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सर्वकोश
सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

सिद्धान्तदर्पण (महामहोपाध्याय सामन्त चन्द्रशेखर सिंह - नग्न-नेत्र खगोल वेध एवं गणित महाकोश)

Siddhanta Darpana of Mahamahopadhyaya Samanta Chandrasekhara

सामन्त चन्द्रशेखर सिंह (सम्पादक: प्रो. योगेशचन्द्र राय) द्वारा

DevanagariHindipublished609 पृष्ठ

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महापात वर्णन २३७
मानैक्यार्द्ध से क्रान्ति अन्तर अधिक होने पर स्पर्श होने वाला है ऐसा समझेंगे।
(या मोक्ष बीत चुका है)
खरसे (६०) गुणिता मध्य स्थित्यर्द्ध घटिका हताः
लब्धा भुक्ति कलाः स्पर्श मोक्षोत्थ प्रथमा मताः । ३९ ।
मध्यम स्पर्श और मोक्ष कालिक क्रान्ति अन्तर कला आदि को ६० से गुणा
कर मध्यम स्थिति अर्द्ध घटिका से भाग देने पर प्रथम स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति कला आयेगी ।
मान योगार्द्ध विकलास्तद् भक्ताः स्पर्श मोक्षजा
स्थित्यर्द्ध नाड़िका मध्ये हीनाढ्या समये पुनः । ४० ।
स्पार्शिक या मौक्षिक मानैक्यार्द्ध विकला को क्रमशः स्पार्शिक और मौक्षिक
क्रान्ति गति कला से भाग देने पर स्पर्श और मोक्ष की स्थिति अर्ध नाड़ी आयेगी ।
इसको पात मध्य काल में घटाने और जोड़ने से क्रमशः स्पर्श और मोक्ष काल
आयेगा ।
तत्काल क्रान्ति विवर लिप्तिकाः षष्ठि ताड़िताः
द्वितीय स्थिति खण्डाप्ताः लब्धा भुक्तिरिति क्रमात् । ४१ ।
पुनः इस स्पर्श और मोक्ष काल के क्रान्ति अन्तर कला को ६० से गुणा कर
क्रमानुसार द्वितीय स्पार्शिक तथा मौक्षिक स्थितिअर्द्ध घटी से भाग देने पर द्वितीय
स्पार्शिक तथा मौक्षिक क्रान्ति गति (अन्तर) होगा ।
तत्क्रान्त्यन्तर योगार्द्ध साम्ये स्पर्श विनिर्गमौ
भवेतां सुस्थिरौ स्पष्टौ दण्डाश्च स्थिति खण्डजाः । ४२ ।
इस प्रकार बार बार करने से स्पार्शिक और मौक्षिक क्रान्तिअन्तर तथा स्पार्शिक
और मौक्षिक मानैक्यार्द्ध समान होने पर स्पर्श और मोक्ष काल स्थिर होगा । उससे
स्थित्यर्द्ध नाडिका आदि भी स्थिर होगा ।
सूर्य सिद्धान्ते-आद्यन्तकालयोर्मध्ये कालोज्ञेयोऽति दारुणः ।
प्रज्वल ज्वलनाकारः सर्व कर्मेषु गर्हितः । ४३ ।
(सूर्य सिद्धान्त में) पात के आरम्भ से अन्त तक का समय प्रज्वलित अग्नि
के समान अत्यन्त उग्र है तथा इस अवधि में (विवाह, उपनयन आदि) सभी शुभ
कार्य निन्दनीय हैं ।
एक काष्ठा गतं यावदर्केन्दो मण्डलान्तरम्
सम्भवस्ताव देवास्य सर्व कर्म विनाश कृत् । ४४ ।
रवि और चन्द्र की एक ही क्रान्ति होने पर पात की उत्पत्ति होती है । पात
होने से सभी शुभ कर्म नष्ट हो जाते हैं ।