाने से यह चैत्र प्रतिपदा
शुद्ध माना गया और यही शुद्ध शुक्ल प्रतिपदा सोमवार दिन ग्रह पात आदि का
ध्रुव कहने के लिये अत्यन्त उपयुक्त है ।
एतत् पूर्वं सपद् कृत देवार्ध भृधृत्यहोभि (१८,१५,३३४।१५)
र्या कल्यादौ मधु मुखति थिस्तुल्य मध्येन्दिनोत्था
प्राग्भि प्रोक्ता ध्रुव गण युता सास्फुटे माधवोऽभूत्
तत् खेटादि ध्रुव निगमने मध्य मध्यादिरिष्ट । ६५ ।
करणाब्द आरम्भ से (१८,१५,३३४-१५) दिन पहले कलियुग का आरम्भ लंका
की अर्द्ध रात्रि में हुआ था । उस समय मध्यम मान का चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्राचीन
सिद्धान्तियों के मत से था । पुनः अब करणाब्द (१८६८ ई.) का प्रथम दिन स्पष्ट
मान से वैशाख में पड़ रहा है । यह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा निकालने के लिये द्वापारान्त
ध्रुव जोड़ना पड़ेगा । इससे लगता है कि ग्रह, उच्च और पात आदि का ध्रुव कहने
के लिये मध्य और स्पष्ट काल जानना होगा ।
कल्यब्द वेदकृत खगुणै (३०४४) रुनिता विक्रमा ब्दा
स्तेशाकाब्दाः शर गुण कुभि (१३५) स्तेकु पक्षाग्न चन्द्रेः (१०२१)
शास्त्राब्दास्तेऽपिच विधुशरै (५१) र्भास्करीयाब्दकाः स्यु-
स्तेनागेन्द्रे (१४८) रधृति नगै (७१९) कौचना दार्पणाब्दाः । ६६ ।
कलि गत वर्ष से ३०४४ वर्ष घटाने पर वर्तमान विक्रमाब्द होगा । विक्रमाब्द
से १३५ वर्ष घटाने से शकाब्द होगा । शकाब्द से १०२१ घटाने से भास्वती अब्द
होगा ) भास्वती शास्त्राब्द से ५१ वर्ष कम या विक्रमाब्द से १२२१ वर्ष घटाने से
भास्कराब्द होगा भास्कराब्द से १४८ घटाने से कुचनाब्द तथा भास्कराब्द से ७१९
घटाने से दर्पणाब्द (सिद्धान्त दर्पण का) होगा ।
यस्मिन् खेटानयन मुदितं सृष्टिजाद्यहर्गणेभ्यः
सिद्धान्तोऽसौ युगदिन गणात् यद्गतन्त्रं तदेव
यस्मिन् शाकाद्यभिमत समा वासरे व्यस्तयुक्तं
शास्त्रं प्राज्ञैः करण मिति तत्कार्य मत्रास्ति सर्वम् । ६७ ।
जिस (ग्रन्थ) में सृष्टि आदि के अहर्गण द्वारा ग्रह साधन का वर्णन हो उसे
सिद्धान्त कहते हैं । युगादि अहर्गण से जो ग्रन्थ ग्रह साधन करे उसे तन्त्र कहते
महापात वर्णन २४३
हैं । शाकाब्द या किसी अन्य (निकट के) वर्ष से अहर्गण साधन कर उससे ग्रह
निकालने की विधि जिस ग्रन्थ में हो उसे करण ग्रन्थ कहते हैं । इस सिद्धान्त
दर्पण में तीनों ही विधियां हैं ।
नृणां पापं दश दिन कृतं हन्ति सिद्धान्त वेत्ता
दृष्टः सद्यः त्रिदिन जनितं तन्त्रवेत्ता निहन्ति
एकाहोत्थं करण निपुणे यस्तु शास्त्रानभिज्ञ
कालं वृत्ते बहु वृजिनदः सोऽत्र नक्षत्रसूची । ६८ ।
सिद्धान्त ज्ञाता का दर्शन करने से दस दिन का पाप नष्ट होता है । तन्त्र वेत्ता
से ३ दिन का तथा करण जानने वाले के दर्शन से १ दिन का पाप नष्ट होता है ।
जो बिना ज्योतिष जाने काल की चर्चा करता है । वह नक्षत्र सूची है । और उसे
देखने से बहुत पाप होता है ।
चन्द्रं मन्दान्त्रि भसमधिकं प्रेक्ष्य पक्ष्यार्द्ध सिद्धं
द्वित्रिशाढ्या यदिह गदिता सम्मता यत्तथान्यै
चक्रे ऽ जादि स्थितिरपि पृथक्सम्मता यत्तथान्यै
रप्रामाण्या तदखिल मुपादत्तनौ चित्तमाम्रयाः । ६९ ।
भास्कर आदि कई ज्योतिर्विदों ने स्फुट चन्द्र को पक्ष अर्द्ध में मन्द (शनि) से
३ राशि अधिक देखकर अपने सिद्धान्त गणित (सिद्धान्त शिरोमणि) में नक्षत्र ध्रुव
में १/३ अंश जोड़ दिया । अर्थात् उन्होंने स्वयं स्फुट कर प्रत्यक्ष नहीं किया था ।
अन्य कई ज्योतिषियों ने मेष का आदि बिन्दु अलग अलग स्थानों में स्वीकार
किया है । प्रमाण के अभाव में मैने यह स्वीकार नहीं किया है ।
कैश्चित् प्रोक्तं नलिन जनुषः स्वायुषोऽर्द्धं व्यतीतं
कैरप्येतत् पतन मुनिभिः सार्द्ध वर्षाष्ट का द्वयं (८ १/२) ।
तद् वैतद् वा भवतु न ततः कोऽपि लोकोपयोगः
कल्पस्यास्य द्युचर गणितं स्यादिदं तन्मुदेवः । ७० ।
कई के मत से ब्रह्मा की परमायु का आधा (५०) तथा कुछ अन्य विशिष्ट
ऋषियों की मत से (५८ १/२ वर्ष) साढ़े ८ वर्ष अधिक) बीत गया है । इसमें
कोई भी मत ठीक हो उसका कोई लोक व्यवहार में उपयोग नहीं है क्योंकि ग्रह
गणित का वर्णन वर्तमान कल्प (दिन) से ही होता है-आप लोग इसी से सन्तुष्ट
हों)
यस्येच्छा मे निज भजन तो दूर मुत्सार्य बुद्धिम्
दै वाधीनां गणित विपणौ पात यत्यात तायाम्
संख्यातीता नु गत पति तो द्वार कारुण्य सिन्धुः ।
सस्याच्छेतः शरण चरणः सिन्धुजा प्राणबन्धुः । ७१ ।
जिससे मेरी बुद्धि को विष्णु भजन के प्रिय कर्म से दूर गणित बाजार में ठेल
२४४ सिद्धान्त दर्पण
दिया है तथा इच्छा के विरुद्ध मेरी बुद्धि जिनके अधीन काम कर रही है वही
कृपासिन्धु समुद्रतनया लक्ष्मी के प्राण बन्धु के चरण युगल मेरी बुद्धि के आश्रय
स्थल हों (जिससे वह दिग्भ्रमित न हों) क्योंकि उस महाप्रभु जगन्नाथ असंख्य
पतितों का उद्धार करने वाले करुणा के समुद्र हैं ।
इत्युत्कलो़ज्वल नृपाल कुल प्रसूत
श्री चन्द्र शेखर कृतौ गणितेऽक्षि सिद्धे ।
सिद्धान्त दर्पण उपाहित बाल बोधे
यातः सपाट इह पञ्चदशः प्रकाशः । ७२ ।
इस प्रकार उड़ीसा के उज्ज्वल राज वंश में उत्पन्न श्री चन्द्र शेखर द्वारा गणना
और वास्तव में समानता तथा बालकों के ज्ञान के लिए लिखे सिद्धान्त दर्पण में
पात वर्णन सम्बन्धी १५ वां अध्याय समाप्त हुआ ।
इति मुदित सुधीरे शुद्ध सिद्धान्त पूर्वे
नयन विषय सिद्ध व्योमगे दर्पणेऽस्मिन्
त्रिभिरिद मधिकारैः (३) पञ्चभूमिः (१५) प्रकाशै
र्ग्रहगणित समाख्यं पूर्वमर्द्धंयं समाप्तम् । ७३ ।
इस प्रकार ३ अधिकार के १५ प्रकाश सहित सिद्धान्त दर्पण ग्रन्थ का पूर्वार्द्ध
समाप्त हुआ जिसमें विद्वानों के आनन्द के लिये दृक् सिद्ध ग्रह गणित तथा शुद्ध
सिद्धान्त है ।
षोडशः प्रकाशः
गोलाधिकारः
प्रश्न वर्णनम्
यत्पादाम्बुरुह प्रसक्त हृदया ब्रह्मादयोऽनास्थया
कालेऽन्यत्र च नेत्र साम्य विरहात्तत्र द्विरागायवा
शिष्य प्रश्न वशात्च सूक्ष्मवचसा सिद्धान्त जातं जगुः ।
सर्वज्ञा अपि मादृशा इव नम स्तस्मै जगत्स्वा मिने । १ ।
जिनके चरण कमलों में ध्यान रख कर ब्रह्मा वशिष्ठ आदि ज्ञानियों ने समय
समय पर पहले के सिद्धान्तों में त्रुटि दीखने से उत्पन्न अनास्था के कारण नये
सिद्धान्त ग्रन्थों की रचना की एवं शिष्यों के प्रश्नों का सूक्ष्म विश्लेषण कर उत्तर
दिया तथा सर्वज्ञ होने पर भी मेरे (सामन्त चन्द्रशेखर की) भांति छोटे छोटे सिद्धान्त
ग्रन्थ लिखे, उसी जगत के स्वामी महाप्रभु जगन्नाथ की वन्दना करता हूँ ।
यश्चक्षुर्ग्रहपति मोऽपि गगने गृह्णन् ग्रहाणां गणं
भूगोलं परि गच्छति ग्रहपतिः सर्वाग्रिमो मध्यमः
लोका लोक विशोक तावन कृते स्पष्ट स्त्रयो मूर्त्तिमान्
यश्चक्षु
२४६ सिद्धान्त दर्पण
जिस नीलाद्रि विहारी पापनाशी जगन्नाथ के लिए सारा जगत् लीलाभूमि
है, उनके तेज का हृदय में ध्यान कर उनके अनुग्रह से मैने ग्रहगणित लिखना
समाप्त कर अब प्रसन्नापूर्वक गोल गणित आरम्भ करता हूँ जिसके बारे में प्राचीन
सिद्धान्तियों ने विस्तार से लिखा है ।
सिद्धान्त जातोद्धृत वाक्यचक्र सन्दर्भितात्म प्रथिताग्र्य पद्यैः
गोलं ब्रुवे बाल विबोधनाय वाचं पुरस्कृत्य च भास्करीयाम् । ५ ।
अनभिज्ञ लोगों को भी गोल गणित समझाने के लिए इसके विषय में मैंने
मुख्यतः भास्करा चार्य के कथनों की व्याख्या की है, इसके अतिरिक्त कहीं कहीं
अन्य आचार्यों के विचार दिये हैं तथा प्राचीन सिद्धान्तों के अध्ययन से उत्पन्न
मेरे विचार भी हैं।
सिद्धान्त शिरोमणौ-मध्याद्यं द्युषदां यदत्र गणितं तस्योपपत्तिं विना
प्रौढं प्रौढ सभा सुनैति गणको निः संशयो न स्वयम् ।
गोले सा विमला करामलकवत् प्रत्यक्ष तो दृश्यते ।
तस्मादास्म्युपपत्ति बोध विधये गोल प्रबन्धो द्यतः । ६ ।
ज्योतिष में ग्रहों का मध्य, स्फुट आदि गणित का वास्तविक अर्थ नहीं जानने
से ज्योतिषी के मन में सन्देह बना रहता है तथा वह विद्वत् समाज में आदर नहीं
पाता है । इस गणित का रहस्य हाथ में रखे आंवले के समान स्पष्ट भाव से
दिखायी दे- इस उद्देश्य से मैं गोल ग्रन्थ की रचना कर रहा हूँ।
भोज्यं यथा सर्व रसं विनाज्यं राज्यं यथा राज विवर्जितञ्च
सभान भातीव सुवक्तृ हीना गोलानभिज्ञो गणकस्तथैव । ७ ।
घी के विना सभी रसों का भोजन, राजा के बिना राज्य तथा ज्ञानी वक्ता के
बिना सभा की जिस प्रकार शोभा नहीं होती है उसी प्रकार गोल ज्ञान के बिना
गणक भी व्यर्थ है ।
वाग्मीव्याकरणं विनैव विदुषां धृष्टः प्रविष्टः सभां
जल्पन्नल्पमति स्म यात् पटुवटु भ्रूभंग वक्रोक्तिभिः
हीनः सन्नुपहास मेति गणको गोलानभिज्ञ स्तया
ज्योतिर्विद सदस प्रगल्भ गणक प्रश्न प्रपञ्चोक्तिभिः । ८ ।
कोई धूर्त वक्ता बिना व्याकरण ज्ञान के विद्वानों की सभा में बकवाद कर
उनके व्यंग दृष्टि और वचनों का शिकार होकर लज्जित होता है । इसी प्रकार गोल
नहीं जानने वाला गणक भी ज्योतिषियों की सभा में विभिन्न प्रकार के प्रश्न और
कौतुक उक्ति नहीं समझ कर उपहास का पात्र बनता है ।
दृष्टान्त एवावनिभ ग्रहाणां संस्थान मान प्रतिपादनाथर्म्
गोलः स्मृतः क्षेत्र विशेष एषप्राज्ञै रतः स्याद् गणकेन गम्यः । ९ ।
प्रश्न वर्णनम् २४७
पृथ्वी, तारा और ग्रहों की स्थिति परिमाण आदि समझाने के लिए गोल एक
दृष्टान्त (प्रतिरूप या model) है । विद्वानों ने गोल को एक क्षेत्र (स्वतन्त्र विषय)
माना है । जिसे कोई गणक गणित की सहायता से ही समझ सकता है ।
ज्योतिः शास्त्र फलं पुराण गणकै रादेश इत्युच्यते
नूनं लग्नबलाश्रितं पुनरिदं तत्स्पष्ट खेटाश्रयम्
ते गोला श्रयिणोऽन्तरेण गणित गोलोऽपिन ज्ञायतेः
तस्माद् यो गणितं न वेत्ति सकथं गोलादिकं ज्ञास्यति । १० ।
प्राचीन गणकों ने ज्योतिष शास्त्र फल को आदेश (प्रमाणिक) माना है । फल
लग्न के अनुसार होता है, लग्न ग्रह (पृथ्वी) की स्थिति के अनुसार है । बिना
स्पष्ट ग्रह जाने केवल लग्न द्वारा फल नहीं कहा जा सकता है । सभी ग्रह (ब्रह्माण्ड
रूपी) गोल में ही भ्रमण करते हैं । अतः स्पष्ट ग्रह जानने के लिये गोल आवश्यक
है । गोल गणित द्वारा ही समझा जा सकता है । अतः जो गणित नहीं जानता
वह (गोल आदि) ज्योतिष कैसे जान सकता है ?
द्विविध गणित मुक्तं व्यक्त मव्यक्त युक्तं
तद व गमन निष्ठाः शब्दशास्त्रे पचिष्ठः
यदि भवति तदेवं ज्योतिषं भूरि भेदं
प्रपठित मधिकारोऽस्यान्यथा नामधारी । इति । ११ ।
गणित दो प्रकार का है- व्यक्त (पाटी) और अव्यक्त (बीज) । इन दो प्रकार
के गणित तथा व्याकरण (शब्द शास्त्र) का अच्छा ज्ञान होने पर ही कोई ज्योतिष
शास्त्र पढ़कर समझ (पचा) सकता है, अन्यथा वह नाम मात्र का ही ज्योतिषी
होगा । (सिद्धान्त शिरोमणि का उद्धरण समाप्त)
गुर्वन्ते वा सिसंवाद व्याजेनाथ विविच्यते ।
तत्व ख भू भगोलानां वासना वगतिर्यतः । १२ ।
गुरु और शिष्य के संवाद रूप में अब आकाश, पृथ्वी तथा नक्षत्र गोल का
वर्णन किया जा रहा है, जिससे सभी का कारण (वासना या रहस्य) ज्ञात होगा ।
तत्र भोः श्रीमदाचार्य निजवागमृते न यत्
त्व योक्तं खेट गणितं गोलारुयं यच्च सूचितम् । १३ ।
(शिष्य)- हे आचार्य महोदय, आपने अपनी अमृत समान वाणी से जो ग्रह
गणित कहा तथा गोल के विषय में सूचना दी ।
तेन मे द्वापर लता वृद्धैव न तु वर्द्धिता
नाना मत द्रुमालम्ब बहु शास्त्रीकृता यतः । १४ ।
उससे मेरा सन्देह और बढ़ा है, घटा नहीं है-क्योंकि आपने जो कहा वह
अनेक आचार्यों के मत रूप वृक्ष और उनकी बहुत सी शाखायें है जिसमें बहुत
२४८ सिद्धान्त दर्पण
शास्त्रीय वर्णन हो गया है ।
निवासाय पुरा स्माकं सृष्टाया विष्णुनाधरा
युज्यते प्रथमं तस्याः स्वरूपं परिशीलितुम् । १५ ।
बहुत पहले सृष्टि के आरम्भ में विधाता ने हम लोगों के लिए इस पृथ्वी को
बनाया । पहले मुझे इसी का स्वरूप समझाइये ।
गोलं ज्ञात्वा ततस्तस्मिन्निः सन्देहं नमः सदाम्
गणितस्यानुभूतिर्मे भूयाद् भवद नुग्रहात् । १६ ।
उसके बाद आपकी कृपा से मेरा खगोल और ग्रह गणित का वास्तविक
अनुभव हो सकता है ।
चक्राकारां वसुमतीं कथयन्ति पुराविदः
धृतां क्रीड़ा हि कूर्माद्यैः पञ्चाशत् कोटि योजनम् । १७ ।
पुराणों में पृथ्वी का आकार चक्र के समान कहा गया है । इस पृथ्वी को
पुनः वराह, सर्प, (शेषनाग) और कच्छप आदि ने धारण किया है । पृथ्वी का
विस्तार ५० कोटियोजन है (क्षेत्रफल)
तन्मध्ये जाम्बवो द्वीपो लक्षयोजन विस्तृतः
तावता लवणोदेने वेष्टिता नवर्ष भृत् । १८ ।
इसके बीच में १ लाख योजन विस्तार (क्षेत्रफल) का जम्बू द्वीप है । जो चारों
तरफ लवण समुद्र से घिरा है ।
मध्येतस्यस्थितो मेरु ख खाब्ध्यष्ट (८४,०००) योजनैः
सच्छितो भू प्रविष्टोऽसौ खा प्राप्तांगेन्दु (१६,०००) योजनैः । १९ ।
जम्बू द्वीप के मध्य में (८४,०००) योजन लम्बा मेरु पर्वत है । (ऊंचाई) मेरु
का १६००० योजन भूगर्भ में है ।
जम्बू द्वीपाद् बहि द्वीपाः परितः स्व समैर्वृताः
सिन्धुभिस्ते पुराणोक्ताः क्रमद्विगुण विस्तृताः । २० ।
जम्बू द्वीप के बाहर क्रमशः दो गुणा विस्तृत अन्य द्वीप है तथा उनको भी
समुद्र घेरे हुए हैं ।
प्रान्तस्थ पुष्कर द्वीप मध्यगे वलयो कृतौ
भ्रमत्यर्क रथायुद्धं मानसोत्तर पर्वते । २१ ।
अन्त में स्थित पुष्कर द्वीप के मध्य भाग में वलय के आकार का मानसोत्तर
पर्वत है जिसके ऊपर सूर्य का रथ भ्रमण करता है ।
द्वीपाब्धीनां बहिः स्वर्ण भूलोका लोक पर्वतौ ।
गर्भादस्तद् बहि ब्रह्म कटाहक्ष्मादि भिर्वृतः । २२ ।
प्रश्न वर्णनम् २४९
इन द्वीपों और सागर के बाहर लोकालोक पर्वत है जिसका भूभाग स्वर्णमय
है । इस पर्वत के बाहर ब्रह्म कटाह की भूमि घेरे हुए हैं ।
भानु मति भूपृष्ठा ल्लक्षयोजन दूरगः
मज्नु द्यन्निवा भाति तिर्यङ्ङत्यन्त दूरगः । २३ ।
भू पृष्ठ से १ लाख योजन दूर सूर्य परिभ्रमण करते हैं । भू पृष्ठ से अत्यन्त दूर
और तिरछा (स्पर्श रेखा) होने कारण सूर्य का उदय और अस्त होना दीखता है ।
भ्रमन्ति चन्द्र भौमाद्यां उपर्युपरि सूर्यतः
ध्रुवान्तः स च मेरु र्ध्वे ततो लोकाः स्थिता इति । २४ ।
सूर्य के ऊपर ऊपर चन्द्र, मंगल आदि ग्रह भ्रमण करते हैं । इन सबके ऊपर
ध्रुव की स्थिति । ध्रुव तारा मेरु के ठीक ऊपर है । ध्रुव के ऊपर क्रमशः महः,
जन, तप आदि लोक है ।
बौद्धास्तु भ प्रमालोकान्तिरा धारां कुमब्रुवन्
खेऽधोयात्तीञ्च स्वस्थस्या दशनाद् गुरु वस्तुनः । २५ ।
बौद्ध मत के अनुसार पृथ्वी के चारों तरफ नक्षत्र भ्रमण करते हैं । अतः पृथ्वी
का आधार किसी भी दिशा में नहीं है । आकाश में कोई भारी वस्तु नहीं होने
के कारण उनकी कल्पना है कि पृथ्वी लगातार नीचे जा रही है ।
जैना वदन्ति सूर्येन्दु द्वौ द्वौ च भगणौ तथा
चतुष्कोण स्तम्भ रूपं मेरु मध्यगतः स्थिरम् । २६ ।
जैन मत के अनुसारर आकाश में २ सूर्य, २ चन्द्र तथा ५४ नक्षत्र हैं । वे
चतुष्कोण स्तम्भ (चतुर्भुजाकार) के समान स्थिर मेरु पर्वत की-
पर्यंति भूर्जलान्तः स्थात्तस्यादार्कदियोजनैः
त एकान्तर मुद्यन्तो दृश्यन्ते मेरु कोणतः । २७ ।
परिक्रमा जल के भीतर रह कर करते हैं । अतः मेरु कोण से एक के बाद
एक क्रम से सूर्य का उदय दिखायी देता है ।
इंग्लैण्ड पण्डिताः सूक्ष्म मतयः कथयन्ति च
भूगोला वर्तुलः क्षुद्रो भौमादि ग्रहवद्दिवि । २८ ।
सूक्ष्म बुद्धि के इंग्लैण्ड के पण्डितों को कहना है कि पृथ्वी स्वयं दीर्घ
वृत्ताकर है और आकाश में मंगल आदि ग्रहों के समान -
स मध्यस्थ वृहत्सूर्य बिम्बस्य वयवप्रमैः
आकृष्टश्चक्र वद् भ्रान्ति क्रान्ति वृत्ते ब्रजत्यसौ । २९ ।
बहुत बड़े सूर्य बिम्ब से आकर्षण से क्रान्ति वृत्त में चक्र की तरह परिक्रमा
करते हैं ।
२५० सिद्धांत दर्पण
सपादाशुगषड्वह्नि ३६५।१५ दिनैः पूर्वगतिक्रमात् ।
भगणः स्वतनूद् प्रान्त्या द्युरात्रं चास्य सम्भवेत् । ३० ।
इस प्रकार पूर्व दिशा में गति से ३६५।१५ दिन में पृथ्वी का एक भगण पूर्ण
होता है । पृथ्वी का अपने स्थान पर भ्रमण (अपनी धुरी पर) से दिन और रात
होते हैं ।
इत्थं गति र्द्विधा भूमे राहिन की वार्षिकीति च
भ्रमन्त्याः स्वतनौर्यस्मान्नित्यं स्थानान्तर स्थितिः । ३१ ।
इस प्रकार पृथ्वी की आह्निक और वार्षिक-इन दो गतियों के कारण क्रमशः
दिन रात तथा वर्ष होते हैं । पृथ्वी की वार्षिक गति के कारण प्रतिदिन उसकी
अलग अलग स्थान में स्थिति होती है ।
न पतन्ति जना भूमे र्मध्याकर्षण शक्तितः
पश्यन्त्यर्कादिकान् भ्रान्तान्ना विका हि नगानिव । ३२ ।
पृथ्वी के केन्द्र की तरफ आकर्षण शक्ति होने के कारण लोग पृथ्वी से किसी
दिशा में गिरते नहीं है । जिस प्रकार स्वयं गति शील नाव में नाविक लोगों को
नाव स्थिर तथा पर्वत चलता हुआ लगता है उसी प्रकार पृथ्वी के लोगों को
पृथ्वी स्थिर पर ग्रह नक्षत्र आदि गतिशील लगते हैं ।
भुवि मेषादि निष्ठायां तुलादौ दृश्यते रवि
दक्षिणोत्तर गायान्तु सौम्य याम्यापमौ तथा । ३३ ।
पृथ्वी मेषादि में रहने पर सूर्य तुलादि में दीखता है। पृथ्वी की दक्षिण और
उत्तर गति (झुकाव) के कारण सूर्य की क्रमशः उत्तर और दक्षिण क्रान्ति होती
है ।
बुध शुक्रावनी भौम गुरुमन्दाः क्रमाद्रवे
दूरत्वान्मन्द गतयः परिगच्छन्तितं प्रति । ३४ ।
बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु और शनि क्रमशः सूर्य से अधिक दूर हैं। दूर
होने के कारण क्रमशः इनकी गति मन्द होती जाती है । अपनी अपनी गति से ये
सूर्य की प्रदक्षिणा करते हैं ।
तान् प्रत्युपग्रहाः क्षुद्रा भ्रमन्तस्थो समंपुनः
भ्रमन्त्यर्कं यथाकृष्टो भुवेन्दुस्तां परिभ्रमन् । ३५ ।
क्षुद्र उपग्रह ग्रहों की परिक्रमा करते हैं और ग्रहों के साथ रहने के कारण
सूर्य की भी परिक्रमा करते हैं । उदाहरण स्वरूप पृथ्वी का उपग्रह चन्द्र पृथ्वी
की परिक्रमा करता है और पृथ्वी के साथ (पृथ्वी की कक्षा में) रहकर सूर्य की
भी परिक्रमा करता है ।
भ्रान्ति रूपाय आलोक ऋतु भेदाश्च सूर्यतः
भू विग्रहेषु कार्याणि सर्वाणि स्युर भेदतः । ३६ ।
:
साम्प्रतं भवता सोक्ता सूर्या विभ्रमकारिणः
Wait, is it "सूर्या" or "सूर्यो"?
Look at line 20:
स ू र् या -> wait, it has a vertical line after 'र्'?
Wait, look at 'सूर्या':
There is 'सू', then 'र्' on 'य', and then a vertical line 'ा': 'सूर्या'!
Wait, is it 'सूर्या' or 'सूर्यो'?
There is NO top stroke for 'ो'! It is just a vertical line: 'सूर्या'!
Wait, look at line 20:
साम्प्रतं भवता सोक्ता सूर्या विभ्रमकारिणः
Line 21:
ग्रहै स्वेन परीतास्थे भ्रमता विधु नेति च । ४० ।
Wait, look at:
ग्रहै स्वेन परीतास्थे or परीतास्ते?
Look at the letter: 'स्' followed by 'थ' or 'त'?
It has a loop: 'थे' or 'ते'?
Look at 'स्थे' in 'इति स्थिते' (line 4): 'स्थि' has a loop.
Here in 'परीतास्ते' or 'परीतास्थे':
It looks like 'स्' and 'थे' or 'ते'?
Wait, in line 27: 'त्वत् तस्तु': 'स्तु' has 'स्
२५२ सिद्धान्त दर्पण
व्याख्या ठीक है ? ग्रहों की सृष्टि का क्रम क्या है ? पृथ्वी का रचना किस प्रकार
हुयी ?
किमाकारा किमाधारां सा धरा कवि सागरा
द्वीपैर्धराधैर्य्याप्ता कथं कति निराश्रिता । ४३ ।
पृथ्वी का आकार और आधार कहिये । पृथ्वी पर कितने, समुद्र, द्वीप तथा
पर्वत है ? इस पर कितने लोग निवास करते हैं ?
कियन्तौ परि धिव्यासौ किं फलं पृष्ठजं घनम्
उर्ध्वाधरस्थ लोकानां ज्योतिषां कीदृशी स्थितिः । ४४ ।
पृथ्वी का परिधि, व्यास, पृष्ठ (क्षेत्रफल) और घनफल (आयतन) कहिये ।
पृथ्वी पर उर्ध्वाधर भाव से लोक तथा ग्रह, नक्षत्र आदि कैसे स्थित हैं ?
चेतना चेतनावासो यथा भू पृष्ठ गर्भयोः
चन्द्र भौमादि बिम्बेषु तथास्ते किं न वा स्थितिः । ४५ ।
पृथ्वी पृष्ठ और गर्भ में किस प्रकार चेतन और अचेतन प्राणी रहते हैं ? क्या
चन्द्र और मंगल आदि ग्रहों के बिम्ब पर भी उसी प्रकार प्राणी निवास करते हैं ?
ग्रहाणां कल्प भगणा ये सिद्धान्तेषु कीर्तिताः
तेषां दृक् सिद्धि राहित्या दार्य्य भटादिभिःपुनः । ४६ ।
प्राचीन सिद्धान्तों में ग्रहों का कल्प भगण ठीक नहीं होने के कारण (दृक्
सिद्ध नहीं होने से) आर्य भट्ट आदि ने पुनः-
कल्पिता दृक् समाह्येते भास्कराद्यैर्निराकृताः
तैर्ये स्थिरा कृतास्तेभ्यो भगणा भगदीरिताः । ४७ ।
अन्य दृक् सिद्ध भगणों की कल्पना की । भास्कर आदि आचार्यों ने पुनः
इनको अस्वीकार कर अपने स्वतन्त्र भगण निर्धारित किये ।
विषमाश्चेत्तदामीषां स्थैर्यं किं मानमुच्यताम्
विपर्येष्यन्ति चेदेते तवित्रो का गतिस्तदा । ४८ ।
फिर आपका भगण भी भास्कर से अलग है । इससे लगता है कि भगण
स्थिर नहीं है । इस अवस्था में आपके भगण की क्या गति होगी- क्या उसे भी
कोई काट देगा ?
यदि संवत्सराः षष्टि मध्ये ज्ये गृह भोगजाः
तदास्तस्मिन्नजादिस्थे कथं न प्रभवादयः । ४९ ।
यदि मध्यम गुरु के राशि भोग से ६० संवत्सरों की उत्पत्ति होती है, तो मध्यम
गुरु मेषादि में रहने पर संवत्सर प्रभव से (१ म) क्यों नहीं आरम्भ होता है ।
प्रश्न वर्णनम् २५३
पदकानां कथं सृष्टिः खेटनान्तु स्फुटीकृतिः
भूमावेव समाकिंवा यत्र कुत्रापि सा भवेत् । ५० ।
अहर्गण आदि के पदक आपने क्यों (कैसे) बनाया ? ग्रहों के स्फुटीकरण के
लिए इतना प्रपञ्च क्यों ? ग्रहों की यह स्फुटता केवल पृथ्वी के लिये है या अन्य
ग्रहों से भी इसी रीति से अन्य ग्रह स्फुट होंगे ?
पूर्वोक्तं कुजादीनां सिद्धौ कर्म चतुष्टयम्
अधिकम् यत्वयोक्तं तत् किं नाम ज्ञार्कि भू भुवाम् । २१ ।
प्राचीन आचार्यों ने मंगल आदि ग्रहों को स्फुट करने के लिये चार प्रकार के
संस्कार कहे हैं । आपने बुध, शनि और मंगल को स्फुट करने के लिए जो
अतिरिक्त संस्कार दिया उसका क्या कारण है ।
सम्भवः परिधीनां स्याद् कथं द्राङ् मन्द जन्मनाम्
वैषम्यं स्यादत् कथं तेषा मोज युग्म पदान्तयोः । ५२।
शीघ्र और मन्द परिधि की कल्पना क्यों ? ओज (विषम) और युग्म (सम)
पदों में वे समान क्यों नहीं होते ?
केन्द्र भ्रमः कथं बाहोः फलं मेष तुलादिकम् ।
धनर्णारूयं कथं भुक्तेः कर्कि नक्रादिजं तथा । ५३ ।
मन्द और शीघ्र केन्द्र का भ्रमण किस प्रकार होता है ? मेषादि और तुलादि
केन्द्र में मन्द और शीघ्र फल क्रमशः धनं और ऋण क्यों होता है ? कर्क आदि
तथा मकर आदि केन्द्र में ग्रह गति फल क्रमश धन या ऋण क्यों होता है ।
सिद्धांश (२४) सम्मिता क्रान्तिः सिद्धान्तेष्वखिलेष्वपि
त्योक्तार्द्धशं हीना कि सौम्य याम्येऽपमेकथम् । ५४ ।
सभी सिद्धान्तों में परम क्रान्ति २४ अंश माना गया है । आपने इसे २३ अंश
क्यों माना है । क्रान्ति उत्तर और दक्षिण क्यों होता है ?
क्षय वृद्धि विपर्यासो दिन रात्र्य र्भवेद भुवि
क्रान्ति वृत्तस्थ राशीनामुदया न समकृतः । ५५ ।
पृथ्वी पर दिन और रात का मान घटता बढ़ता क्यों है ? सभी राशि तो क्रान्ति
वृत्त में ही है, उनका उदयमान समान क्यों नहीं है ?
तप्तौ दुःसहं किं स्यादातपः शिशिरे सुख
ग्रीष्मान्ते किंम्प्रवर्षन्ति न्यान्यत्तौ किं तथा घनाः । ५६ ।
सूर्य किरण ग्रीष्म ऋतु में दुःसह तथा शिशिर में सुखकर क्यों है ? ग्रीष्म
ऋतु के अन्त में मेघ अधिक वर्षा करते हैं, अन्य ऋतुओं में क्यों नहीं ?
२५४ सिद्धान्त दर्पण
मानं सूर्यस्य पूर्वोक्ता देकादश गुणं कथम्
ऊनं चन्द्रस्य किं वृषे कथं तद् ग्रहण द्वयम् । ५७ ।
आपने सूर्य बिम्ब का मान प्राचीन आचार्यों की तुलना में ११ गुणा क्यों माना
है ? चन्द्र बिम्ब मान छोटा क्यों माना ? आपके अनुसार दोनों (चन्द्र और सूर्य)
ग्रहण किस प्रकार होता है ?
चन्द्र ग्रहण वत् पर्व सन्धौ मध्य ग्रहो रवेः
न स्याद् यस्माद् वदास्यापि लम्बानास्यल्प भूरिताम् । ५८ ।
चन्द्रग्रहण के समान रवि का ग्रहण भी पर्व सन्धि में (अमान्त) में क्यों नहीं
होता है ? रवि का लम्बन कहां पर कम या ज्यादा होता है ?
विज्ञातुं परमग्रासं पर्वलम्बन संस्कृतम्
सिद्धं चेत्तस्य किं प्रोक्तः संस्कार शरजः पुनः । ५९ ।
सूर्य का परम ग्रास मान निकालने के लिये लम्बन संस्कार किया, फिर शरज
'संस्कार क्यों ?
लम्बने ऽवनतौ मध्य लग्न वित्रीभ लग्नयोः
कः साधुः साधितः कस्मात् शराक्षः प्राङ् च विश्रुतः । ६० ।
लम्बन और नति साधन करने के लिए मध्यम लग्न तथा वित्रिभ लग्न की
आवश्यकता और अच्छी तरह समझाइये । शराक्ष संस्कार के बारे में प्राचीन
आचार्य ने क्यों नहीं कहा है ?
आदि मध्या वसानेषु द्युमणि ग्रहणेस्यते
शंकु किं कल्पितो पूर्वैस्तमो मण्डल बुद्धये । ६१ ।
सूर्य ग्रहण के आदि, मध्य और अन्त भाग में (स्पर्श, मध्य और मोक्ष के
समय) दृक् सिद्ध तमोमण्डल जानने के लिए आपने शंकु की कल्पना क्यों की
जो प्राचीन आचार्यों ने नहीं की थी ?
किं नार्क ग्रहवञ्चान्द्रे ग्रास बाण दिगेकता ।
वलनस्यापि दिग्भेदः किं प्राक् प्रत्यक् कपालयोः । ६२ ।
सूर्य ग्रहण के समान चन्द्र ग्रहण में ग्रास और शर एक ही दिशा में क्यों नहीं
होते है । पूर्व पश्चिम कपाल के वलन में दिग् भेद क्यों होता है ।
येषां येषां युति दृष्टा खेटानां भूमि पृष्ठ गेः ।
कियदिम योजनै रिष्टं तत्तत्कक्षान्तरं त्वया । ६३ ।
जिन ग्रहों का योग भूमि पृष्ठ से दीखता है उनका कक्षान्तर योजन में आपके
मत से कितना है ?
दृकर्मण्यायने मध्यं विशि खस्य स्फुटी कृतौ
न्यूनतायाति सर्वत्र पुरावित् साधन क्रमात् । ६४ ।
प्रश्न वर्णनम् २५५
आयन दृक् कर्म में कदम्ब प्रोतीय शर को ध्रुव प्रोतीय करने पर प्राचीन रीति
से साधारणतः कम हो जाता है ।
भवन्मते तु सूक्ष्मस्य स्फुटस्य विशिखस्य किम् ।
क्रान्ति संस्कार योग्यस्य मध्यतोऽधिकतेक्ष्यते । ६५ ।
परन्तु आपके मत से शर का क्रान्ति संस्कार करने पर वह अधिक क्यों हो
जाता है ?
ग्रहोडुभिर्बहुतरै र्विहायसि महीयसि
व्याप्तेऽसि निशि किं न स्या दहनीव तमोहतिः । ६६ ।
अनन्त आकाश में असंख्य ग्रह और तारा व्याप्त हैं तथापि रात में दिन के
समान अन्धकार का नाश क्यों नहीं होता ?
सूर्यस्य किरण व्याप्तिः कतियोजन सम्मिता
कियती सा ग्रहक्षाणां कियद्दूरे च दृश्यता । ६७ ।
सूर्य की किरण कितने योजन तक जाती है ? ग्रह और तारों का प्रकाश कितने
दूर तक जाता है ? (वे कितने दूर से दीखते हैं ?)
क्षुणानि कुदिनानि स्यु ग्रहाणां गति योजनैः ।
ख कक्षा योजनानीति श्रुतिं यत्तदि हत्वयाः । ६८ ।
कल्प सावन दिन में दैनिक ग्रह योजन गति से गुणा करने पर ब्रह्माण्ड का
कक्षा योजन (परिधि की लम्बाई) होता है ऐसा श्रुति (वेद या प्राचीन शास्त्र) में
कहा गया है । पर यहां पर आपके अनुसार
निरस्त संगति वैषम्याद् यदि तद् वेष्टनं दिवः
भवन्मते कियन्मानं ब्रह्माण्डोदर नामकम् । ६९ ।
ग्रहों की दैनिक योजन गति समान नहीं है, अतः शास्त्र वाक्य खण्डित हुआ
(उसके अनुसार ब्रह्माण्ड का कक्षा का योजन नहीं आयेगा) । इस अवस्था में
आपके अनुसार ब्रह्माण्ड का परिधि मान कितना है ? और वह कैसे ज्ञात होगा ?
ग्रहर्क्षा स्तोदयौ यद्वा दृक् कर्मर्थ्यं त्वयादितौ ।
तथाकिं भवतो मेरौ न वा तन्निर्णयं वद । ७० ।
आपने आक्ष और आयन दृक् कर्म दोनों के द्वारा ग्रह और नक्षत्रों का उदय
और अस्त साधन करने को कहा है । क्या मेरु क्षेत्र में भी वह इसी प्रकार किया
जायेगा ? इसका निर्णय करें ।
क्षीयमाणाः कलादेवैः पीयन्तेऽमृत दीधितेः
इतिवादः पुराणाना मनृतः किमृतो मतः । ७१ ।
देवता लोग चन्द्र किरण का पान करते हैं । इस प्रकार पुराणों का वचन