सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)
Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara
सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा
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अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र के अन्तिम पाद में राशि और नक्षत्र की
सन्धि होने के कारण इनके अन्तिम पाद को गण्ड कहा जाता है। इनके अगले
नक्षत्रों (मघा, मूल तथा अश्विनी) के प्रथम पाद अर्द्ध को गण्डान्त कहा जाता
है।
दृष्टा लग्न नवांशक इह मयो च्यते कुलीरे झषे
कीटेन्त्या हरिचाप मेष मुखगा मीनाज सम्बन्धिनः
तेखण्डान्त भ सन्धि पात सदृशाः सर्वेषु कर्मस्वपि
त्याज्या विष्टि मुखास्त्वनिष्ट निकरा होरागमोक्ताः पुनः । ५८ ।
राशि संधि के दोष में शुभ कर्म सब प्रकार से त्याज्य हैं। कर्क, वृश्चिक और
मीन राशि का अन्तिम (९ वां) नवांश मीन राशि में होता है। सिंह, धनु और
मीन का प्रथम नवांश मेष आदि में पड़ता है। अतः ये सभी भी नवांश दोष युक्त
हैं। ये नवांश गण्डान्त की तरह राशि और नक्षत्र की सन्धि में पड़ने के कारण
इनमें सभी शुभ कर्म त्याज्य हैं। विष्टि आदि अनिष्ट कारक करण भी त्याज्य हैं।
होरा शास्त्र में इनको अनिष्ट कर कहा जाता है।
प्राक् कल्पे भूग्रहादि स्थिर चर सृजतः खाभ्र वेदाद्रि वेदा (४७,४००)
दिव्याब्दा ये व्यतीय सरसिज जनुषः प्रत्यहं पर्ययाणाम् ।
तावत् कालात् प्रवृत्ते रितर दिने मुखाद्यात् सौराब्द संघा
सृष्ट्याब्दाः सृष्टि कालव्यवकलन वशादूक्त पूर्वा ममोति । ५९ ।
चराचर सृष्टि करने में ब्रह्मा को ४७,४०० दिव्य वर्ष लगे, जिस समय को
सृष्टि काल या सृष्टि वर्ष कहते हैं। सृष्टि वर्ष समाप्त होने के अगले दिन से ही
ग्रह, उच्च और पात आदि का भगण आरम्भ हुआ। अतः मैंने पहले ही लिखा है
कि ग्रह साधन करने के लिए कल्पवर्ष से इतना सृष्टि वर्ष घटाया जायेगा।
सृष्ट्यन्ते चैत्र शुक्ल प्रतिपदि यम को ट्युद् गमे तिग्मभानो-
स्तद् वारे सोच्च पाता खिल गगन चराश्चक्रवक्त्रे नियुक्ताः
तस्मादस्राब्द मासापम भगण मुखा यौग पद्यात् प्रवृत्ताः
किञ्च ब्रह्महरादेर्युग मनु घटिका मात्र मन्यत्र किञ्चित् । ६० ।
सृष्टि वर्ष की समाप्ति पर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि आरम्भ हुयी। यमकोटि
पत्तन नगर में सूर्य का उदय (लंका में मध्य रात्रि) थी। यह दिन रविवार माना
गया है। इस समय ब्रह्म ने ग्रह, उच्च, पात आदि को अपनी अपनी कक्षा में गति
आरम्भ करने के लिए अश्विनी नक्षत्र के आदि बिन्दु (मेष आदि विन्दु) से छोड़
दिया। ठीक इसी समय से दिन, मास, वर्ष, क्रान्ति और भगण आदि की प्रवृत्ति
आरम्भ हुई। ब्रह्मा के दिन से इन सबका आरम्भ नहीं हुआ। उस समय से केवल
घटी, युग और मनु आदि की उत्पत्ति हुयी।