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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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२५४ सिद्धान्त दर्पण
मानं सूर्यस्य पूर्वोक्ता देकादश गुणं कथम्
ऊनं चन्द्रस्य किं वृषे कथं तद् ग्रहण द्वयम् । ५७ ।
आपने सूर्य बिम्ब का मान प्राचीन आचार्यों की तुलना में ११ गुणा क्यों माना
है ? चन्द्र बिम्ब मान छोटा क्यों माना ? आपके अनुसार दोनों (चन्द्र और सूर्य)
ग्रहण किस प्रकार होता है ?
चन्द्र ग्रहण वत् पर्व सन्धौ मध्य ग्रहो रवेः
न स्याद् यस्माद् वदास्यापि लम्बानास्यल्प भूरिताम् । ५८ ।
चन्द्रग्रहण के समान रवि का ग्रहण भी पर्व सन्धि में (अमान्त) में क्यों नहीं
होता है ? रवि का लम्बन कहां पर कम या ज्यादा होता है ?
विज्ञातुं परमग्रासं पर्वलम्बन संस्कृतम्
सिद्धं चेत्तस्य किं प्रोक्तः संस्कार शरजः पुनः । ५९ ।
सूर्य का परम ग्रास मान निकालने के लिये लम्बन संस्कार किया, फिर शरज
'संस्कार क्यों ?
लम्बने ऽवनतौ मध्य लग्न वित्रीभ लग्नयोः
कः साधुः साधितः कस्मात् शराक्षः प्राङ् च विश्रुतः । ६० ।
लम्बन और नति साधन करने के लिए मध्यम लग्न तथा वित्रिभ लग्न की
आवश्यकता और अच्छी तरह समझाइये । शराक्ष संस्कार के बारे में प्राचीन
आचार्य ने क्यों नहीं कहा है ?
आदि मध्या वसानेषु द्युमणि ग्रहणेस्यते
शंकु किं कल्पितो पूर्वैस्तमो मण्डल बुद्धये । ६१ ।
सूर्य ग्रहण के आदि, मध्य और अन्त भाग में (स्पर्श, मध्य और मोक्ष के
समय) दृक् सिद्ध तमोमण्डल जानने के लिए आपने शंकु की कल्पना क्यों की
जो प्राचीन आचार्यों ने नहीं की थी ?
किं नार्क ग्रहवञ्चान्द्रे ग्रास बाण दिगेकता ।
वलनस्यापि दिग्भेदः किं प्राक् प्रत्यक् कपालयोः । ६२ ।
सूर्य ग्रहण के समान चन्द्र ग्रहण में ग्रास और शर एक ही दिशा में क्यों नहीं
होते है । पूर्व पश्चिम कपाल के वलन में दिग् भेद क्यों होता है ।
येषां येषां युति दृष्टा खेटानां भूमि पृष्ठ गेः ।
कियदिम योजनै रिष्टं तत्तत्कक्षान्तरं त्वया । ६३ ।
जिन ग्रहों का योग भूमि पृष्ठ से दीखता है उनका कक्षान्तर योजन में आपके
मत से कितना है ?
दृकर्मण्यायने मध्यं विशि खस्य स्फुटी कृतौ
न्यूनतायाति सर्वत्र पुरावित् साधन क्रमात् । ६४ ।